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Maluti : जहां विराजती हैं… बामाखेपा की प्रथम साधना भूमि

राजकिशोर सिंह
29 जुलाई 202
Dumka : मंदिरों (Temples) के गांव मलुटी और मां मौलिक्षा देवी (Maa Mauliksha devi) से संदर्भित बहुत सारे तथ्य ‘गुप्तकाशी मलुटी’ (Guptkashi Maluti) नाम से प्रकाशित गोपालदास मुखर्जी (Gopaldas Mukherjee) की पुस्तिका में संग्रहित हैं. उस पुस्तिका के मुताबिक बंगाल (Bengal) के सिद्ध तांत्रिक बामाखेपा का मूल नाम बामाचरण चट्टोपाध्याय था. वह तारापीठ (Tarapith) के समीप के आटला गांव के थे. सन् 1838 में आर्थिक रूप से बहुत ही कमजोर परिवार में उनका जन्म हुआ था. बामदेव के नाम से भी वह जाने जाते थे. मलुटी के जमींदार के यहां नौकरी करते उन्होंने मां मौलिक्षा की सिद्धि प्राप्त कर ली थी. बाद में वह तारापीठ में तारा सिद्ध हुए. गुप्त काशी मलुटी बामाखेपा की प्रथम साधना भूमि रही. तकरीबन दो साल तक वहां रह उन्होंने मां मौलिक्षा की कृपा प्राप्त की. बामाखेपा तारापीठ में जब महासाधक के रूप में स्थापित हुए तब अपने शिष्य साधकों से कहा करते थे- मां मौलिक्षा की पाठशाला में तंत्र विद्या का अक्षर ज्ञान और फिर तारापीठ में ‘स्नातक’ की उपाधि मिलती है. मुख्य रूप से यही वह आधार है जो मां मौलिक्षा को मां तारा (Maa Tara) की बड़ी बहन की मान्यता देता है.

मलुटी से जुड़ा एक रोचक तथ्य यह भी है कि वहां जिस घर में बामाखेपा (Bamakhepa) रहते थे, उसके आंगन में स्थित छोटे मंदिर के अंदर उनका त्रिशूल एवं शंख अब भी सुरक्षित है. त्रिशूल की पूजा आज भी होती है. यह सब तो है, लेकिन यह जानकर हैरानी होगी कि 1979 से पहले बंगाली वास्तुकला (Bengali architecture) से जुड़ी मलुटी की ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक धरोहर की जानकारी शेष दुनिया को नहीं थी. गांव-समाज और सरकार ने इसे पूरी तरह उपेक्षित कर रखा था. अब वैसी बात नहीं है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अलावा ‘सेव हेरिटेज एंड एनवाइरमेंट’ (Save Heritage and Environment) नामक गैर सरकारी संस्था ने मलुटी की विरासत को संरक्षित रखने की पहल की है. ‘ग्लोबल हेरिटेज फंड’ ने मलुटी के मंदिरों को दुनिया के बारह सबसे अधिक संकटग्रस्त विरासतों में एक माना है. भारतीय ग्रामीण एवं विरासत विकास ट्रस्ट के साथ मिलकर उसने स्थानीय लोगों को जागरूक और प्रशिक्षित कर मंदिरों के संरक्षण की दिशा में सकारात्मक कदम उठाया है.


इस बीच मलुटी को ख्याति दिलाने वाला एक और वाकया हुआ. 2015 में गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली के परेड में झारखंड सरकार (Government of Jharkhand) की ओर से मलुटी के मंदिरों पर आधारित आकर्षक झांकी प्रस्तुत की गयी थी. अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा उस समारोह के मुख्य अतिथि थे. उस झांकी को उन्होंने खूब सराहा और मलुटी राष्ट्रीय व अन्त्तर्राष्ट्रीय फलक पर आ गया. बदलते वक्त के साथ मलुटी गांव में काफी कुछ बदलाव आया है, पर मंदिरों के जीर्णाेद्धार में विरासती मौलिकता से हुई छेड़छाड़ अखर जा रही है. इसके संरक्षण की जिम्मेवारी उठा रखी सरकारी-गैर सरकारी संस्थाओं को इस पर खास ध्यान रखने की जरूरत है. बहरहाल, झारखंड सरकार मलूटी को पर्यटन स्थल (Tourist Attractions) के तौर पर विकसित कर रही है. चमचमाती सड़कों के साथ हेलीपैड (Helipad) भी अस्तित्व में आ गया है. परंतु, दुकानों में खान-पान के मामले में कचरी-फुलौरी से यह ऊपर नहीं उठ पाया है. (समाप्त)

(यह आस्था और विश्वास की बात है. मानना और न मानना आप पर निर्भर है.)

राजकिशोर सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं

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