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Panchayati Raj in Bihar : ताज महिलाओं को, राज पुरुषों का ही !

प्रदीप कुमार नायक
04 अक्तूबर 2026
Madhubani : बिहार (Bihar) के गांवों से लेकर राज्य की राजधानी (Capital) तक एक तस्वीर बहुत आम है. पंचायत भवन के बाहर नेम प्लेट पर ‘मुखिया- श्रीमती फलां देवी’ लिखा मिलेगा. कार्यालय के अंदर कुर्सी पर महिला बैठी होगी, लेकिन संचिका आगे-पीछे करने वाला, सरकारी अधिकारियों से बात करने वाला, ठेकेदार से सौदा करने वाला आमतौर पर कोई पुरुष दिखेगा. वर्तमान में यही हमारे लोकतंत्र (Democracy) का सबसे बड़ा विरोधाभास है. पंचायती राज (Panchayati Raj) में ताज महिलाओं के सिर पर है, राज पूर्व की तरह पुरुषों का ही चल रहा है. संविधान में 73वें संशोधन और बिहार में 50 प्रतिशत आरक्षण (Reservation) लागू होने के बाद पंचायतों की व्यवस्था पूरी तरह बदल गयी है. 50 प्रतिशत पद महिलाओं के लिए आरक्षित हो गये. आंकड़े बताते हैं कि बिहार में 08 हजार 442 मुखिया (mukhiya) हैं. उनमें तकरीबन 05 हजार महिला मुखिया हैं.

कागज पर यह क्रांति है. पर, जमीनी हकीकत कुछ अलग है. गांवों में आमतौर पर महिला मुखिया के पति ‘एमपी’ यानी ‘मुखिया पति’ और महिला सरपंच (Sarpanch) के पति ‘एसपी’ यानी ‘सरपंच पति’ कहलाते हैं. अधिकतर मामलों में चुनाव का प्रचार पति करता है, पत्नी को आगे रख वोट मांगने घर-घर वही जाता है. जीतने के बाद शपथ महिला लेती है, लेकिन पंचायत की बैठक में अंतिम फैसला पति का होता है. सरकारी बैठकों में महिला मुखिया बगल में बैठी रहती है. बातचीत और निर्णय उसका पति या देवर करता है. बैंक (Bank) में साइन के लिए अंगूठा महिला का लगता है, लेकिन चेक कौन भरेगा, किस ठेकेदार को काम मिलेगा, सब तय पुरुष करता है. मां के मुखिया रहने की स्थिति में यह सब काम प्रायः उसका पुत्र करता है.

इसके पीछे कई वजहें हैं. पहली वजह शिक्षा (Education) और अनुभव (Experience) की कमी है. सदियों से राजनीति (Politics) और सरकारी (Government) कामकाज से दूर रखी गयीं महिलाओं (Women) को अचानक पंचायत चलाने की जिम्मेदारी मिल गयी. फाइलें, बजट, योजना, ऑनलाइन पोर्टल-यह सब उनके लिए नया है. ऐसे में घर का पुरुष (Male) ‘मदद’ के नाम पर पूरी कमान संभाल लेता है. दूसरी वजह सामाजिक सोच है. आज भी कई गांवों में यह माना जाता है कि महिला बाहर जाकर अधिकारियों से नहीं मिल सकती, रात में बैठक नहीं कर सकती, ठेकेदारों से मोलभाव नहीं कर सकती. इसलिए ‘घर की इज्जत’ बचाने के नाम पर पुरुष मोर्चा संभाल लेता है. तीसरी और सबसे कड़वी वजह सत्ता और पैसे का लालच है. पंचायत में 15वें वित्त आयोग, मनरेगा, आवास योजना का करोड़ों का बजट आता है. उस पर नियंत्रण छोड़ना कोई नहीं चाहता है.

नतीजा यह होता है कि आरक्षण का मकसद अधूरा रह जाता है. आरक्षण का मकसद सिर्फ कुर्सी पर महिला को बैठाना नहीं, उनसे जुड़े मुद्दे जैसे शौचालय, आंगनबाड़ी, स्कूल, स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना था. लेकिन, जब निर्णय पुरुष ले रहा है तो प्राथमिकताएं भी वही रहती हैं जो पहले थीं. हालांकि, तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है. बिहार के ही कई जिलों में ऐसी महिला मुखिया और सरपंच हैं जिन्होंने इस ‘प्रॉक्सी राज’ (Proxy Rule) को तोड़ा है. स्वतंत्र रूप से पंचायतों की कमान खुद संभाल रखी हैं. मधुबनी, दरभंगा, (Darbhanga) सहरसा (Sarhasa) की कई महिलाओं ने खुद पढ़ाई की, खुद मीटिंग की, खुद अधिकारियों को घेरा. शुरू में विरोध हुआ, ताने मिले, लेकिन धीरे-धीरे गांव वालों ने माना कि काम हो रहा है तो चेहरा कोई भी हो. सुखद बात है कि ऐसी महिलाएं अब दूसरी महिलाओं के लिए आदर्श बन रही हैं.

समाधान सिर्फ कानून (Law) बनाने से नहीं निकलेगा. जरूरत है प्रशिक्षण की. पंचायती राज विभाग को हर नयी महिला जनप्रतिनिधि को 15 दिन का अनिवार्य प्रशिक्षण देना होगा. बैंकिंग, आरटीआई, सरकारी पोर्टल, बजट बनाना-यह सब सिखाना होगा. जरूरत है सुरक्षा की. ताकि कोई महिला बिना डर के यह कह सके कि ‘यह मेरी पंचायत है और फैसला मैं लूंगी’. और, सबसे ज्यादा जरूरत है सोच बदलने की. गांव को यह समझना होगा कि वोट महिला को दिया है तो काम भी उसी से मांगना है, उसी को करना है. लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब नेम प्लेट पर जो नाम होगा, कलम भी उसी की चलेगी. वरना हम 50 प्रतिशत आरक्षण का राग अलापते रहेंगे और हकीकत में राज वही पुराने तरीके से चलता रहेगा. ताज महिलाओं के सिर पर शोभा की चीज बनकर रह जायेगा और सत्ता की चाबी पुरुष की जेब में होगी. असली स्वराज तब आयेगा जब मुखिया कहने पर गांव के लोग महिला की तरफ देखें, उसके पति की तरफ नहीं.

प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार हैं.

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