कॉकरोचों की बारात !

बांके बिहारी साव
01 अक्तूबर 2026
चरित्तर चाचा (Charittar Chacha) बन-ठनकर बैठे थे
कलई वाली धोती और कुर्ता, माथे पर पगड़ी.
पैर में चमचमाती चप्पल, चेहरे पर अजीब सी मुस्कान.
मनमोहिनी (Manmohini) को उनका यह ठाठ-बाट देखकर अजीब लग रहा था.
आजकल मनमोहिनी भी व्यस्त रह रही थी. फुलेना , उसकी पत्नी और उसका तीन साल का बेटा भी पन्द्रह दिनों से यहीं था. सो मनमोहिनी सबकुछ भुलाकर दिन-रात पोते में ही लगी रहती थी. कहावत भी है कि पोता दादी का अंतिम ‘ब्वॉय फ्रेंड’ होता है, सो मनमोहिनी उसी के साथ लट-पट में लगी रहती थी. एक दिन फुलेना की बीवी रूपमती चिढ़कर फुलेना से कह ही दी-
‘देखो जी, बचवा दिन-रात मम्मी से चिपका रहता है. कल जब हम यहां से चले जायेंगे तो वह वहां हमें तंग करेगा. बिना अपनी दादी के वह कैसे रहेगा?’
‘दादा जी भी मुझे ऐसे ही चिपकाये रखते थे, आज उनके बिना मैं रह रहा हूं कि नहीं?’
‘अपने दादा जी की बात छोड़िये! आज भी वह कितना बन-ठनकर रहते हैं.’
‘सब मम्मी की सेवा का कमाल है.’
‘मैं आपसे एक बात पूछूं? ’
‘पूछो…!’
‘मम्मी पापा के पास क्यों नहीं रहती हैं?’
‘क्योंकि मेरे पापा चोर हैं.’
‘आजकल किसका बाप चोर नहीं है?’
‘लेकिन, मम्मी को यह बर्दाश्त नहीं है.’
‘देश में नब्बे प्रतिशत बाप तो चोर हैं, पति चोर हैं तो क्या उनके बच्चे और उनकी पत्नियां उनके साथ नहीं रहती हैं? ’
‘मेरा तो मानना है कि चोर की पत्नियां ईमानदारों की बीवियों से ज्यादा सुखी हैं. वे अच्छे घरों में रहती हैं. खूब भारी-भारी गहने पहनती हैं और कपड़ों की तो बात ही मत पूछो!’ वे कपड़े व जेवरों की दुकानों में ऐसे घूसती हैं मानो दुकान खरीदने आयी हों.’
‘लेकिन, मम्मी को यह पसंद नहीं है.’
‘तभी तो आप भी…?’
‘मैं भी क्या…?’
‘एकदम ठूंठ की तरह खाली वेतन घर लाते हैं. भरी जवानी में मैं संन्यासिनों की तरह जी रही हूं.’
‘लेकिन, शांति से तो जी रही हो….’
‘ऐसी भी शांति कोई शांति है.’
‘इस शांति की परिभाषा मम्मी से पूछो!’
‘मम्मी को क्या है? बस दिन-रात दादा जी में लगी रहती हैं. ऐसी औरत को मैंने आज तक नहीं देखी, जो पति को छोड़कर अपने ससुर की सेवा में लगी रहती हैं.’
‘कल तुम्हारा बचवा भी तुमको छोड़कर दादी के पास रहने लगे, तो तुम्हें कैसा लगेगा?’
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अपने पति यानी फुलेना की बात पर रूपमती चुप हो गयी. इतने में अपने पोते को गोद में लिये मनमोहिनी हंसते हुए अंदर आयी और बोली-‘जरा जाकर अपने दादा जी की रईशी देखो! ऐसा लग रहा है जैसे वह फिर से शादी करने जा रहे हैं.
मां की बात सुनकर फुलेना अपनी पत्नी रूपमती के साथ बाहर आया तो कुर्सी पर ठाठ से बैठे दादा को देखकर वह अपनी हंसी नहीं रोक सका. हंसते हुए उसने पूछा-
‘दादा जी, बन-ठन कर कहां चले?’
‘क्या इस उम्र में स्मार्ट बनना खराब है?’
‘यह आपसे किसने कहा?’
‘फिर, मुझे देखकर तुम दोनों हंस क्यों रहे हो? अभी-अभी मनमोहिनी बिटिया भी मुझे हंसकर देख रही थी. वैसे भी आजकल उसे मेरा ध्यान कहां रहता है? जब से तुम्हारा बचवा आया है, मुझे एकदम भूल ही गयी है.’
‘आप भी तो उसी में लगे रहते हैं.’
‘यह तो मेरा परपोता है. कितने लोगों को अपने परपोते को गोद लेना नसीब होता है?’
‘फिर भी… कहीं जा रहे हैं क्या?’
‘हां…, तेलचट्टों (Cockroach) की बारात निकलने वाली है, उसी का न्यौता है.’
‘आप वहां जाकर क्या करेंगे?’
‘खायेंगे, पियेंगे, मौज करेंगे और क्या?’
‘वहां लाठी चलेगी तब…?’
‘बारात में लाठी क्यों चलेगी?’
‘गोली भी चल सकती है.’
‘तुम मुझे डरा रहे हो!’
‘आप फ्रीडम फाइटर (Freedom Fighter) हैं, आप जेपी सेनानी (JP Activist) भी रहे हैं. भला आपको कौन डरा सकता है? लेकिन, साथ में एक रेड हीट का डब्बा भी रख लीजियेगा. जरूरत पड़ी तो उसे छिड़ककर अपना बचाव कर लीजियेगा.’
‘सुना है कि उसका दुल्हा अमेरिका (America) से आया है. वह एनआरआई (NRI) है. क्या देश में आंदोलनकारियों की कमी आ गयी है?’
‘कमी क्यों नहीं आयेगी. वैसे भी हमें विदेशी माल पर अब ज्यादा भरोसा है. देश के आंदोलनकर्ता स्मार्ट नहीं लगते हैं.’
‘ओह…, तभी तो विदेशी चीज को लोग आंखों पर बिठाकर आंदोलन कर रहे हैं क्या?’
‘और नहीं तो क्या? विदेशी लीडर…,विदेशी लीडर की संतान, यही सब हमारे आज के आदर्श हैं. हो सकता है कि कल विदेशों से यहां आकर लाखों-करोड़ों लोग आंदोलन करें.’
‘क्या भारत के लोग मर गये हैं?’
‘मरे हुए हैं, तभी तो हम विदेशी तेलचट्टों को आमंत्रित कर रहे हैं.’
‘गंदगी में पैदा होने वाले तेलचट्टे क्या हमारे पवित्र भारत (India) को खरोंचने आये हैं?’
‘यह तो हम नहीं कह सकते दादा जी…, लेकिन इतना तय है कि कुछ देशी तेलचट्टे भी उनका साथ दे रहे हैं.’
‘यही तो हमारे देश की तकदीर है. जब भी हम विदेशियों से लड़ते हैं, तब-तब यहां के तेलचट्टों ने ही अपने स्वार्थ के लिए हमें हराया है.’
‘तुम तो स्वयं जेन-जी (Gen-Z) हो, फिर भी …?’
‘जेन-जी का मतलब जीनियस जेनरेशन है दादा जी. देशद्रोही (Deshdrohi) जेनरेशन नहीं.’
‘फिर भी इतना उतावलापन…, इतनी भीड़
… फिर ये तेलचट्टे…?’
‘जल्दी-जल्दी सत्ता हासिल करने के तरीके दादा जी. आजाद देश में ज्यों-ज्यों वंशवाद की पकड़ मजबूत होती जाती है, तब-तब युवा पीढ़ी चिढ़कर लड़ने पर उतारू हो जाती है. और वैसे आंदोलनों का फायदा विदेशी लोग भी उठाते हैं.’
‘लेकिन, ये स्कूल-कालेजों में…’
‘क्या अस्सी वर्षों से हमारी शिक्षा (Education) व्यवस्था ऐसी ही नहीं चल रही है. जहां-जहां टीचर चरित्रवान हैं, वहां की पढ़ाई आज भी ठीक है. शिक्षा तो शिक्षकों के चरित्र पर निर्भर है दादा जी…,वेतन और सुविधाओं पर नहीं.’
‘शायद तुम ठीक कह रहे हो…,’
‘फिर भी जरा… और कहते हुए चरित्तर चाचा हाथ में डंडा पकड़कर बाहर निकल गये यह सोचते हुए कि क्या जेपी आंदोलन के समय मैं भी तो जेन-जी ही था…, फिर उस वक्त यह शब्द क्यों नहीं था. शायद इसलिए कि हम शुद्ध क्रांतिकारी (krantikari) और अब…?’

बांके बिहारी साव बिहार के बहुचर्चित व्यंग्यकार एवं कहानीकार हैं.
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