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महर्षि सुश्रुत को वैश्विक सम्मान : गौरवान्वित हुआ भारत महान

महर्षि सुश्रुत का जीवन भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिक ऊंचाइयों का प्रतिनिधित्व करता है. माना जाता है कि वे लगभग 600 ईसा पूर्व के आसपास हुए थे. उस समय संसार के अनेक क्षेत्रों में चिकित्सा विज्ञान अभी प्रारंभिक अवस्था में था, जबकि भारत में शरीर रचना विज्ञान, रोग निदान, औषध विज्ञान और शल्य चिकित्सा जैसे विषयों पर व्यवस्थित अध्ययन किया जा रहा था. महर्षि सुश्रुत ने अपने अनुभव, अनुसंधान और अवलोकनों के आधार पर चिकित्सा ज्ञान को एक संगठित स्वरूप प्रदान किया.

  • स्कॉटलैंड में कांस्य प्रतिमा का अनावरण

  • प्रो. चन्द्र चेरुव का रहा महत्वपूर्ण योगदान

  • सुश्रुत संहिता का आज भी है उतना ही महत्व

  • अग्रदूत थे पुनर्निर्माण शल्य चिकित्सा के

महेन्द्र तिवारी
25 जून 2026

मानव सभ्यता (Human Civilization) के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व होते हैं जिनका योगदान समय, भूगोल और संस्कृति की सीमाओं को पार कर संपूर्ण मानवता (Humanity) की धरोहर बन जाता है. भारतीय चिकित्सा परंपरा (Indian medical tradition) के महान आचार्य महर्षि सुश्रुत (Maharshi Sushruta) ऐसे ही व्यक्तित्वों में शामिल हैं. चिकित्सा विज्ञान, विशेष रूप से शल्य चिकित्सा (Surgery) के क्षेत्र में उनका योगदान इतना व्यापक और दूरदर्शी माना जाता है कि उन्हें विश्वभर में शल्य चिकित्सा का जनक कहा जाता है. लगभग 2600 वर्ष पूर्व उन्होंने जिस वैज्ञानिक दृष्टि, व्यावहारिक ज्ञान और चिकित्सा कौशल का परिचय दिया था, वह आज भी चिकित्सा जगत के विद्वानों और आधुनिक चिकित्सकों को प्रभावित करता है. इसी ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करते हुए जून 2026 में स्कॉटलैंड (Scotland) के एडिनबर्ग स्थित रायल कालेज ऑफ सर्जन्स (Royal College of Surgeons) में उनकी कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया गया. यह केवल एक प्रतिमा की स्थापना नहीं थी, बल्कि विश्व चिकित्सा इतिहास में भारत के योगदान की एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय मान्यता थी.

प्रतिमा की अनावरण स्थापना

एडिनबर्ग (Edinburgh) का यह प्रतिष्ठित संस्थान विश्व के सबसे पुराने और सम्मानित (The World’s Oldest and Most Respected) शल्य चिकित्सा संस्थानों में से एक माना जाता है. चिकित्सा शिक्षा, अनुसंधान, प्रशिक्षण और शल्य विज्ञान के विकास में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. ऐसे संस्थान के परिसर में महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा की स्थापना इस तथ्य का प्रमाण है कि आधुनिक चिकित्सा जगत अब विज्ञान और चिकित्सा (Science and Medicine) के इतिहास को अधिक व्यापक दृष्टिकोण से देख रहा है तथा उन प्राचीन सभ्यताओं के योगदान को भी उचित सम्मान दे रहा है जिन्होंने मानव ज्ञान की उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. इस प्रतिमा की स्थापना में भारतीय मूल के प्रसिद्ध शल्य चिकित्सक प्रो. चंद्र चेरुवु (Pro. Chandra Cheruvu) और उनके परिवार की विशेष भूमिका रही, जिनके प्रयासों से यह ऐतिहासिक सम्मान (Historic Honor) संभव हो सका.

चिकित्सा ज्ञान का विस्तृत दस्तावेज

महर्षि सुश्रुत का जीवन भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge Tradition) की वैज्ञानिक ऊंचाइयों का प्रतिनिधित्व करता है. माना जाता है कि वे लगभग 600 ईसा पूर्व के आसपास हुए थे. उस समय संसार के अनेक क्षेत्रों में चिकित्सा विज्ञान (Medical Science) अभी प्रारंभिक अवस्था में था, जबकि भारत में शरीर रचना विज्ञान, रोग निदान, औषध विज्ञान और शल्य चिकित्सा जैसे विषयों पर व्यवस्थित अध्ययन किया जा रहा था. महर्षि सुश्रुत ने अपने अनुभव, अनुसंधान और अवलोकनों के आधार पर चिकित्सा ज्ञान को एक संगठित स्वरूप प्रदान किया. उनकी प्रसिद्ध कृति सुश्रुत संहिता आज भी चिकित्सा इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में गिनी जाती है. यह केवल एक चिकित्सा ग्रंथ (Medical Treatise) नहीं, बल्कि प्राचीन भारत की वैज्ञानिक चेतना, अनुसंधान पद्धति और व्यावहारिक चिकित्सा ज्ञान का विस्तृत दस्तावेज है.

तब भी चिकित्सा की स्पष्ट पद्धति थी

सुश्रुत संहिता में शल्य चिकित्सा के सिद्धांतों और प्रक्रियाओं का अत्यंत व्यवस्थित वर्णन मिलता है. इसमें विभिन्न रोगों के उपचार, घावों की देखभाल, हड्डियों के उपचार, शरीर की संरचना, शल्य उपकरणों तथा चिकित्सा नैतिकता के विषय में विस्तृत जानकारी दी गयी है. यह ग्रंथ इस बात का प्रमाण है कि उस समय चिकित्सा विज्ञान केवल अनुभव या परंपरा पर आधारित नहीं था, बल्कि उसमें वैज्ञानिक अवलोकन, वर्गीकरण और परीक्षण की स्पष्ट पद्धति मौजूद थी. ज्ञान को व्यवस्थित रूप से संकलित करना किसी भी विकसित वैज्ञानिक परंपरा (Scientific Tradition) की पहचान होती है और महर्षि सुश्रुत का कार्य इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है.

पुनर्निमाण शल्य चिकित्सा

महर्षि सुश्रुत की सबसे प्रसिद्ध उपलब्धियों में पुनर्निर्माण शल्य चिकित्सा का विकास शामिल है. विशेष रूप से नाक के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया का उनका वर्णन चिकित्सा इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. प्राचीन काल में विभिन्न अपराधों के दंडस्वरूप कभी-कभी नाक काट दी जाती थी. ऐसी स्थिति में चेहरे की संरचना को पुनः सामान्य रूप में लाना अत्यंत कठिन कार्य था. महर्षि सुश्रुत ने त्वचा प्रत्यारोपण और पुनर्निर्माण की जो तकनीक विकसित की, उसे आधुनिक प्लास्टिक सर्जरी की प्रारंभिक आधारशिला माना जाता है. यही कारण है कि उन्हें पुनर्निर्माण शल्य चिकित्सा (Reconstructive Surgery) का अग्रदूत भी कहा जाता है. आज जब चिकित्सा विज्ञान अत्याधुनिक उपकरणों और जटिल तकनीकों से सुसज्जित है, तब भी इतिहासकार इस बात को स्वीकार करते हैं कि पुनर्निर्माण शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में सुश्रुत की दूरदर्शिता अपने समय से बहुत आगे थी.

उत्कृष्ट शिक्षक भी थे

सुश्रुत संहिता में लगभग 300 प्रकार की शल्य प्रक्रियाओं और 100 से अधिक शल्य उपकरणों का वर्णन मिलता है. इन उपकरणों का वर्गीकरण उनके उपयोग के आधार पर किया गया था. इनमें काटने, छेद करने, पकड़ने, निकालने और सिलाई करने वाले उपकरण शामिल थे. यह वर्गीकरण दर्शाता है कि उस समय शल्य चिकित्सा अत्यंत संगठित और तकनीकी रूप से विकसित थी. आधुनिक शल्य चिकित्सा में जिन सिद्धांतों को वैज्ञानिक आधार माना जाता है, उनके प्रारंभिक स्वरूप का उल्लेख सुश्रुत संहिता में देखा जा सकता है. महर्षि सुश्रुत केवल शल्य चिकित्सक ही नहीं थे, बल्कि एक उत्कृष्ट शिक्षक भी थे. उन्होंने चिकित्सा शिक्षा में व्यावहारिक प्रशिक्षण को अत्यधिक महत्व दिया. उनके अनुसार किसी विद्यार्थी को वास्तविक रोगी पर शल्य क्रिया करने से पहले विभिन्न वस्तुओं और मृत जीवों पर अभ्यास करना चाहिए ताकि वह आवश्यक कौशल विकसित कर सके. यह दृष्टिकोण आधुनिक चिकित्सा शिक्षा (Modern Medical Education) की मूल अवधारणा से मेल खाता है, जहां सैद्धांतिक ज्ञान (Theoretical Knowledge) के साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण (Practical Training) को अनिवार्य माना जाता है. इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि महर्षि सुश्रुत केवल चिकित्सक नहीं थे, बल्कि चिकित्सा शिक्षा के भी महान विचारक थे.

प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिक

शरीर रचना विज्ञान के क्षेत्र में उनका योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. उन्होंने मानव शरीर को समझने के लिए प्रत्यक्ष अध्ययन और निरीक्षण (Direct study and Observation) पर बल दिया. उनका मानना था कि किसी भी वैज्ञानिक निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए प्रत्यक्ष अवलोकन आवश्यक है. यह दृष्टिकोण आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति के मूल सिद्धांतों से मेल खाता है. उनके विचारों में तर्क, परीक्षण और अनुभव का विशेष महत्व दिखाई देता है. यही कारण है कि अनेक इतिहासकार उन्हें प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिकों में शामिल करते हैं. महर्षि सुश्रुत चिकित्सा नैतिकता के भी प्रबल समर्थक थे. उन्होंने चिकित्सकों के लिए उच्च नैतिक मानदंड निर्धारित किये. उनके अनुसार रोगी का हित (Patient’s Interest) सर्वाेपरि होना चाहिए. चिकित्सक को विद्वान, संवेदनशील, ईमानदार और अनुशासित होना चाहिये. रोगी के प्रति करुणा और सेवा भाव को उन्होंने चिकित्सा का आधार माना.

सांस्कृतिक व बौद्धिक महत्व भी

एडिनबर्ग में स्थापित उनकी प्रतिमा का महत्व केवल ऐतिहासिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और बौद्धिक भी है. लंबे समय तक विज्ञान और चिकित्सा के इतिहास (History of Science and Medicine) को मुख्यतः यूरोपीय उपलब्धियों (European Achievements) के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाता रहा. किंतु आधुनिक शोध (Modern Research) और ऐतिहासिक अध्ययनों (Historical studies) ने यह स्पष्ट किया है कि विज्ञान के विकास में भारत, चीन, मिस्र और मेसोपोटामिया जैसी प्राचीन सभ्यताओं का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है. महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा इसी व्यापक ऐतिहासिक सत्य की स्वीकारोक्ति है. यह संदेश देती है कि ज्ञान किसी एक राष्ट्र, संस्कृति या सभ्यता की संपत्ति नहीं होता, बल्कि यह मानवता की साझा विरासत है. यह सम्मान भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति बढ़ती वैश्विक रुचि का भी संकेत है. आज विश्व भर के विश्वविद्यालय और अनुसंधान संस्थान प्राचीन भारतीय ग्रंथों का अध्ययन कर रहे हैं.

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आज भी प्रासंगिक है

भारत के लिए यह अवसर विशेष गर्व का विषय है. यह केवल एक महान ऋषि का सम्मान नहीं बल्कि भारतीय वैज्ञानिक और बौद्धिक परंपरा की अंतरराष्ट्रीय मान्यता भी है. इससे भारतीय युवाओं, शोधकर्ताओं और चिकित्सा विद्यार्थियों को प्रेरणा मिलती है कि ज्ञान और अनुसंधान की परंपरा इस देश में अत्यंत प्राचीन और समृद्ध रही है. यह सम्मान हमें अपने प्राचीन ग्रंथों, वैज्ञानिक विरासत और बौद्धिक इतिहास के गंभीर अध्ययन के लिए भी प्रेरित करता है. महर्षि सुश्रुत की विरासत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके समय में थी. चिकित्सा विज्ञान निरंतर विकसित हो रहा है, नयी तकनीकि विकसित हो रही हैं और उपचार के नए साधन सामने आ रहे हैं, किंतु चिकित्सा का मूल उद्देश्य आज भी वही है जो हजारों वर्ष पहले था. उन्होंने चिकित्सा को केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि मानव सेवा का माध्यम माना.

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(महेन्द्र तिवारी काफी चर्चित लेखक हैं.)

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