Bihar… सत्ता हस्तांतरण : सम्राट चौधरी ही क्यों?
मजबूत सांगठनिक ढांचा, समन्वित विचारधारा और राष्ट्रवादी सिद्धांत पर आधारित भाजपा की पहचान दूसरे राजनीतिक दलों की तुलना में कुछ अलग रही है. कार्यशैली भिन्न रही है. अनुशासन मूल मंत्र रहा है. भाजपा में चेहरे को नहीं, संगठन को महत्व मिलता रहा है. पार्टी के ‘अटल-आडवाणी युग’ तक अमूमन ऐसा ही था. ‘मोदी- शाह युग’ में विस्तारवादी सोच हावी हो गया है.

अविनाश चन्द्र मिश्र
03 मई 2026
भाजपा (BJP) बिहार में स्वतंत्र सत्ता से अब भी दूर है, पर सम्राट चौधरी (Samrat Choudhary) के रूप में पहली बार उसका ‘अपना मुख्यमंत्री’ सत्तासीन हुआ है. इसे भाजपा और सम्राट चौधरी, दोनों के लिए ऐतिहासिक कहा जा सकता है. यह ऐतिहासिक इस रूप में भी रहा कि बिहार में भाजपा के ‘प्रथम मुख्यमंत्री’ की सपाट ताजपोशी हुई. भाजपा के मुख्यमंत्री की ऐसी उत्साह रहित ताजपोशी दूसरे किसी राज्य में शायद ही कभी हुई होगी. सम्राट चौधरी के सत्तारोहण पर पार्टी में तनिक भी उल्लास नहीं दिखा. सन्नाटे में सिमटा औपचारिक सत्तारोहण! ऐसा संभवतः इसलिए हुआ कि सम्राट चौधरी ‘भाजपाई मूल’ यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की पृष्ठभूमि से नहीं हैं. राजनीति में उस समाजवादी विचारधारा की उपज हैं जिसकी अवधारणा जातिवाद आधारित पिछड़ावाद मानी जाती है. दलबदल का गहरा दाग भी उन पर है. राजद (RJD) से राजनीति की शुरुआत कर जदयू और ‘हम’ होते हुए तकरीबन आठ साल पहले वह भाजपा में आये. हालांकि, राजनीति के वर्तमान नैतिकताविहीन दौर में इसका कोई खास मायने-मतलब नहीं है. ‘पलटू राम’ की राजनीतिक लीला देख चुके बिहार में तो और भी नहीं. तब भी सम्राट चौधरी भाजपा में ‘बाहरी’ हैं. इस कारण मुख्यमंत्री के रूप में मूल भाजपाइयों को पच नहीं रहे हैं.
हावी हो गया विस्तारवादी सोच
मजबूत सांगठनिक ढांचा, समन्वित विचारधारा और राष्ट्रवादी सिद्धांत पर आधारित भाजपा की पहचान दूसरे राजनीतिक दलों की तुलना में कुछ अलग रही है. कार्यशैली भिन्न रही है. अनुशासन मूल मंत्र रहा है. भाजपा में चेहरे को नहीं, संगठन को महत्व मिलता रहा है. पार्टी के ‘अटल-आडवाणी युग’ तक अमूमन ऐसा ही था. ‘मोदी-शाह युग’ में विस्तारवादी सोच हावी हो गया है. हालांकि, पूर्व में भी पार्टी को विस्तार देने और उसे मजबूत बनाने के उपक्रम हुए. सुकूनदायक परिणाम भी मिले. लेकिन, वैसा आमतौर पर सैद्धांतिक दायरे में हुआ. ‘मोदी-शाह युग’ में सैद्धांतिक समझ गौण पड़ गयी है. विचारधारा ताक पर रख दी गयी है. संगठन का राष्ट्रव्यापी विस्तार और राजनीतिक वर्चस्व मूल उद्देश्य बन गया है. इस बदली रणनीति के तहत दूसरे दलों से आये बाहरी नेताओं पर विशेष मेहरबानी दिखायी जा रही है. विपक्ष के वैसे नेताओं को भी भाजपा में शामिल कर सम्मानजनक पद दिया जा रहा है, जो इसके कट्टर आलोचक रहे हैं. उदाहरण अनेक हैं. असम में हिमंत विस्व सरमा कांग्रेस (Congress) में थे. भाजपा से जुड़े और वहां के मुख्यमंत्री बन गये. उसी असम में उनसे पहले असम गण परिषद से जुड़े रहे सर्वानंद सोनोवाल को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ. बिहार में सम्राट चौधरी का मामला भी बहुत कुछ वैसा ही है. बाहरी नेताओं पर इस मेहरबानी को पार्टी के प्रति निष्ठा, श्रद्धा और भक्ति रखने वाले कार्यकर्ताओं की हकमारी ही कही जायेगी.

भाजपा का ‘अनचाहा सम्राट’
सम्राट चौधरी की ताजपोशी पर पार्टी में जो खामोशी पसरी रही उसको देखते हुए उन्हें भाजपा का ‘अनचाहा सम्राट’ कहा जा सकता है. पर, यहां समझने वाली बात यह है कि ‘अपना मुख्यमंत्री’ के लिए भाजपा के पास दूसरा विकल्प क्या था? महत्वपूर्ण बात यह कि सम्राट चौधरी सत्ता त्यागी नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के नामित हैं. यह सच है कि बिहार की अभी का जो सत्ता समीकरण है उसमें नीतीश कुमार के लिए पूर्व की तरह पलटी मारने की गुंजाइश नहीं दिखती है. लेकिन, यह भी उतना ही सच है कि बिहार में एनडीए (NDA) की सत्ता उनकी ही मर्जी पर टंगी है. गठबंधन की इसी विवशता के चलते भाजपा नेतृत्व को सम्राट चौधरी को ‘सम्राट’ स्वीकार करना पड़ गया है. भाजपा की दूसरी विवशता प्रदेश स्तर का लोकप्रिय नेतृत्व न होना है. वैसे तो यह संकट प्रारंभिक काल से ही है, 1996 के बाद की गठबंधन की राजनीति में नीतीश कुमार पर निर्भरता ने इसे और जटिल बना दिया है. वैसे, भाजपा में अवसर कई नेताओं को मिले, पर अभिव्यक्ति में मुखरता व रोचकता नहीं रहने की वजह से कोई खुद को उस रूप में ढाल लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाये. यह कह सकते हैं कि सुशील कुमार मोदी को छोड़ दूसरे किसी को नीतीश कुमार ने भी उभरने नहीं दिया.
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सबने निराश किया
बिहार की पिछड़ा वर्ग केन्द्रित राजनीति में सवर्ण को मौका मिलना नहीं था, एकाध अपवाद को छोड़ नहीं मिला. सुशील कुमार मोदी को वर्षों उपमुख्यमंत्री बनाये रखा गया. नंदकिशोर यादव (Nand Kishor Yadav) को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और विधानसभा के अध्यक्ष का पद मिला. प्रेम कुमार (Pram Kumar) भाजपा विधायक दल के नेता बनाये गये. अभी विधानसभा के अध्यक्ष हैं. तारकिशोर प्रसाद (Tarkishor Prasad) और रेणु देवी (Renu Devi) उपमुख्यमंत्री रहीं. भाजपा का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि नेतृत्व के तौर पर उभरने के मामले में सबने उसे निराश किया. काबिल-नाकाबिल की बात अपनी जगह है, बिहार में भाजपा का जो मुख्य प्रतिद्वंद्वी दल है, उसको उसी की शैली और भाषा में जवाब देने में सम्राट चौधरी तो सक्षम-समर्थ हैं ही. इसी खासियत को देख उन्हें प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष और फिर उपमुख्यमंत्री का पद दिया गया था. इस दृष्टि से वह खरा उतरे भी. राज्यस्तरीय लोकप्रियता हासिल होती है या नहीं, यह वक्त बतायेगा.


