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सूर्यगढ़ा और प्रह्लाद यादव : गुल तो खिलायेंगे ही!

तापमान लाइव ब्यूरो
03 नवम्बर 2025

Surjgarha : सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्र (Suryagarha Assembly Constituency) में राजद (RJD) की उम्मीदवारी के लिए दावेदारों की कतार पार्टी के अब तक के इतिहास में पहली बार दिखी. ऐसा इसलिए हुआ कि राजद की उम्मीदवारी पहले एक खूंटे से बंधी थी. इसे संयोग ही कहेंगे कि 2025 का चुनाव आते-आते वह खूंटा खुद-ब-खुद उखड़ गया. राजनीति की हल्की-फुल्की समझ रखने वालों को भी मालूम है कि राजद की उम्मीदवारी पर पच्चीस-तीस वर्षों से प्रहलाद यादव (Prahlad Yadav) का एकाधिकार था. इसके मद्देनजर दूसरा कोई प्रयास ही नहीं करता था. 1995 में पहली बार प्रहलाद यादव निर्दलीय मैदान में उतरे थे. कहते हैं कि उनकी जीत का ‘नगाड़ा’ लालू प्रसाद ने बजवा दिया था. तब से राजनीति में वह लालू प्रसाद (Lalu Prasad) के और लालू प्रसाद उनके थे.

खत्म हो गया एकाधिकार

अंदरूनी वजह जो रही हो, फरवरी 2024 में विधानसभा में विश्वास मत प्रस्ताव पर राजद के विधायक रहते प्रहलाद यादव ने नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के नेतृत्व वाली एनडीए (NDA) सरकार का साथ दे एकबारगी राह बदल ली, तो राजनीति चौंक गयी. उनके ‘हृदय परिवर्तन’ के मर्म को समझ नहीं पायी. विश्वास मत के दिन उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा (Vijay Kumar Sinha) उन्हें साथ ले विधानसभा में पहुंचे थे. बातें कई तरह की हुईं. बहरहाल, प्रहलाद यादव के ‘निष्ठा’ बदल लेने से और जो हुआ सो हुआ ही, सूर्यगढ़ा से राजद की उम्मीदवारी पर उनका एकाधिकार एक झटके में खत्म हो गया. बदले हालात में प्रहलाद यादव भाजपा (BJP) की उम्मीदवारी के लिए प्रयासरत थे.

समझ नहीं पाये लोग

उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा उनके पैरोकार थे. पर, जदयू (JDU) के नीति निर्धारकों में शामिल केन्द्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह (Rajiv Ranjan Singh alias Lallan Singh) ने वैसा नहीं होने दिया. लखीसराय (Lakhisarai) की राजनीति के लिए यह भी चौंकने वाली बात रही. इसलिए कि प्रहलाद यादव के बारे में चर्चा आम थी कि राजनीति वह राजद की जरूर करते थे, पर अंदरूनी तालमेल ललन सिंह से बैठा एक-दूसरे का हित साधते थे. इस अघोषित घनिष्ठता के मद्देनजर लोग समझ नहीं पाये कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि एनडीए से जुड़ने के बाद प्रहलाद यादव अचानक से ललन सिंह की नजरों में ‘लखीसराय का आतंक’ बन गये? कारण और भी हो सकते हैं, पर विश्लेषकों की समझ में इसकी दो मुख्य वजहें हैं. एक उनके विजय कुमार सिन्हा का ‘सिपहसालार’ बन जाना है. दूसरा उनकी कथित रिश्तेदारी से जुड़ा है.

सवाल आन का था

कहा जाता है कि प्रहलाद यादव की सूर्यगढ़ा थाना क्षेत्र (Suryagarha police station area) के निस्ता गांव में रिश्तेदारी है. नजदीक की रिश्तेदारी है या दूर की या सिर्फ राजनीतिक संबंध भर है, यह नहीं कहा जा सकता. वैसे, चर्चा है कि निस्ता गांव के पूर्व मुखिया राकेश कुमार रंजन उर्फ पप्पू यादव से उनकी घनिष्ठता है. पप्पू यादव ने मुंगेर (Munger) में भी आलिशान आशियाना बना रखा है. कासिम बाजार (Kasim Bazar) थाना क्षेत्र के दक्षिण शास्त्रीनगर में. पुश्तैनी गांव निस्ता में उनकी दबंगता है. सूर्यगढ़ा थाने में कई आपराधिक मामले भी दर्ज हैं. आरोप है कि राकेश कुमार रंजन उर्फ पप्पू यादव के समर्थकों ने 2024 के संसदीय चुनाव में निस्ता पंचायत में जदयू समर्थकों को वोट नहीं देने दिया. सच क्या है, यह नहीं कहा जा सकता. हालांकि, उन मतों की संख्या कोई ज्यादा नहीं थी. पर, सवाल आन का था. संदेह विधायक प्रहलाद यादव पर भी गया. कारण कि यादव बहुल निस्ता में उनका मजबूत जनाधार है.

तब परिदृश्य बदल देते

यह सब तो था ही, कहते हैं कि मुंगेर से जुड़े एक मामले में प्रहलाद यादव ने जाने-अनजाने राकेश कुमार रंजन उर्फ पप्पू यादव के लिए पैरवी कर दी. ललन सिंह का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया. परिणामस्वरूप एनडीए में प्रहलाद यादव का पत्ता साफ हो गया. जात गंवाने के बाद भी भात नहीं मिल पाया. ललन सिंह को अपने संसदीय क्षेत्र मुंगेर की राजनीति भी दुरुस्त रखनी थी, एनडीए में लखीसराय जिला जदयू के अध्यक्ष (Lakhisarai District JDU President) रामानंद मंडल (Ramanand Mandal) को सूर्यगढ़ा से फिर उम्मीदवारी मिल गयी. सामान्य स्थिति रहती, तो बड़ी बेशर्मी और बेरहमी से हाथ मलने के लिए छोड़ दिये गये प्रहलाद यादव निर्दलीय मैदान में उतर चुनाव का परिदृश्य बदल देते.

हिसाब तो बराबर करेंगे ही

परन्तु, ऐसा इस वजह से नहीं कर पाये कि सियासी छल-कपट के बीच अचानक से उन पर दुखों का पहाड़ टूट गया. जिस बड़े पुत्र विनय कुमार को उन्होंने सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्र की विरासत सौंपने का सपना बुन रखा था, दुर्भाग्यवश भरी जवानी में उसकी मृत्यु हो गयी. प्रहलाद यादव अंदर से टूट गये. भरे मन से उन्होंने सूर्यगढ़ा के चुनाव से खुद को अलग कर लिया. लेकिन, विश्लेषकों की समझ में जदयू, विशेष कर ललन सिंह ने उन्हें जो बेहिसाब दर्द दिया है उसका हिसाब तो वह बराबर करेंगे ही. वह हिसाब और कुछ से नहीं, जदयू उम्मीदवार की हार से ही बराबर हो सकता है.

उस सीने में भी सुलग रही आग

राजनीतिक प्रतिशोध की कुछ वैसी ही आग निर्दलीय ताल ठोक रहे शिवशंकर प्रसाद सिंह उर्फ अशोक (Shivshankar Prasad Singh alias Ashok) के सीने में भी सुलग रही है. अभी से नहीं, 2020 के चुनाव के वक्त से ही. उस चुनाव में वह सूर्यगढ़ा से जदयू की उम्मीदवारी (JDU’s candidature from Suryagarha) चाहते थे. तब वह ललन सिंह के सर्वाधिक विश्वस्त थे. उनके सौजन्य से ख्वाब पूरा हो जाने का भरोसा था. परन्तु, सामान्य समझ में ललन सिंह ने ही अड़ंगा लगा दिया. जदयू की उम्मीदवारी रामानंद मंडल को मिल गयी. शिवशंकर प्रसाद सिंह उर्फ अशोक लोजपा का उम्मीदवार बन गये. प्रहलाद यादव राजद के उम्मीदवार थे. तीनों के बीच कांटे की टक्कर हुई. बाजी प्रहलाद यादव के हाथ लग गयी.

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