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Bihar : मंत्री ने कह दिया… इसलिए विफल हो रही शराबबंदी

तापमान लाइव ब्यूरो
16 जून 2026

Patna : बिहार में दस वर्षों से लागू ‘पूर्ण शराबबंदी’ की सफलता पर अब सरकार के भीतर से ही सवाल उठने लगे हैं. उत्पाद एवं मद्यनिषेध (Excise and Prohibition) मंत्री मदन सहनी ने विफल हो रही शराबबंदी (Alcohol Prohibition) के लिए सीधे तौर पर पुलिस प्रशासन की कार्यशैली को जिम्मेदार ठहराया है. मंत्री के मुताबिक राज्य में अवैध शराब की तस्करी और देसी शराब के निर्माण में पुलिस की मिलीभगत एक आम शिकायत बन गयी है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शराबबंदी को लेकर बिहार पुलिस गंभीर नहीं है.

संलिप्पता की शिकायतें

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक मंत्री मदन सहनी (Madan Sahani) ने कहा कि राज्य में विदेशी शराब की तस्करी और देसी शराब के निर्माण में पुलिस की संलिप्तता की शिकायतें लगातार मिल रही हैं. मतलब यह कि अप्रत्यक्ष रूप से शराब पुलिस (Police) मंगवाती है, बनवाती है और बिकवाती भी है. इन्हीं कारणों से शराबबंदी अपने मूल उद्देश्य में विफल साबित हो रही है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार शराबबंदी की समीक्षा के लिए विगत दिनों मदन सहनी ने एक उच्च स्तरीय बैठक बुलायी थी. इस बैठक में वह पुलिस महानिदेशक (DGP) की उपस्थिति चाहते थे. मंत्री के कार्यालय से पुलिस महानिदेशक को लगातार तीन दिन तक फोन किया गया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. इस पर नाराजगी जताते हुए उत्पाद एवं मद्यनिषेध मंत्री ने कहा कि अब वह पुलिस महानिदेशक को पत्र लिखकर अपनी आपत्ति दर्ज कराएंगे और शराबबंदी के मामले में गंभीरता दिखाने का अनुरोध करेंगे.

दावे और हकीकत में फर्क

उल्लेख्य है कि बिहार में अप्रैल 2016 से पूर्ण शराबबंदी लागू है. उस वक्त के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने इसे सामाजिक बदलाव का सबसे बड़ा हथियार बताया था. सरकार का दावा रहा है कि शराबबंदी से घरेलू हिंसा (Domestic Violence) में कमी आयी और गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधरी है. हालांकि, विपक्ष (Opposition) लगातार शराबबंदी को विफल बताता रहा है. भाजपा (BJP) ने भी विपक्ष में रहते हुए असफलता का मुद्दा उठाया था. अब जबकि भाजपा राज्य की सत्ता में जदयू (JDU) के साथ है, सरकार की ओर से शराबबंदी की विफलता को आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया है. जदयू का मानना है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी (Samrat Choudhary) के नेतृत्व वाली सरकार नीतीश कुमार की नीतियों पर ही आगे बढ़ रही है.

समानांतर अर्थव्यवस्था

शराबबंदी का सबसे बड़ा आर्थिक असर राज्य के राजस्व (Revenue) पर पड़ा है. उत्पाद विभाग के आंकड़ों के अनुसार, शराबबंदी से पहले राज्य को शराब से सालाना लगभग पांच सौ करोड़ रुपये का राजस्व मिलता था. पिछले दस वर्षों में सरकार को करीब 50 हजार करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो चुका है. विश्लेषकों का मानना है कि इस नुकसान की भरपाई के लिए सरकार पर वित्तीय दबाव बढ़ा है. दूसरी ओर, शराबबंदी की विफलता ने अवैध शराब के कारोबार को बढ़ावा दिया है. राज्य में एक समानांतर अर्थव्यवस्था (Parallel Economy) खड़ी हो गयी है. आये दिन जहरीली शराब से मौत की घटनाएं सामने आती रहतीं हैं. सारण, सीवान, गोपालगंज और पश्चिम चंपारण जिलों में पिछले दो वर्षों में 200 से अधिक लोगों की जहरीली शराब से मौत हो चुकी है.

पहले भी उठे सवाल

यह पहला मामला नहीं है जब पुलिस की भूमिका पर सवाल उठे हैं. पिछले साल विधानसभा में भी कई विधायकों ने आरोप लगाया था कि थानेदार से लेकर चौकीदार तक अवैध शराब के धंधे में शामिल हैं. कई जिलों में पुलिसकर्मियों को शराब तस्करों से साठगांठ के आरोप में निलंबित (Suspended) भी किया जा चुका है. मदन सहनी का बयान इसलिए अहम है कि वह खुद सरकार के उत्पाद एवं मद्यनिषेध मंत्री हैं. उनके बयान से स्पष्ट है कि उत्पाद विभाग और पुलिस के बीच समन्वय (Coordination) की कमी है.

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राजनीतिक प्रतिक्रिया

उत्पाद एवं मद्यनिषेध मंत्री के बयान पर विपक्ष हमलावर हो गया है. राजद प्रवक्ता (RJD Spokesperson) शक्ति सिंह यादव (Shakti Singh Yadav) ने कहा कि जब सरकार के मंत्री ही मान रहे हैं कि पुलिस शराब बिकवाती है, तो यह सम्राट चौधरी की सरकार की सबसे बड़ी विफलता है. उन्होंने शराबबंदी कानून (Prohibition law) की समीक्षा (Review) की मांग की. वहीं भाजपा प्रवक्ता अरविंद सिंह ने कहा कि मंत्री ने जो मुद्दा उठाया है, वह गंभीर है. सरकार को इसकी जांच करानी चाहिए और दोषी पुलिसकर्मियों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए. जदयू की ओर से अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि मंत्री की चिंता जायज है और सरकार इस दिशा में जरूरी कदम उठायेगी.

पत्र का असर और कार्रवाई पर नजर

मदन सहनी ने कहा है कि वह पुलिस महानिदेशक को पत्र लिखेंगे. अब सबकी नजर इस बात पर है कि पुलिस मुख्यालय (Police Headquarter) इस पत्र पर क्या कार्रवाई करता है. साथ ही यह भी देखना होगा कि क्या सरकार शराबबंदी की नीति की समीक्षा करती है या पुलिस तंत्र में बड़े बदलाव करती है. फिलहाल शराबबंदी बिहार की राजनीति का सबसे संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है. एक तरफ सामाजिक बदलाव का दावा है, दूसरी तरफ जमीनी हकीकत, राजस्व का नुकसान (Loss of Revenue) और जहरीली शराब (Spurious liquor) से मौतें. विभागीय मंत्री के ताजा बयान ने इस बहस को फिर से गरमा दिया है.

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