बलरामपुर-बारसोई : छूट गयी रुलाई… सेक्यूलर मुसलमान तय करते हैं परिणाम!

अशोक कुमार
23 दिसम्बर 2025
Purnia : बारसोई उत्तर-पूर्व सीमांचल में पश्चिम बंगाल से सटा बिहार का एक महत्वपूर्ण भूभाग है. कटिहार (Katihar) जिले के इस हिस्से में मुसलमानों की घनी आबादी है. लेकिन, चुनाव के दृष्टिकोण से उनमें राजनीतिक व वैचारिक भिन्नता दिखती है. विश्लेषकों की समझ में वहां मुस्लिम मिजाज की मुख्यतः तीन धाराएं हैं.बड़ा तबका सेक्यूलर मुसलमानों का है, तो धार्मिक मान्यताओं में बंधे लोगों की भी बड़ी तादाद है. ऐसे लोगों को आमतौर पर ‘कट्टर’ कहा जाता है. चूंकि बारसोई (Barsoi) पश्चिम बंगाल (West Bengal) की सीमा पर है इसलिए एक तबका वामपंथी मिजाज वालों का भी है. ऐसे मिजाज वालों की प्रतिबद्धता मुख्य रूप से भाकपा-माले (CPI-ML) के पूर्व विधायक महबूब आलम (Mahboob Alam) से जुड़ी हुई है. सेक्यूलर तबके को जितना परहेज कट्टरता से है, कमोबेश उतनी ही नफरत वामपंथ (Vampanth) से है. विशेषकर नक्सलवादी (Naxalite) विचारधारा से.
तब पड़ जाती थी मुंह की खानी
इतिहास बताता है कि इसी सेक्यूलर तबके के रुख से बारसोई-बलरामपुर (Barsoi-Balrampur) विधानसभा क्षेत्र के चुनावों के परिणाम तय होते हैं. तकरीबन 75 प्रतिशत मुस्लिम आबादी रहने के बाद भी कभी-कभार गैर मुस्लिम प्रत्याशी को कामयाबी मिल जाती है, तो अन्य कारणों के अलावा उसमें सेक्यूलर मुसलमानों की भी बड़ी भूमिका हुआ करती है. परिस्थितियों के हिसाब से यह तबका दुलालचन्द्र गोस्वामी (Dulalchandra Goswami) का साथ देता था, तब वह जीत जाते थे. मुंह फेर लेता था, तब मुंह की खानी पड़ जाती थी. 2025 के चुनाव में लोजपा (रामविलास) (LJP-R) की गैर मुस्लिम उम्मीदवार संगीता देवी (Sangeeta Devi) की जीत में ऐसा ही कुछ हुआ है. कैसे और किस रूप में, इसे जानने-समझने से पहले बारसोई विधानसभा क्षेत्र के इतिहास पर नजर डालते हैं.
हासिल की थी चौंकाऊ जीत
बारसोई पहले भी स्वतंत्र विधानसभा क्षेत्र था या दूसरे किसी क्षेत्र का हिस्सा था, यह ठीक से नहीं मालूम. वैसे, संभवतः यह किसी दूसरे क्षेत्र का हिस्सा था. उपलब्ध जानकारी के अनुसार बारसोई विधानसभा क्षेत्र (Barsoi Assembly Constituency) 1967 में अस्तित्व में आया. 41 साल बाद 2008 के परिसीमन में यह विलोपित हो गया. बारसोई की जगह बलरामपुर विधानसभा क्षेत्र हो गया. बारसोई नाम वाले विधानसभा क्षेत्र में 1967 से अक्तूबर 2005 तक कुल 11 चुनाव हुए. 08 चुनावों में मुस्लिम समुदाय के उम्मीदवारों की जीत हुई. शेष तीन में गैर मुस्लिम की. पहले दो चुनावों-1967 एवं 1969 में सोहनलाल जैन निर्वाचित हुए थे. 1967 में जन क्रांति दल और 1969 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में. दूसरे गैर मुस्लिम कटिहार जिले के बारसोई थाना क्षेत्र के करीमगंज (Kareemganj) निवासी दुलालचन्द्र गोस्वामी थे, जिन्होंने 1995 में भाजपा (BJP) प्रत्याशी के तौर पर चौंकाऊ जीत हासिल की थी.
विभाजन का लाभ उठा जीत गये
परिवर्तित स्वरूप वाले बलरामपुर विधानसभा क्षेत्र में पहला चुनाव 2010 में हुआ. पहली जीत गैर मुस्लिम प्रत्याशी दुलालचन्द्र गोस्वामी की हुई. एनडीए (NDA) में वह भाजपा के दावेदार थे. सीट जदयू (JDU) के हिस्से में गयी तब बागी बन निर्दलीय मैदान में उतर गये. मुस्लिम मतों में विभाजन का लाभ उठा जीत भी गये. एनडीए में जदयू की उम्मीदवारी पूर्व विधायक मोहम्मद सिद्दिकी (Md. Siddiki) को मिली थी जो महज 03 हजार 538 मतों में सिमट कर रह गये थे. पूर्व विधायक महबूब आलम भाकपा-माले के उम्मीदवार थे. उनकी राह कथित रूप से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के उम्मीदवार हबीबउर रहमान (Habibur Rahman) ने रोक दी थी. वैसे, आदिल हसन आजाद (Adil Hassan Azad) भी लोजपा (LJP) प्रत्याशी के तौर पर मैदान में थे. हबीबउर रहमान 16 हजार 474 और आदिल हसन आजाद 07 हजार 795 मत झटक लिये थे. ऐसा कहा जा सकता है कि इन दोनों में से कोई एक भी मैदान में नहीं होते तो महबूब आलम की जीत आसानी से दुहरा जाती.
है विस्तृत जनाधार
स्थानीय राजनीति की गहन जानकारी रखने वालों के मुताबिक इस क्षेत्र में भाकपा-माले का कम, महबूब आलम का विस्तृत जनाधार है. पहले बारसोई और फिर बलरामपुर से पांच चुनावों में विजयी (एक चुनाव में उनके भाई जीते) रहे महबूब आलम शुरुआती दौर में माकपा (CPIM) की राजनीति करते थे. पहली बार 1985 में बारसोई से माकपा उम्मीदवार के तौर पर ही मैदान में उतरे थे. जीत उनसे दूर रह गयी थी. बाद में वैचारिक मतभेद की वजह से माकपा से मोहभंग हो गया तब 1990 में भाकपा-माले का उम्मीदवार बन गये. दुर्भाग्य ऐसा कि दल बदलने से भी जीत नसीब नहीं हुई, पर दूसरे स्थान पर जरूर रहे.
तकरीबन दस मामलों में आरोपित
1995 में महबूब आलम जेल में थे. स्थानीय एक नेता की पत्नी की हत्या के मामले में 1994 में उनकी गिरफ्तारी हुई थी. जेल से ही चुनाव लड़ने की कोशिश नाकामयाब रही तब उन्होंने छोटे भाई मुनाफ आलम (Munaf Alam) को भाकपा-माले का प्रत्याशी बनवा दिया. वह भी दूसरे स्थान पर अटक गये, यानी हार गये. जीत भाजपा प्रत्याशी दुलालचन्द्र गोस्वामी की हो गयी. कटिहार जिले के आबादपुर (Abadpur) थाना क्षेत्र के शिवानंदपुर गांव निवासी महबूब आलम की पहली जीत 2000 में हुई थी. तब भूमिगत रह चुनाव मैदान में उतरे थे. फरवरी 2005 में जीत का दुहराव हुआ. हत्या, दंगा और शस्त्र अधिनियम से जुड़े तकरीबन 10 मामलों में वह आरोपित थे.
भाई को लड़ा दिया चुनाव
गिरफ्तारी के डर से अक्तूबर 2005 के चुनाव में खुद नहीं लड़ 1995 की तरह फिर छोटे भाई मुनाफ आलम को भाकपा-माले की उम्मीदवारी दिलवा दी. इस बार मुनाफ आलम की जीत हो गयी. लेकिन, अगले चुनाव में उन्हें अवसर नहीं मिला. 2005 के दोनो चुनावों में दुलालचन्द्र गोस्वामी भाजपा के उम्मीदवार थे. 2010 में महबूब आलम खुद चुनाव लड़ हार गये. इस हार का ठीकरा उन्होंने भाई मुनाफ आलम के सिर फोड़ दिया. कहा कि विधायक रहते मुनाफ आलम में भटकाव आ गया था, इसलिए वह हार गये.
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(अशोक कुमार सीमांचल के वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

