Swad : स्वाद जीभ से नहीं, मस्तिष्क से!

स्वाद का अनुभव हमारी कल्पना से कहीं अधिक जटिल और अद्भुत है. जीभ स्वाद की शुरुआत अवश्य करती है, लेकिन उसकी व्याख्या, उसका आनंद और उससे जुड़ी भावनाएं मस्तिष्क में जन्म लेती हैं. भोजन का रंग, गंध, स्मृतियां, भावनाएं और वातावरण सारे मिलकर स्वाद का निर्माण करते हैं.
आंखों से शुरू होता है स्वाद का पहला अध्याय
जीभ का नहीं, गंध और मस्तिष्क का खेल है स्वाद
मानसिक स्थिति भी प्रभावित करती है स्वाद को
भावनात्मक अनुभव के रूप में भी ग्रहण करता है दिमाग
डा. विजय गर्ग
30 जुलाई 2026
आपके सामने जब गर्मागर्म समोसे की प्लेट आती है, ताजी जलेबी की मिठास हवा में घुलती है या किसी रेस्तरां (restran) से आती पिज्जा (Pizza) की सुगंध आपके नथुनों तक पहुंचती है, तो क्या आपने कभी सोचा है कि स्वाद (Taste) का अनुभव वास्तव में कहां शुरू होता है? अधिकांश लोग मानते हैं कि स्वाद का संबंध केवल जीभ (Tongue) से है, लेकिन आधुनिक न्यूरोसाइंस (Neuroscience) और खाद्य विज्ञान एक अलग कहानी बताते हैं. वैज्ञानिकों (Scientists) के अनुसार भोजन का स्वाद जीभ पर पहुंचने से पहले ही हमारे दिमाग में बनना शुरू हो जाता है. दरअसल, स्वाद केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मस्तिष्क(Brain) , स्मृतियों (Memories), भावनाओं, गंध, दृष्टि और अनुभवों का संयुक्त परिणाम है. इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि हम भोजन को पहले दिमाग से चखते हैं और बाद में जीभ से.
पारंपरिक समझ
सदियों तक यह माना जाता रहा कि जीभ ही स्वाद की मुख्य और लगभग एकमात्र पहचानकर्ता है. जीभ पर मौजूद स्वाद कलिकाएं भोजन (Bhojan) में मौजूद रासायनिक तत्वों को पहचानती हैं और उन्हें तंत्रिका संकेतों के रूप में मस्तिष्क तक पहुंचाती हैं. जीभ पांच प्रमुख स्वादों को पहचान सकती हैकृ.मीठा, नमकीन,खट्टा, कड़वा-उमामी. लेकिन, आश्चर्य की बात यह है कि ये स्वाद केवल संकेत हैं. उनका अर्थ निकालना, उन्हें सुखद या अप्रिय मानना और उनके आधार पर प्रतिक्रिया देना मस्तिष्क का काम है. यदि मस्तिष्क इन संकेतों को ग्रहण न करे, तो स्वाद का पूरा अनुभव समाप्त हो सकता है. अर्थात स्वाद का अंतिम निर्णय जीभ नहीं, दिमाग करता है.
पहले आंखें चखती हैं
कभी गौर किया है कि सुंदर ढंग से सजाया गया भोजन अधिक स्वादिष्ट लगता है? इसका कारण केवल उसकी गुणवत्ता नहीं बल्कि हमारी दश्य प्रणाली है. जब हम किसी भोजन को देखते हैं, तो हमारा मस्तिष्क उसके रंग, आकार, बनावट और प्रस्तुति के आधार पर पहले ही अनुमान लगा लेता है कि उसका स्वाद कैसा होगा. यही कारण है कि सुनहरे रंग की कुरकुरी कचौड़ी या चमकदार मिठाई (Sweet) हमें अधिक आकर्षित करती है. वैज्ञानिक प्रयोगों में पाया गया है कि यदि एक ही पेय को अलग-अलग रंगों में प्रस्तुत किया जाये, तो लोग उसके स्वाद को अलग-अलग बताते हैं. लाल रंग का पेय अधिक मीठा महसूस होता है जबकि हरे रंग का पेय अपेक्षाकृत खट्टा प्रतीत हो सकता है. इस प्रकार स्वाद मिलने का पहला अध्याय आंखों से शुरू होता है.
यह भी पढ़ें :
गंध और स्वाद
यदि किसी व्यक्ति की नाक बंद हो जाये, तो अधिकांश भोजन बेस्वाद लगने लगता है. इसका कारण यह है कि हम जो स्वाद महसूस करते हैं, उसका बड़ा हिस्सा वास्तव में गंध से आता है. जब भोजन चबाया जाता है, तो उससे निकलने वाले सुगंधित अणु नाक तक पहुंचते हैं. वहां मौजूद रिसेप्टर्स उन्हें पहचानकर मस्तिष्क को संकेत भेजते हैं. मस्तिष्क इन संकेतों को जीभ से प्राप्त स्वाद संकेतों के साथ जोड़कर एक संपूर्ण ‘फ्लेवर’ तैयार करता है. यही कारण है कि चाय, कॉफी, आम, इलायची, पुदीना या ताजे मसालों की सुगंध हमें भोजन का आनंद कई गुना बढ़ा देती है. कोविड-19 महामारी के दौरान लाखों लोगों ने स्वाद और गंध खोने का अनुभव किया. उस समय वैज्ञानिकों और आम लोगों को स्पष्ट रूप से समझ आया कि स्वाद वास्तव में केवल जीभ का नहीं, बल्कि गंध और मस्तिष्क का भी खेल है.
स्मृतियां भी बदल देती हैं
क्या आपने कभी महसूस किया है कि बचपन में खायी गयी दादी की बनायी खीर आज भी किसी पांच सितारा होटल की मिठाई से अधिक स्वादिष्ट लगती है? इसका कारण केवल उसकी सामग्री नहीं, बल्कि उससे जुड़ी भावनात्मक स्मृतियां हैं. हमारा मस्तिष्क भोजन को अनुभवों और भावनाओं के साथ जोड़ता है. जब कोई भोजन हमें किसी सुखद स्मृति की याद दिलाता है, तो उसका स्वाद अधिक अच्छा महसूस होता है. इसी प्रकार किसी बीमारी के दौरान खाया गया भोजन बाद में कम पसंद आ सकता है क्योंकि मस्तिष्क उसे नकारात्मक अनुभव से जोड़ लेता है. स्वाद इसलिए केवल भोजन में नहीं, हमारी यादों में भी बसता है.
भावनाएं और मनोदशा
मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि हमारी मानसिक स्थिति भोजन के स्वाद को प्रभावित करती है.जब व्यक्ति प्रसन्न होता है, तो सामान्य भोजन भी अधिक स्वादिष्ट लगता है. इसके विपरीत तनाव, चिंता, अवसाद या क्रोध की स्थिति में पसंदीदा भोजन भी आकर्षक नहीं लगता. यही कारण है कि कुछ लोग तनाव के समय अधिक मीठा खाते हैं, जबकि कुछ लोगों की भूख ही समाप्त हो जाती है. दिमाग भोजन को केवल रासायनिक पदार्थों के रूप में नहीं, बल्कि भावनात्मक अनुभव के रूप में भी ग्रहण करता है.
स्वाद और मस्तिष्क
जब भोजन जीभ पर पहुंचता है, तो स्वाद कलिकाएं सक्रिय हो जाती हैं. ये कलिकाएं तंत्रिकाओं के माध्यम से संकेतों को मस्तिष्क के विभिन्न भागों तक भेजती हैं. मस्तिष्क का एक विशेष क्षेत्र, जिसे गस्टेटरी कॉर्टेक्स कहा जाता है, स्वाद संबंधी जानकारी को संसाधित करता है. इसके साथ ही अन्य क्षेत्र गंध, तापमान, बनावट, स्मृति और भावनाओं की जानकारी जोड़ते हैं. इन सभी सूचनाओं को मिलाकर मस्तिष्क एक अंतिम अनुभव तैयार करता है, जिसे हम ‘स्वाद’ कहते हैं. इस दृष्टि से स्वाद वास्तव में एक मानसिक निर्माण है.
क्यों रुचिकर लगते हैं कुछ स्वाद?
मानव विकास के दौरान मस्तिष्क ने कुछ स्वादों के प्रति विशेष प्रतिक्रियाएं विकसित की हैं. मीठा स्वाद ऊर्जा का संकेत देता था, इसलिए मनुष्य स्वाभाविक रूप से उसे पसंद करता है.कड़वा स्वाद कई बार विषैले पदार्थों से जुड़ा होता था, इसलिए उसके प्रति सावधानी बरती गयी. नमकीन स्वाद शरीर के लिए आवश्यक खनिजों का संकेत देता था. खट्टा स्वाद भोजन की ताजगी या खराब होने की स्थिति का संकेत दे सकता था. इस प्रकार स्वाद की हमारी पसंद केवल संस्कृति नहीं, बल्कि लाखों वर्षों के विकास का परिणाम भी है.
दिमाग से नियंत्रित होगा?
वैज्ञानिक ऐसे उपकरणों और तकनीकों पर काम कर रहे हैं जो बिना वास्तविक भोजन के भी स्वाद का अनुभव उत्पन्न कर सकें. वर्चुअल रियलिटी (Virtual Reality) और न्यूरोटेक्नोलॉजी (Neurotechnology) के क्षेत्र में ऐसे प्रयोग हो रहे हैं जिनमें विद्युत संकेतों के माध्यम से मस्तिष्क को स्वाद का अनुभव कराया जा सकता है. यदि ये तकनीकी सफल होती है, तो भविष्य में लोग कम कैलोरी वाले भोजन को भी अधिक स्वादिष्ट महसूस कर सकते हैं या विशेष चिकित्सा स्थितियों में स्वाद की कमी को दूर किया जा सकेगा. स्वाद का अनुभव हमारी कल्पना से कहीं अधिक जटिल और अद्भुत है. जीभ स्वाद की शुरुआत अवश्य करती है, लेकिन उसकी व्याख्या, उसका आनंद और उससे जुड़ी भावनाएं मस्तिष्क में जन्म लेती हैं. भोजन का रंग, गंध, स्मृतियां, भावनाएं और वातावरणकृ सारे मिलकर स्वाद का निर्माण करते हैं.

(डा विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्राचार्य हैं. विभिन्न विषयों पर सारगर्भित लेखन भी करते हैं.)
tapmanlive

