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Major issue : महिलाओं की सुरक्षा… समझिये, सर्वोच्च अदालत की चिंता को

सुरक्षा सुनिश्चित करना शासन की जिम्मेदारी
सार्वजनिक उद्यानों पर विशेष ध्यान रखा जाये
केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है
सुरक्षा का अर्थ स्वतंत्रता पर प्रतिबंध नहीं
 

महेन्द्र तिवारी
06 अक्तूबर 2026
New Delhi : महिलाओं की सुरक्षा किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज (Society) की बुनियादी कसौटी होती है. यदि किसी शहर (City) में महिलाएं दिन हो या रात, सड़क पर चलने, सार्वजनिक परिवहन से यात्रा करने या किसी सार्वजनिक स्थान पर जाने से पहले अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहें, तो यह केवल कानून व्यवस्था (Law and order) का प्रश्न नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक तंत्र के सामने गंभीर चुनौती है. राष्ट्रीय राजधानी (National Capital) दिल्ली और उसके आसपास महिलाओं तथा बच्चियों के खिलाफ हाल में सामने आयीं यौन हिंसा की घटनाओं पर देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) की सख्ती इसी व्यापक चिंता को सामने लाती है. 05 अक्तूबर 2026 को सुनवाई के दौरान न्यायालय ने स्पष्ट संकेत दिया कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए अपराध होने के बाद कार्रवाई करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपराध को होने से पहले रोकने की प्रभावी व्यवस्था तैयार करना जरूरी है.

सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली पुलिस (Delhi Police) और केंद्र सरकार (Central government) से ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा है, जिसमें राजधानी की कोई भी महिला रात के समय भी स्वयं को असुरक्षित महसूस नहीं करे. न्यायालय ने यह सवाल केवल सुनसान सड़कों या निर्जन स्थानों के संदर्भ में नहीं उठाया, बल्कि सार्वजनिक परिवहन, भूमिगत रेल, सड़कों और अन्य सार्वजनिक स्थलों तक इसे व्यापक बनाया. अदालत की चिंता का मूल आधार यह है कि महिलाओं की स्वतंत्र आवाजाही को समय और स्थान के भय से सीमित नहीं किया जाना चाहिए. यदि कोई महिला रात 10 या 11 बजे अपने काम, शिक्षा या किसी अन्य आवश्यक कार्य से घर लौट रही है, तो उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना शासन और पुलिस व्यवस्था की जिम्मेदारी है.

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि न्यायालय ने अपराध की रोकथाम को अपनी चिंता के केंद्र में रखा है. सामान्यतः किसी अपराध के बाद पुलिस द्वारा प्राथमिकी दर्ज करना, आरोपी की गिरफ्तारी करना और जांच पूरी करना आवश्यक कानूनी प्रक्रिया है, लेकिन उससे पहले का चरण कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. यदि किसी क्षेत्र को पहले से संवेदनशील माना जाता है, वहां पर्याप्त रोशनी नहीं है, निगरानी व्यवस्था कमजोर है, पुलिस की नियमित गश्त नहीं होती या वहां सुनसान स्थान अपराधियों के लिए आसान अवसर पैदा करते हैं, तो इन कमियों को दूर करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए. सर्वोच्च अदालत ने इसी सोच को रेखांकित करते हुए कहा कि महत्वपूर्ण यह है कि अपराध को रोका जाये, न कि केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई की जाये.

28 सितंबर 2026 को सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में महिलाओं तथा बच्चों की सुरक्षा को लेकर स्वतः संज्ञान लेते हुए कई महत्वपूर्ण निर्देश दिये थे. न्यायालय ने संवेदनशील स्थानों की पहचान करने, ऐसे क्षेत्रों का विस्तृत मानचित्र (Map) तैयार करने, सार्वजनिक उद्यानों और अन्य स्थानों में प्रकाश व्यवस्था की जांच करने तथा निगरानी कैमरों (Surveillance cameras) की स्थिति का परीक्षण करने को कहा था. इसके साथ ही पुलिस गश्त की व्यवस्था को मजबूत करने और उन स्थानों की पहचान करने के निर्देश दिये गये थे, जहां खराब प्रकाश, अपर्याप्त निगरानी,  सुनसान क्षेत्र, परित्यक्त इमारतें या कमजोर प्रवेश नियंत्रण अपराध का खतरा बढ़ा सकते हैं. इन कार्यों के लिए चार सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने को कहा गया है.

न्यायालय का यह निर्देश विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान केवल अनुमान के आधार पर नहीं, बल्कि अपराध संबंधी आंकड़ों, स्थानीय सूचनाओं, पहले प्राप्त शिकायतों और वहां हुई पिछली घटनाओं के आधार पर की जाये. इसका अर्थ यह है कि पुलिस व्यवस्था को केवल घटना घटने के बाद सक्रिय होने वाली व्यवस्था के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. उसे संभावित खतरे को पहले पहचानने वाली व्यवस्था में बदलना होगा. किसी इलाके में यदि बार-बार महिलाओं से छेड़छाड़, पीछा करने या अन्य अपराधों की शिकायतें मिलती हैं, तो उस स्थान को सामान्य क्षेत्र मानकर छोड़ देना उचित नहीं हो सकता. वहां अतिरिक्त गश्त, बेहतर प्रकाश व्यवस्था और निगरानी की आवश्यकता हो सकती है.

दिल्ली के सार्वजनिक उद्यानों की स्थिति ने भी इस चिंता को गंभीर बनाया है. हाल की एक सुरक्षा जांच में दिल्ली विकास प्राधिकरण के अधीन 736 उद्यानों में से केवल 16 में निगरानी कैमरे पाये जाने की जानकारी सामने आयी, जबकि 190 उद्यानों को अधिक जोखिम वाला बताया गया. इसके अलावा 520 उद्यानों में प्रकाश व्यवस्था सुधारने और 323 उद्यानों में अतिरिक्त निगरानी कैमरे लगाने की आवश्यकता बतायी गयी. ऐसे आंकड़े यह सोचने के लिए मजबूर करते हैं कि केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है. उनका जमीन पर कितना प्रभाव पड़ा, यह देखना भी उतना ही जरूरी है.

महिला सुरक्षा के लिए निगरानी कैमरे लगाना उपयोगी उपाय हो सकता है, लेकिन कैमरे स्वयं सुरक्षा की गारंटी नहीं होते. यदि उनकी लगातार निगरानी नहीं हो रही है, खराब कैमरे समय पर ठीक नहीं किये जाते या किसी घटना की सूचना मिलने पर पुलिस तुरंत नहीं पहुंचती, तो पूरी व्यवस्था का उद्देश्य कमजोर हो जाता है. इसलिए निगरानी व्यवस्था के साथ प्रशिक्षित पुलिसकर्मियों की उपलब्धता, नियमित गश्त, पर्याप्त प्रकाश, आपात सहायता और त्वरित प्रक्रिया को एक साथ मजबूत करना आवश्यक है. सर्वोच्च अदालत ने इसी कारण यह जानना चाहा है कि राजधानी में स्थापित सुरक्षा व्यवस्थाएं वास्तव में काम कर रही हैं या केवल कागजों में मौजूद हैं.

महिलाओं की सुरक्षा का प्रश्न केवल पुलिस और प्रशासन तक सीमित नहीं है. सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था, नगर निकाय, विद्यालय (School) और महाविद्यालय (University) , बाजार (Market) , उद्यान तथा स्थानीय समुदाय भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. किसी महिला को सुरक्षित वातावरण देने के लिए बस अड्डों, रेल और भूमिगत रेल स्टेशनों, शिक्षण संस्थानों तथा बाजारों के आसपास पर्याप्त प्रकाश और निगरानी जरूरी है. साथ ही ऐसी जगहों पर महिलाओं के लिए सहायता प्राप्त करने की स्पष्ट व्यवस्था भी होनी चाहिए. यदि किसी महिला को संकट के समय यह पता ही न हो कि सहायता कहां से और कैसे मिलेगी, तो उपलब्ध संसाधनों का पूरा लाभ नहीं मिल सकता.

सुरक्षा का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष पुलिस और आम नागरिकों के बीच विश्वास है. यदि महिलाएं किसी घटना की शिकायत करने में संकोच करती हैं या उन्हें यह भरोसा नहीं होता कि उनकी शिकायत को गंभीरता से लिया जायेगा, तो अपराधों (Crimes) की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आ पायेगी. पुलिस को संवेदनशील व्यवहार, त्वरित सुनवाई और पीड़ितों की गरिमा की रक्षा पर विशेष ध्यान देना होगा. महिलाओं को यह भरोसा होना चाहिए कि शिकायत करने पर उन्हें सामाजिक दबाव, उपेक्षा या अनावश्यक परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा.

सर्वोच्च अदालत ने यौन अपराधों से जुड़े अपराधियों के राष्ट्रीय आंकड़ा तंत्र के उपयोग और ऐसे मामलों की जांच की निगरानी से संबंधित व्यवस्थाओं के बारे में भी जानकारी मांगी है. इसका उद्देश्य यह जानना है कि पहले से अपराधों में शामिल व्यक्तियों की जानकारी का कानून के दायरे में किस प्रकार उपयोग किया जा रहा है और यौन अपराधों की जांच समय पर पूरी हो रही है या नहीं. न्यायालय ने यह भी जानना चाहा है कि महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी विभिन्न योजनाएं वास्तव में कितने लोगों तक पहुंच रही हैं और उनकी प्रभावशीलता का आकलन किस प्रकार किया जाता है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि महिलाओं की सुरक्षा का अर्थ महिलाओं की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाना नहीं हो सकता. समाधान यह नहीं है कि महिलाओं से कहा जाये कि वे रात में घर से बाहर न निकलें या सुनसान स्थानों पर न जायें. वास्तविक समाधान ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें पुरुष और महिला दोनों नागरिक अपने अधिकारों का स्वतंत्र रूप से उपयोग कर सकें. सार्वजनिक स्थान किसी एक वर्ग के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए होते हैं. उन्हें सुरक्षित बनाना राज्य की जिम्मेदारी है.

सर्वोच्च अदालत की मौजूदा पहल इसी व्यापक जिम्मेदारी की याद दिलाती है. कानून का भय अपराधी के मन में होना चाहिए और सुरक्षा का विश्वास आम नागरिक के मन में. यदि पुलिस गश्त प्रभावी हो, सार्वजनिक स्थानों पर पर्याप्त प्रकाश हो, निगरानी व्यवस्था सक्रिय हो, शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई हो और संभावित अपराध की पहले से पहचान कर उसे रोकने का प्रयास किया जाए, तो महिलाओं की सुरक्षा में वास्तविक सुधार संभव है. दिल्ली जैसी राजधानी के लिए यह केवल प्रशासनिक लक्ष्य नहीं, बल्कि नागरिक गरिमा का प्रश्न है. किसी महिला का रात में अकेले सड़क पर चलना अपने आप में असुरक्षा का कारण नहीं होना चाहिए. उसे यह विश्वास होना चाहिए कि कानून उसके साथ है और शासन व्यवस्था उसकी सुरक्षा के लिए सक्रिय है. सर्वोच्च अदालत का संदेश इसी विश्वास को वास्तविकता में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है.

महेन्द्र तिवारी काफी चर्चित लेखक हैं.

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