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धर्म संस्कृति : गोत्र का इतना महत्व क्यों?

तापमान लाइव ब्यूरो
16 मई 2026

New Delhi: सनातन धर्म में गोत्र का बहुत महत्व है. गोत्र (Gotra) का शाब्दिक अर्थ बहुत व्यापक है. विद्वानों ने समय-समय पर इसकी यथोचित व्याख्या भी की है. गो अर्थात् इन्द्रियां, वहीं त्र से आशय है रक्षा करना. अतः गोत्र का एक अर्थ ‘इन्द्रिय आघात से रक्षा करने वाले’ भी होता है जिसका स्पष्ट संकेत ‘ऋषि’ की ओर है. सामान्यतः गोत्र को ऋषि परम्परा (Rishi Tradition) से संबंधित माना गया है. ब्राह्मणों के लिए तो गोत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्राह्मण ऋषियों की संतान माने जाते हैं. प्रत्येक ब्राह्मण (Brahmin) का संबंध एक ऋषि कुल से होता है. प्राचीन काल में चार ऋषियों के नाम से गोत्र परम्परा प्रारम्भ हुई. ये ऋषि अंगिरा (Angira), कश्यप (Kashyap), वशिष्ठ (Vasista) और भगु (Bhagu) हैं. कुछ समय उपरान्त जमदग्नि (jamdagni), अत्रि (Atri), विश्वामित्र (Vishwamitra) और अगस्त्य (Agastya) भी इसमें जुड़ गये. व्यावहारिक रूप में गोत्र से आशय पहचान से है, जो ब्राह्मणों के लिए उनके ऋषि कुल से होती है.

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एकत्रीकरण है मुख्य भाव

कालान्तर में जब वर्ण-व्यवस्था (Varn-Vyavastha) ने जाति-व्यवस्था (Caste System) का रूप ले लिया तब यह पहचान स्थान व कर्म के साथ भी संबंधित हो गयी. यही कारण है कि ब्राह्मणों के अतिरिक्त अन्य वर्गों के गोत्र अधिकांश उनके उद्गम स्थान या कर्मक्षेत्र से सम्बन्धित होते हैं. गोत्र के पीछे मुख्य भाव एकत्रीकरण का है. किन्तु वर्तमान समय में आपसी प्रेम व सौहार्द्र (Mutual Love and Harmony) की कमी के कारण गोत्र का महत्व भी धीरे-धीरे कम होकर केवल कर्मकांडी औपचारिकता तक ही सीमित रह गया है. ब्राह्मणों में जब किसी को अपने गोत्र का ज्ञान नहीं होता तब वह कश्यप गोत्र (Kashyap Gotra) का उच्चारण करता है. ऐसा इसलिए होता है कि कश्यप ऋषि के एकाधिक विवाह हुए थे और उनके अनेक पुत्र थे. अनेक पुत्र होने के कारण ही ऐसे ब्राह्मणों को जिन्हें अपने गोत्र का पता नहीं है कश्यप ऋषि के ऋषि कुल (Rishi kul) से संबंधित मान लिया जाता है.

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