नेता का कूड़ा… हमारा ताज!

जब एक ही घर में पांच-पांच सांसद और विधायक होने के बाद भी जातिवादी जनता यह नहीं सोचती है कि हमारे जनतंत्र का क्या हस्र होगा, तो फिर हम इतने चिंतित क्यों हों. ऐसे परिवारों को दंड देने के बदले उनके घरों में पैदा हुए नाजायज और अयोग्य संतानों की भी पूजा वे किसी देवता की तरह करते हैं.
बांके बिहारी साव
04 अप्रैल 2026
चरित्तर चाचा बहुत चिंतित थे.
मनमोहिनी भी गुमसुम थी.
ऐसा शायद ही कभी होता था.
ऐसा होना भी नहीं चाहिए था.
घर में मात्र दो प्राणी और दोनों ही चिंतित.
थक-हारकर मनमोहिनी ने ही पूछा-
‘आज आप बहुत ही चिंतिंत हैं चाचा!’
‘एक चिंता हो, तो बताऊं.’
‘फिर भी…?’
‘तुम ऐसा करो…, छह कप चाय बनाओ. तब तक मैं अपनी मंडली को बुलाता हूं. शायद उनके आने से मूड में कुछ बदलाव हो?’
‘ठीक है चाचा…!’
वैसे भी मनमोहिनी इधर बिहरिया के बिगड़ने के बाद से थोड़ी दबी-दबी रहती थी. ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि जिसका पति सत्ता के लोभ में भ्रष्ट हो चुका हो, उसकी पत्नी अपने को चरित्रवान होने का दावा कैसे कर सकती थी? वैसे, दुनिया जानती थी कि मनमोहिनी बिहरिया के भ्रष्ट होने के बाद से ही उससे नाता तोड़ चुकी है. इधर, बिहरिया शानदार घर बनाकर दो-तीन गाड़ियां खरीद चुका था. उसे मनमोहिनी की नाराजगी की कोई फिक्र नहीं थी. वह इस सत्य से चिंतित था कि जब सारे पोलिटिशियन और अधिकारी सहित भ्रष्ट कर्मचारियों की बीवियां अपने-अपने पतियों के साथ शान से जी रही है, तो फिर एक मात्र मनमोहिनी ही ऐसी क्यों है? उसे इस बात का विश्वास था कि अर्ध-जवानी में न सही, बुढ़ापे में वह थक-हारकर उसके पास आयेगी ही. लेकिन, फुलेना- वह भी एकदम अपनी मां पर गया था. बिहरिया बार-बार यही सोचता था- आखिर मेरे ही घर में ऐसे जने कहां से आ गये? चाचा- एकदम चरित्रवाले…, बीवी पूरी ईमानदार और बेटा भी संत जैसा…? सभी भ्रष्ट लोगों के घरों में ऐसे प्राणी पैदा क्यों नहीं होते हैं?
खैर…, बिहरिया की बात बिहरिया जाने…? इधर चरित्तर चाचा ने अपनी मंडली को फोन किया, तो पन्द्रह-बीस मिनट के भीतर खखरू चाचा, लूटन चाचा, झगड़ू भैया तड़ातड़ पहुंच गये. बैठते ही खखरू चाचा ने पूछा-
‘क्या बात है भैया…, एकाएक इमरजेंसी कॉल किये हो?’
‘कोई खास बात नहीं है. मन नहीं लग रहा था इसलिए सोचा कि तुम लोगों से बात करके जी को हल्का कर लूं.’
‘कोई तो बात होगी कि आपका जी भारी हो गया?’
‘पहले चाय पीकर तुमलोग मन को शांत करो, फिर अपने मन की बात सुनाऊंगा.’
जनता लुटा रही अपनी आजादी
तब तक मनमोहिनी पानी लेकर आ गयी. फिर वह अंदर गयी और चाय लेकर आयी. चाय पीने तक सभी चुप रहे. फिर लूटन चाचा ने पूछा-
‘अब तो बताओ भैया…!’
‘क्या बताऊं लूटन…? जनता की गिरावट से मैं बहुत दुःखी हूं. नेता अपने घर के कूड़े को हमारा ताज बना रहा है. उनके अशिक्षित, हाफमाईंड और चरित्रहीन बच्चों को भी हम ऐसे स्वीकार कर रहे हैं जैसे वे भगवान के प्रसाद हों. ऐसे में क्या हमारी आजादी सुरक्षित रह पायेगी?
‘ही…ही…ही…!’ झगड़ू भैया हंसने लगे, तो चरित्तर चाचा ने पूछा-
‘तुम हंस क्यों रहे हो?’
‘हंसने की बात है चाचा…! जहां जातिवाद (Casteism) के नाम पर नेता अपना-अपना वंश स्थापित कर रहा है, वहां तुम्हारी चिंता का कोई महत्व नहीं है.’
‘झगड़ू ठीक कह रहा है भैया…! अभी-अभी ही देखो न…, एक बड़े नेता अपने ढीले-ढाले बेटे को राजनीति (Poltics) में स्थापित करने के लिए कितनी नौटंकी की. उसके तमाम सत्तालोभी चमचों ने उसे बिहार का मार्गदर्शक बता दिया.’
‘एक वही क्यों? एक नेता केन्द्र में मंत्री, बेटा (Son) स्टेट में मंत्री, बहू (Daughter in law) विधायक और समधन (Samadhan) भी एमएलए. अभी-अभी एक नेता स्वयं दिल्ली गया. बेटे को यहां मंत्री बना दिया और बीवी (Wife) को विधायक…’
‘बिहार (Bihar) में यही सब तो हो रहा है भैया…! वैसे भी हम परिवारवाद (Familism) और वंशवाद (Dynasty) का विष पहले से ही पी रहे हैं. अगर हमारे नेता जातिवाद के नाम पर नेता बनते हैं, तो फिर इन्हें जाति का ही दूसरा घर क्यों नहीं दिखाई पड़ता है?’
‘क्योंकि जनता बाप के नाम पर बेटे को भी मसीहा मान अपनी आजादी लुटा रही है.’
अंत में चुप्पी तोड़ते हुए चरित्तर चाचा बोले- ‘मैं तुमलोगों को एक कहानी सुनाता हूं, फिर अपना निर्णय देना.’
कहानी सुनायी
और फिर चरित्तर चाचा ने कहानी सुनानी शुरू की- ‘एक राजा था. प्रजा उसे देवता की तरह पूजती थी. राजा था भी बड़ा दानी, महाज्ञानी और मानवीय गुणों से भरपूर. लेकिन, जब वह बूढ़ा हो गया, तो जनता की भक्ति का नाजायज फायदा उठाकर अपने अयोग्य, चरित्रहीन और विलासी पुत्र को राजगद्दी सौंपकर जंगल जाने लगा, तो प्रजा उसे घेरकर खड़ी हो गयी और पूछा- ‘महाराज…, आखिर आपने किस दंड रूवरूप अपने अयोग्य, चरित्रहीन और विलासी पुत्र को हमारा राजा बना दिया?’
‘वह मेरा इकलौता पुत्र है, इसलिए वह राजा बना. इसमें पूछने जैसी कौन सी बात है?’
‘यह हमारे विश्वास की हत्या है.’ प्रजा चिल्लाकर बोली.
‘राजतंत्र में ऐसा ही होता है.’ राजा ने जबाव दिया.
‘हम मानते हैं महाराज, लेकिन एक सुयोग्य राजा का धर्म होता है कि वह अपने जैसा उत्तराधिकारी पैदा करे. और यदि घर में ऐसा योग्य उत्तराधिकारी पैदा नहीं हुआ हो, तो राज्य में ऐसे सैकड़ों योग्य व्यक्ति हैं.’
राजा ने चिढ़कर कहा-
‘मुझे जो करना था, वह मैंने कर दिया. तुमलोगों को जो करना है वह करो…!’
‘आपने हमारी भक्ति और विश्वास की हत्या की है. अभी भी समय है आप उसे हटा दीजिये.’
‘अब हम ऐसा नहीं कर सकते.’ राजा के मुंह से यह सुनते ही प्रजा एकदम बिफर गयी. जिस राजा को वह भगवान की तरह पूजा करती थी, उसे उसने पत्थरों से पीट-पीटकर मार डाला. राजा को मारने के बाद प्रजा महल की ओर दौड़ी तो नया घोषित राजा भी महल छोड़कर भाग गया.’
‘क्या राजा की सेना ने राजा का बचाव नहीं किया?’ खखरू चाचा ने पूछा.
‘सेना भी तो जनता का ही एक हिस्सा है.’
अयोग्य वंशवादियों की फौज
‘यहां तो आजादी के बाद से ही अयोग्य वंशवादियों की फौज खड़ी कर दी गयी है. बेटा पागल ही क्यों न हो, वंशवाद (Dynasty) के नाम पर उसे सर्वोच्च नेता बनाने तक जनता नहीं हिचकती है.’
‘आखिर इसका हस्र क्या होगा चाचा?’ इस बार झगड़ू ने पूछा.
‘सब जनता के हाथों में है.’
‘जनता क्या भैया…? जब एक ही घर में पांच-पांच सांसद (MP) और विधायक (MLA) होने के बाद भी जातिवादी जनता यह नहीं सोचती है कि हमारे जनतंत्र का क्या हस्र होगा, तो फिर हम इतने चिंतित क्यों हों. ऐसे परिवारों को दंड देने के बदले उनके घरों में पैदा हुए नाजायज और अयोग्य संतानों की भी पूजा वे किसी देवता की तरह करते हैं.’ खखरू चाचा ने दुःख भरे शब्दों में अपनी पीड़ा व्यक्त की.
‘यही हाल पूरे देश का है भैया…! किसी-किसी राज्य में तो परिवार ही पार्टी है और पार्टी ही परिवार की है.’ झगड़ू के स्वर फूटे.
‘आखिर, कब तक हम किसी नेता के घर के कूड़े को अपना ताज बनाते रहेंगे?’
‘जब तक जनता चाहती है.’
‘और जनता…?’ मनमोहिनी अंत में बोली.
‘एक बार फिर गुलाम बनने तक…’ कहकर चरित्तर चाचा चुप हो गये क्योंकि वह जानते थे कि वंशवाद का विष धीरे-धीरे गणतंत्र की आत्मा की हत्या कर रहा है.
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