Bihar Politics : कभी मुफ्त में नहीं… यह हुई न सिद्धांत निष्ठता!

विशेष प्रतिनिधि
02 जनवरी 2026
Patna : राजनीतिज्ञों के बारे में कई तरह की गलत-सलत धारणाएं बना दी जाती हैं. उन्हीं में से एक हैं, जिनके सिद्धांत पर संदेह व्यक्त किया जाता है. कई तो इतने बदमाश हैं कि इनके बारे में कह देंगे कि इनका कोई सिद्धांत नहीं है. यह एकदम से गलत आरोप है. करीब से करीब लोगों की बात छोड़ दीजिये, उनके दुश्मन भी इस आरोप पर तनिक भी विश्वास नहीं करते हैं कि नेताजी का सिद्धांत कमजोर है या सिद्धांतों से समझौता कर लेते हैं.
भाई को भी नहीं छोड़ा
जैसे कि बचपन में ही उन्होंने सिद्धांत बना लिया कि जिन्दगी में कभी मुफ्त में किसी को टिकट नहीं देंगे. समय के साथ वह अपने इस सिद्धांत पर डटे हुए हैं. पांच साल पहले की बात है. पार्टी का टिकट कोई पूछ नहीं रहा था, उस बुरे समय में भी उन्होंने समझौता नहीं किया. गैरों की बात छोड़ दीजिये. रिश्ते के एक भाई को भी नहीं छोड़ा. बहुत रोया, गिड़गिड़ाया. मगर बात सिद्धांत पर आकर टिक गयी, सो सांकेतिक रूप में ही सही, भाई से कुछ ले लिया. यह किस्सा अलग है कि बाद में उस भाई को चुनाव लड़ने के लिए कुछ दिया भी. वह ली गयी राशि से अधिक थी.
कई बार रोया, काम नहीं बना
इस बार उन्होंने कुछ अधिक कड़ाई से सिद्धांत का पालन किया. ढेर किस्सा नहीं बतायेंगे, एक से ही सिद्धांत के प्रति उनके समर्पण का अंदाजा लग जायेगा. परेशानी यह हो रही थी कि उन्हें ऐसी-ऐसी सीटें दे दी गयी थीं, जिसके लिए योग्य उम्मीदवार नहीं मिल रहा था. खासकर आरक्षित सीटों पर यह परेशानी अधिक थी. उत्तर बिहार (Bihar) की ऐसी ही एक सीट के लिए बहुत खोजबीन के बाद एक उम्मीदवार तैयार हुए. वह रविदास बिरादरी के थे. नेताजी के सामने पेशी हुई. उम्मीदवार दोनों हाथ खड़ा कर आत्मसमर्पण की मुद्रा में खड़ा हो गया. घर की माली हालत को खराब बताकर कई बार रोया भी. लेकिन, काम नहीं बना.
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किस्मत अच्छी थी
अंत में क्षेत्र के संपन्न लोगों से चंदा लेकर सांकेतिक रकम सही जगह पर पहुंचाये. मामूली जमीन थी, उसके नाम पर कुछ कर्ज भी उठा लिया. किस्मत अच्छी थी कि क्षेत्र में यह बात फैल गयी. दया और सहानुभूति का मिला-जुला प्रभाव ऐसा पड़ा कि उम्मीदवार की जीत हो गयी. क्षेत्र के लोग बताते हैं कि चुनाव प्रचार में समर्थकों ने अपना पैसा लगाया. चुनाव में केवल जीत ही नहीं हुई, चंदा में उतना धन भी आ गया, जिससे कर्ज की अदायगी भी हो गयी. इस किस्सा को जानने के बाद भी कोई आदमी नेताजी की सिद्धांत निष्ठता पर प्रश्न करे तो वह जीते जी नरक में जायेगा.
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