AIMIM सीमांचल में संगठनात्मक दांव : नेतृत्व पर उठ रहे सवाल

नेतृत्व मजबूत है तो फिर किशनगंज का किला क्यों नहीं फतह हो पा रहा है? जबकि 2019 और 2024 में प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान खुद उम्मीदवार थे. दोनों चुनावों में मुंह की खा गये? आखिर क्यों? यह सवाल आज भी बना हुआ है. किशनगंज संसदीय क्षेत्र की चुनावी राजनीति की गहन जानकारी रखने वालों का मानना है कि दो संसदीय चुनावों में अख्तरुल ईमान की हार इस कारण हुई कि जन समर्थन उनका एक सीमा में सिमटा हुआ है.
पार्टी के अंदर बढ़ते असंतोष से पार पाने का प्रयास
चेहरा बदल देने से मुफीद नहीं हो जायेगी चुनावी राजनीति
एक सीमा में सिमटा है अख्तरुल ईमान का जन समर्थन
इस कारण जम नहीं पा रही जन स्वीकार्यता
अशोक कुमार
31जुलाई 2026
Purnea: बिहार (Bihar) में चुनाव (Election) अभी दूर है, काफी दूर. ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने चुनाव का इंतजार न कर राज्य के उत्तर- पूर्व सीमांचल (Seemanchal) में संगठनात्मक फेरबदल का बड़ा दांव खेला है. संगठन को नयी धार देने की रणनीति के तहत वहां के सभी चारो जिलों में नये अध्यक्ष की नियुक्ति की है. वैसे तो यह नेतृत्व स्तर का सामान्य निर्णय है, पर इसे पार्टी के अंदर बढ़ते असंतोष से पार पाने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है. पहले संगठनात्मक बदलाव की बात.
इन्हें सौंपी गयी जिलों की कमान
एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष विधायक (MLA) अख्तरुल ईमान (Akhtarul Iman) ने विगत दिनों पार्टी के नये जिला अध्यक्षों की बावत मीडिया को जानकारी दी. उनके मुताबिक कटिहार (Katihar) जिले में नदीम साहब की जगह आफताब कंचन, पूर्णिया में गुलाम सरवर (Ghulam Sarwar) की जगह शाहनवाज आलम (Shahnawaz Alam) , किशनगंज (Kishanganj) में इशहाक आलम की जगह गुलाम हसनैन तथा अररिया (Araria) में मुर्शीद आलम (Murshid Alam) की जगह मोहम्मद मंजूर को कमान सौंपी गयी है. गुलाम सरवर बायसी से और मुर्शीद आलम जोकीहाट (Jokihat) से एआईएमआईएम के विधायक हैं. किशनगंज की जिम्मेदारी पाये गुलाम हसनैन 2025 के विधानसभा चुनाव में ठाकुरगंज से और पूर्णिया की जिम्मेदारी पाये शाहनवाज आलम कसबा से पार्टी के उम्मीदवार थे. गुलाम हसनैन 08 हजार 822 मतों से चूक गये. शाहनवाज आलम 35 हजार 309 मत लाकर तीसरे स्थान पर रहे.
चुनौती बाहर से नहीं, भीतर से
सभी नये जिला अध्यक्षों ने संगठन का विस्तार करने, कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाने और पार्टी की नीतियों को आम जनता तक पहुंचाने का भरोसा दिलाया है. चुनाव भले दूर हो, राजनीतिक हलकों में इसे अगले चुनाव की प्रारंभिक तैयारी भी मानी जा रही है. लेकिन, सवाल यहां यह है कि क्या इस रूप में केवल चेहरा बदल देने से सीमांचल की चुनावी राजनीति एआईएमआईएम के लिए मुफीद हो जायेगी? विश्लेषकों का मानना है कि ऐसा नहीं होगा. पार्टी को चुनौती बाहर से नहीं, भीतर से है
यह भी पढ़ें :
‘डैमेज कंट्रोल’ की रणनीति
हाल के दिनों में इसहाक आलम (Ishaq Alam) और शाहनवाज आलम (Baisi) जैसे प्रमुख नेताओं का एआईएमआईएम से दूरी बना लेना इस बात का संकेत है कि कार्यकर्ताओं और नेतृत्व के बीच संवाद की कमी है. कार्यकर्ता पूरी तरह संतुष्ट होते तो बार-बार असंतोष की खबरें सामने नहीं आतीं. यही वजह है कि नये जिला अध्यक्षों की नियुक्ति को सिर्फ संगठनात्मक बदलाव नहीं, ‘डैमेज कंट्रोल’ की रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है. नेतृत्व यह संदेश देना चाहता है कि पार्टी नये जोश के साथ मैदान में उतर रही है.
प्रभाव सिर्फ सीमांचल में
इन सबसे अलग गौर करने वाली बात यह भी है कि अख्तरुल ईमान तकरीबन डेढ़ दशक से इस राज्य में एआईएमआईएम के सबसे बड़ा राजनीतिक चेहरा हैं. उसी समय से पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद पर भी जमे हुए हैं. पूर्णिया जिले के अमौर (Amaur) विधानसभा क्षेत्र में हुई लगातार दो जीत से उनके नेतृत्व को मजबूती मिली है. पर, प्रभाव उनका सिर्फ सीमांचल में ही दिखता है, बिहार के दूसरे हिस्से में नहीं. इस कारण उन हिस्सों में एआईएमआईएम की जन स्वीकार्यता जम नहीं पा रही है. जहां तक सीमांचल की बात है, तो लगातार दो चुनावों में पांच-पांच विधानसभा क्षेत्रों में जीत हासिल कर इसने वहां खुद को बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित कर लिया है.
ओवैसी की लोकप्रियता की देन
लेकिन, यह अप्रत्याशित कामयाबी अख्तरुल ईमान की वजह से ही हासिल हुई है, ऐसी बात नहीं. विश्लेषकों की समझ में यह एआईएमआईएम सुप्रीमो सांसद असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) की मुस्लिम समुदाय (Muslim community) में कायम लोकप्रियता की देन है. पर, इस कामयाबी के बीच से एक बड़ा सवाल भी निकल रहा है. यह कि किशनगंज संसदीय क्षेत्र मुस्लिम बहुल है. लगभग 75 प्रतिशत लोग इसी समुदाय के हैं. इस संसदीय क्षेत्र में एक अपवाद को छोड़ 1957 से लेकर 2024 तक के चुनावों में मुस्लिम समुदाय के उम्मीदवार ही निर्वाचित हुए हैं. हैरान करने वाली बात यह कि मुस्लिम हितों की राजनीति करने वाली पार्टी एआईएमआईएम को सफलता नहीं मिल पायी है.
किशनगंज में जीत क्यों नहीं?
लोग जानना चाहते हैं कि नेतृत्व मजबूत है तो फिर किशनगंज का किला क्यों नहीं फतह हो पा रहा है? जबकि 2019 और 2024 में प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान खुद उम्मीदवार थे. दोनों चुनावों में मुंह की खा गये? आखिर क्यों? यह सवाल आज भी बना हुआ है. किशनगंज संसदीय क्षेत्र की चुनावी राजनीति की गहन जानकारी रखने वालों का मानना है कि दो संसदीय चुनावों में अख्तरुल ईमान की हार इस कारण हुई कि जन समर्थन उनका एक सीमा में सिमटा हुआ है. इसके मद्देनजर उनकी जगह किसी दूसरे को उम्मीदवारी मिले, तो एआईएमआईएम का ख्वाब पूरा हो जा सकता है. सामान्य समझ में विधायक गुलाम सरवर, पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आदिल हसन (Adil Hasan) आदि कुछ दमदार चेहरे हैं जो इस कसौटी पर खरा उतर सकते हैं. यानी उम्मीदवारी मिली तो किशनगंज संसदीय क्षेत्र में गुल खिला दे सकते हैं.

अशोक कुमार सीमांचल के वरिष्ठ पत्रकार हैं
tapmanlive

