Maluti : जहां विराजती हैं… देवी पांडोरा ही हैं मां मौलिक्षा!

मलुटी गांव के दक्षिणी भाग में अधिष्ठात्री मौलिक्षा माता महाजननी का मंदिर है. जागृत सिद्धपीठ! बंगला शैली की इसकी स्थापत्य कला झारखंड में और कहीं किसी मंदिर में नहीं दिखती है. दो चाला कुटीर के समान इसकी बनावट है. सामने छोटा-सा बरामदा है. उस बरामदे में बैठ श्रद्धालु मां मौलिक्षा का दर्शन कर सकते हैं.
महल और किला बनाने की नहीं, होड़ मंदिर बनाने की
राजा राखरचन्द्र ने मां मौलिक्षा का मंदिर बनवाया
इस होड़ में मलुटी मंदिरों के गांव के रूप में प्रसिद्ध हो गया
सिर्फ मस्तक का ही दर्शन होता है मां मौलिक्षा का
राजकिशोर सिंह
28 जुलाई 2026
Dumka : इतिहास बताता है कि ननकर राज (Nankar Raj) गंवा मलुटी में बस गये राजा (King) राजचन्द्र (Rajchandra) के चार पुत्र थे. चारो अलग-अलग रहते थे. बड़े पुत्र राखरचन्द्र (Rakharchandra) के घर का नाम ‘राजार बाड़ि’, दूसरे पुत्र पृथ्वीचन्द्र (Prithvichandra) के घर का नाम ‘मध्यम बाड़ि’ और तीसरे पुत्र रामचन्द्र (Ramchandra) के घर का नाम ‘सिकिर बाड़ि’ था. चौथे पुत्र महादेवचन्द्र (Mahadevchandra) के छह बेटे थे. इसलिए उनके हिस्से को ‘छई तरफ’ कहा जाने लगा. गौर करने वाली बात यह कि इन सब में महल और किला बनाने की नहीं, मंदिर निर्माण की प्रतिस्पर्द्धा थी. सबसे पहले राखरचन्द्र ने मां मौलिक्षा (Maa Mauliksha) का मंदिर बनवाया. उसके सामने दो शिव मंदिर (Shiva Temple) भी. फिर ज्यादा से ज्यादा मंदिर बनाकर इस मामले में दूसरों से आगे निकलने की होड़ में सन् 1720 से 1840 के बीच 108 मंदिर अस्तित्व में आ गये. मलुटी ‘मंदिरों के गांव’ के रूप में प्रसिद्ध हो गया. वर्तमान में मलुटी में जिन 72 मंदिरों का अस्तित्व बचा हुआ है, उनमें सामान्य एवं टेराकोटा शैली के 58 शिव मंदिर हैं. दुर्गा, काली, मनसा, मौलिक्षा, नारायण आदि मंदिरों की संख्या 14 है. इनके अलावा बामाखेपा, धर्मराज आदि के भी 14 मंदिर हैं. सबको मिलाकर मलुटी गांव में तकरीबन 80 मंदिर हैं.
सभी शैलियों का समावेश
चार चाला आकार में निर्मित मलुटी के मंदिर मुख्यतः पांच समूहों में विभाजित हैं. महत्वपूर्ण बात यह कि इन मंदिरों में किसी खास स्थापत्य शैली का अनुकरण नहीं है. भारत (India) में आमतौर पर तीन वास्तु शैलियों- नागर, द्रविड़ और बेसर (मिश्रित) का प्रचलन है. मलुटी के मंदिर में किसी की नकल नहीं है. जिस वास्तु शैली (Vastu shaili) का उपयोग हुआ है, वह बंगाल यानी बंगलादेश (Bangladesh) और पश्चिम बंगाल (West Bengal) के अंचलों में प्रचलित है. कतिपय वास्तुविदों का मानना है कि पूर्वोत्तर भारत में प्रचलित लगभग सभी शैलियों का समावेश है. लाल रंग की पतली ईंट और चूना-सूर्खी के गारे से इनका निर्माण हुआ है. काली, दुर्गा, बामाखेपा आदि मंदिरों की शैली सामान्य समतल छत की है.खासियत यह किअधिसंख्य मंदिरों के पार्श्व भाग पर टेराकोटा की पट्टिकाओं पर विलक्षण नक्काशी है. मुख्य रूप से उनमें देवी-देवताओं, रामायण (Ramayana) और महाभारत (Mahabharata) के दृश्यों को दर्शाया गया है. अधिकतर पट्टिकाओं मंें राम-रावण युद्ध (Ram-Ravan Yudh) की प्रतिकृतियां हैं. लेकिन, उनमें दुहराव नहीं है. एक-दूसरे में सूक्ष्म अंतर है.
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झारखंड में और कहीं नहीं
गांव के दक्षिणी भाग में मलुटी की अधिष्ठात्री मौलिक्षा माता महाजननी का मंदिर है. जागृत सिद्धपीठ! बंगला शैली की इसकी स्थापत्य कला झारखंड (Jharkhand) में और कहीं किसी मंदिर में नहीं दिखती है. दो चाला कुटीर के समान इसकी बनावट है. सामने छोटा-सा बरामदा है. उस बरामदे में बैठ श्रद्धालु मां मौलिक्षा का दर्शन कर सकते हैं. मंदिर के गर्भगृह में ऊंची बेदी पर एक पत्थर पर उत्कीर्ण मुख रूप में देवी विराजमान हैं. वह त्रिनयनी, मृदुहास देवी मस्तक है. मौली का मतलब मस्तक और ईक्षा का अर्थ दर्शन होता है. यानी मां मौलिक्षा देवी के केवल मस्तक का ही दर्शन किया जा सकता है. उनकी पूजा देवी दुर्गा (Devi Durga) की सिंहवाहिनी (Singhvahini) के रूप में की जाती है. वस्तुतः यह तंत्रोक्त तीन देवियों- बौद्ध तांत्रिकों की देवी पांडोरा, ननकर राज की कुलदेवी सिंहवाहिनी और मां तारा (Maa Tara) के समन्वय से सृष्ट महादेवी हैं. ऐसी मान्यता है कि मां मौलिक्षा की पाषाण मूर्ति में सैकड़ों योगियों एवं साधकों ने प्राण संचार किये हैं. वेदांतवादी, कौल संन्यासी, अघोरी, तांत्रिक आदि विभिन्न मतावलम्बी साधकों ने अपने मतानुसार साधना की है. (जारी)
(यह आस्था और विश्वास की बात है. मानना और न मानना आप पर निर्भर है.)

राजकिशोर सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं
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