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किस्सा एक मंत्री का : हृदय नहीं, वस्त्र परिवर्तन हो गया !

विशेष प्रतिनिधि
04 अक्तूबर 2026
Patna : आदमी का हृदय परिवर्तन होता है. मगर ऐसा कम ही होता है कि हृदय के साथ वस्त्र परिवर्तन भी हो जाये. राज्य सरकार (Government) के एक मंत्रीजी के साथ यह हो चुका है. मंत्रीजी ठेठ समाजवादी हैं. देशरत्न (Deshratna) के पुराने शिष्य हैं. कहते हैं कि अभी जितने लोग देशरत्न के शिष्य बने घूम रहे हैं, उनमें मंत्रीजी का दर्जा सबसे ऊपर था. क्योंकि देशरत्न अपने कई शिष्यों के बारे में जीते जी ही जान गये थे कि इनमें ज्यादा चालू किस्म के हैं. मंत्रीजी (Minister) के बारे में उनकी धारणा हमेशा अच्छी थी. यही कारण है कि कई शिष्यों के विरोध के बावजूद देशरत्न ने मंत्रीजी को पहली बार विधायक बनने के लिए टिकट भी दिया. हालांकि, पहले चुनाव में वह हार गये. उसके बाद के चुनाव में जीत हुई. तब से अब तक उनके जीतने का क्रम जारी है.

खैर, उसी पृष्ठभूमि में उन्हें सुशासन बाबू (Sushasan Babu) का आशीर्वाद मिला. शुरुआती दिनों में तो वह देशरत्न के वसूलों पर चले. जल्द ही पता चला कि यह रास्ता ठीक नहीं है. इस पर चलते रहे तो अगली बार विधानसभा (Assembly) का मुंह नहीं देख पायेंगे. इस ज्ञान की प्राप्ति के बाद मंत्रीजी ने वसूलों को अलविदा कहा. विशुद्ध वसूली पर उतर आये. फिर भी उनके वस्त्र और बाहरी आवरण में कोई बदलाव नहीं आया. वही साधारण धोती-कुर्ता और बंडी. हमेशा दाढ़ी रखी. मतलब कि चेहरा चमकाने का भी शौक नहीं हुआ. लेकिन, क्षेत्र की एक घटना ने उन्हें वस्त्र परिवर्तन पर मजबूर कर दिया. हाल फिलहाल क्षेत्र भ्रमण करने गये थे. दुश्मनों ने विरोध किया. नारेबाजी की. गाड़ी रोक लिया.

परिस्थिति ऐसी बनी कि जान बचाने के लिए भागने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचा था. बेचारे जान बचाकर भागे. गिरे भी. इस क्रम में धोती ने लगभग साथ छोड़ दिया. बाद में प्रशासन (Administration) के अधिकारी आये. उन्हें सुरक्षा घेरे में लेकर सुरक्षित ठिकाने पर पहुंचाया गया. इस घटना से इनके मन में धोती के प्रति गंभीर विरक्ति पैदा हो गयी. पहला निर्णय लिया कि आज से धोती नहीं पहनेंगे. निर्णय क्या, एक तरह से उन्होंने संकल्प ले लिया. वह दिन और आज का दिन, मंत्रीजी ने धोती ग्रहण नहीं किया. तत्काल कुछ रेडीमेड पैजामा मंगाया गया. बाद में डिजाइनदार पैजामा आया.

दूसरा संकट यह कि आदत न रहने के कारण पैजामा की डोरी परेशानी पैदा करने लगी. कभी बेमतलब खुल जाये तो कभी ऐन मौके पर गांठ पड़ जाये. इसका भी निदान कर लिया गया. अब वह बटन वाला पैजामा पहनते हैं. कहते हैं कि अब यही अच्छा लगता है. सार्वजनिक जीवन में कब स्वागत हो और कब खदेड़ा-खदेड़ी हो जाये, इसका क्या भरोसा?

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