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Ujjain’s Unwavering Hanuman! : चमत्कार या विशिष्ट शिल्पकला?

प्रतिमा का न हिलना लोगों के लिए आश्चर्य
खड़ी मुद्रा में है आठ फीठ ऊंची प्रतिमा
‘डाक्टर हनुमान’ के नाम से भी जानते हैं लोग
वैज्ञानिक अध्ययन श्रद्धा के विरुद्ध नहीं

महेन्द्र तिवारी
05 अक्तूबर 2026

New Delhi : उज्जैन (Ujjain) केवल महाकाल (Mahakal) की नगरी ही नहीं, भारत (India) की प्राचीन सांस्कृतिक चेतना का एक जीवंत केन्द्र भी है. वहां की हर गली, हर मंदिर और हर शिला अपने भीतर इतिहास की अनगिनत परतें समेटे हुए है. इन दिनों इसी पवित्र नगरी का एक स्थल पूरे देश का ध्यान आकर्षित कर रहा है. यह स्थल है खड़े हनुमान जी (Hanuman ji) की वह प्राचीन प्रतिमा, जो सड़क चौड़ीकरण के दौरान मंदिर का ढांचा हट जाने के बाद भी अपने स्थान पर अडिग खड़ी है. भारी मशीनों, अभियंताओं और अन्य विशेषज्ञों के अनेक प्रयासों के बावजूद प्रतिमा का न हिलना लोगों के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ है. किसी ने इसे दिव्य चमत्कार कहा, किसी ने प्राचीन भारतीय स्थापत्य का अद्भुत उदाहरण माना तो किसी ने वैज्ञानिक परीक्षण (Scientific testing) की आवश्यकता पर बल दिया. यही कारण है कि यह वाकया केवल एक स्थानीय समाचार न रहकर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनी हुई है.

पूरा घटनाक्रम सिंहस्थ: 2028 की तैयारियों के अंतर्गत आरंभ हुई सड़क चौड़ीकरण योजना से जुड़ा है. उज्जैन के सती गेट और बड़ा सराफा क्षेत्र में यातायात सुगम बनाने के लिए पुरानी संरचनाओं को हटाया जा रहा था. इसी क्रम में लगभग 170 वर्ष पुराने खड़े हनुमान मंदिर का बाहरी ढांचा हटाया गया. प्रशासन का उद्देश्य प्रतिमा को सुरक्षित स्थान पर स्थापित करना था, किंतु जब उसे स्थानांतरित करने का प्रयास हुआ तो स्थिति अप्रत्याशित बन गयी. कई दिनों तक क्रेन, उत्खनन उपकरण और विशेषज्ञों की सहायता ली गयी, परंतु प्रतिमा अपने स्थान से टस से मस नहीं हुई. इसके बाद प्रशासन (Administration) ने जल्दबाजी रोककर स्थल को सुरक्षित कर दिया और उच्च तकनीकी अध्ययन कराने का निर्णय लिया.

खड़े हनुमान जी की प्रतिमा सामान्य धार्मिक प्रतिमाओं से कुछ भिन्न है. यह लगभग आठ फुट ऊंची खड़ी मुद्रा में स्थापित है और स्थानीय लोगों के बीच लंबे समय से विशेष श्रद्धा का केन्द्र रही है. क्षेत्र में इसे अनेक लोग डाक्टर हनुमान के नाम से भी जानते हैं, क्योंकि वर्षों से बीमार लोग यहां स्वास्थ्य लाभ की कामना लेकर आते रहे हैं. मंदिर भले ही आकार में बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन इसकी धार्मिक आस्था अत्यंत व्यापक थी. यही कारण है कि जैसे ही प्रतिमा के स्थानांतरण का समाचार फैला, हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचने लगे और वहां भजन, कीर्तन तथा पूजा का क्रम निरंतर चलने लगा.

इस घटना का सबसे रोचक पक्ष यह है कि अभी तक किसी भी आधिकारिक संस्था ने इसे चमत्कार घोषित नहीं किया है. प्रशासन का कहना है कि प्रतिमा को नुकसान पहुंचाये बिना सुरक्षित हटाना ही प्राथमिकता है. दूसरी ओर पुरातत्व और स्थापत्य विशेषज्ञों का मानना है कि संभव है प्रतिमा केवल ऊपर दिखाई देने वाले भाग तक सीमित न हो, बल्कि उसका आधार बहुत गहराई तक एक ही विशाल शिला के रूप में स्थापित हो. भारत के अनेक प्राचीन मंदिरों (Ancient temples) में ऐसी तकनीक मिलती है, जहां प्रतिमा और उसका आधार एकीकृत संरचना के रूप में निर्मित किया जाता था. यदि ऐसा है, तो बाहरी आकार देखकर उसका वास्तविक भार और गहराई का अनुमान लगाना संभव नहीं है.

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, इंदौर (Indore) के विशेषज्ञों को भी इसी उद्देश्य से बुलाया गया कि वे स्थल का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करें. आधुनिक परीक्षणों के माध्यम से यह जाना जायेगा कि प्रतिमा किस प्रकार की शिला से निर्मित है, उसका भूमिगत आधार कितना विस्तृत है और बिना क्षति पहुंचाये उसे स्थानांतरित करना संभव है या नहीं. विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी ऐतिहासिक प्रतिमा पर बलपूर्वक यांत्रिक दबाव डालना उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे सूक्ष्म दरारें उत्पन्न हो सकती हैं जो भविष्य में गंभीर क्षति का कारण बन जा सकती हैं. इसलिए तकनीकी धैर्य इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष बन गया है.

सोशल मीडिया (Social Media) ने इस घटना को और भी व्यापक बना दिया. अनेक वीडियो में दिखाई देता है कि मंदिर का ढांचा हट चुका है, चारों ओर मलबा पड़ा है, लेकिन बीच में हनुमान जी की प्रतिमा पूर्ण संतुलन के साथ खड़ी है. इन दृश्यों ने करोड़ों लोगों की भावनाओं को स्पर्श किया. कुछ लोगों ने इसे ईश्वरीय संकेत बताया, तो कुछ ने बिना प्रमाण अनेक कल्पित कथाएं भी जोड़ दीं. यहीं पर तथ्य और कल्पना के बीच अंतर समझना आवश्यक हो जाता है. सत्य यह है कि प्रतिमा वास्तव में अपने स्थान पर अडिग है और उसे हटाने के प्रयास अभी तक सफल नहीं हुए हैं. किंतु यह कहना कि वैज्ञानिकों ने इसे दैवीय चमत्कार घोषित कर दिया है, पूरी तरह असत्य है. अब तक उपलब्ध सभी आधिकारिक सूचनाएं केवल तकनीकी अध्ययन और संरक्षा की बात करती हैं.

इस प्रसंग ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाया है कि विकास और विरासत के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाये. भारत जैसे प्राचीन सभ्यता वाले देश में नगरों के विस्तार की स्वाभाविक आवश्यकता है. सड़कें चौड़ी हों, यातायात सुधरे और नागरिक सुविधाएं बढ़ें, यह भी आवश्यक है. किंतु इसके साथ ही ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहरों का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है. यदि किसी परियोजना के कारण सदियों पुरानी प्रतिमा या सांस्कृतिक स्मारक प्रभावित होता है, तो केवल प्रशासनिक निर्णय पर्याप्त नहीं होता. वहां इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, अभियंताओं और स्थानीय समाज सभी की सहभागिता आवश्यक हो जाती है. उज्जैन का यह प्रसंग भविष्य की विकास योजनाओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण सीख प्रस्तुत करता है.

इतिहास की दृष्टि से भी यह प्रतिमा अत्यंत रोचक है. कुछ पुरातत्व विशेषज्ञों ने प्रारंभिक आकलन में इसकी शैली को राजा भोज कालीन परंपरा से जुड़े रहने की संभावना व्यक्त की है, जबकि अन्य विशेषज्ञ अभी किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले वैज्ञानिक परीक्षण की प्रतीक्षा करने की बात कह रहे हैं. इसका अर्थ यह है कि प्रतिमा की वास्तविक आयु और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर अंतिम निर्णय अभी शेष है. भारतीय पुरातत्व में अनुमान और प्रमाण के बीच यही वैज्ञानिक अनुशासन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. जब तक परीक्षण पूर्ण न हो जाये, तब तक किसी भी दावे को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता.

भारतीय परंपरा में आस्था और विज्ञान को कभी परस्पर विरोधी नहीं माना गया. हमारे प्राचीन मंदिर स्वयं उत्कृष्ट गणित, वास्तु और शिल्प विज्ञान (Science of Craftsmanship) के अद्भुत उदाहरण हैं. इसलिए यदि कोई प्रतिमा अपनी स्थापत्य संरचना के कारण अत्यंत दृढ़ है, तो उसका वैज्ञानिक अध्ययन करना श्रद्धा के विरुद्ध नहीं है. उसी प्रकार यदि करोड़ों लोगों की भावनाएं उस प्रतिमा से जुड़ी हैं, तो उनका सम्मान करना भी सभ्य समाज का कर्तव्य है. खड़े हनुमान जी की प्रतिमा हमें यही संदेश देती है कि सत्य की खोज धैर्य, संवेदनशीलता और प्रमाण के साथ होनी चाहिए.

महेन्द्र तिवारी काफी चर्चित लेखक हैं.

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