सवाल विरासत का : नौकरी का शिगूफा… उड़ा दिया मजाक !

कई मामलों में नामजद होने के बावजूद लालू प्रसाद के लिए गरीब-गुड़बों में सहानुभूति है. लोग कहते हैं कि लालू प्रसाद आज भी लोगों को देखते ही पहचान लेते हैं. उन्हें कार्यकर्ताओं की अहमियत मालूम है. दूसरी ओर तेजस्वी प्रसाद यादव दिल्ली और हरियाणा के कुछ सलाहकारों के चश्मे से बिहार को देखते हैं. कार्यकर्ताओं से भेंट-मुलाकात तो बहुत दूर की बात है, उन्हें खुद के परिवार में सामंजस्य स्थापित करते हुए घर से बाहर निकलना होगा.

विशेष संवाददाता
30 दिसम्बर 2025
Patna : नामांकन की तारीख खत्म हो रही थी और राजद (RJD) अंतिम दिन तक उम्मीदवारी बांट रही थी. जो गलतियां हुई हैं, उनसे सबक लेना पड़ेगा. पता नहीं किसकी सलाह पर तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejaswi Prasad Yadav) ने एक शिगूफा छोड़ा, जो महंगा पड़ गया. हर परिवार में एक व्यक्ति को नौकरी देने की घोषणा कर डाली. यानी डेढ़ करोड़ लोगों को सरकारी नौकरी देने की लफ्फाजी! वर्तमान में एक चपरासी की नौकरी देना भी आसान नहीं होता है. सालाना चार-चार लाख रुपये वेतन वाली भी नौकरी दी जाये तो छह लाख करोड़ का बोझ, जबकि सरकार का कुल बजट ही करीब तीन लाख करोड़ का है. नौकरी के इस शिगूफे पर लोगों का भरोसा नहीं जमा. तेजस्वी प्रसाद यादव हंसी-मजाक के पात्र बन गये. आम जनता के बीच विश्वसनीयता खत्म हो गयी. माई-बहन योजना (Maee-Bahan Yojana) पर भी किसी ने भरोसा नहीं किया.
वापसी मुश्किल होगी
बिहार (Bihar) की राजनीति (Poltics) की गहन जानकारी रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार विभेष त्रिवेदी इसको इस रूप में विस्तार देते हैं- एक ओर तेजस्वी प्रसाद यादव सबको साथ लेकर ए-टू-जेड की राजनीति की बात कह रहे थे, तो दूसरी ओर राजद के कई वरिष्ठ नेता और विधायक समाज में जातीय द्वेष पैदा करने वाली टिप्पणियां कर रहे थे. लालू-राबड़ी परिवार में विवाद चलता रहा तो वापसी मुश्किल होगी. राजनीति में हार-जीत होती रहती है. हार से विचलित नहीं होना चाहिए. कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए जनता के बीच जाना पड़ेगा. लालू प्रसाद (Lalu Prasad) आम जनता और कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद-संपर्क स्थापित करते थे. बीच में संजय यादव जैसे किसी बिचौलिए की दीवार बनाये रखने से निष्पक्ष और वास्तविक फीडबैक नहीं मिल पायेगा. रोजाना 14-15 सभाओं में रस्म अदायगी के बजाय पांच-छह अच्छी सभाएं की होती तो वह ज्यादा प्रभावकारी साबित होता.
शायद ही लेंगे कोई सबक
चुनाव परिणाम की समीक्षा और जमीन से आयी सच्चाई से सीख लेकर वह आगे बढ़ते हैं तो नयी राजनीति के संकेत मिलेंगे. बहरहाल, तेजस्वी प्रसाद यादव के राजनीतिक भविष्य का आकलन करने के लिए अगले छह महीने का इंतजार करना पड़ेगा. देखना होगा कि वह अपनी गतिविधियों में कैसा परिवर्तन लाते हैं. उनके अगले कदम तय करेंगे कि वह निपट जायेंगे या गलतियों से सबक लेकर निखर जायेंगे. राजद की चुनावी दुर्दशा की समीक्षा से मुंह मोड़ और विधानसभा सत्र (Assembly Session) को बीच में छोड़ सपरिवार यूरोप (Europe) की माहव्यापी यात्रा पर निकल जाने से ऐसा लगता है कि तेजस्वी प्रसाद यादव शायद ही कोई सबक लेंगे.
लालू जैसा दिल बड़ा करें
कई मामलों में नामजद होने के बावजूद लालू प्रसाद के लिए गरीब-गुड़बों में सहानुभूति है. लोग कहते हैं कि लालू प्रसाद आज भी लोगों को देखते ही पहचान लेते हैं. उन्हें कार्यकर्ताओं की अहमियत मालूम है. दूसरी ओर तेजस्वी प्रसाद यादव दिल्ली (Delhi) और हरियाणा (Hariyana) के कुछ सलाहकारों के चश्मे से बिहार को देखते हैं. कार्यकर्ताओं से भेंट-मुलाकात तो बहुत दूर की बात है, उन्हें खुद के परिवार में सामंजस्य स्थापित करते हुए घर से बाहर निकलना होगा. इसमें दो मत नहीं कि राजद के पास जातीय आधार है. एक करोड़ से अधिक वोट लेने वाले दल को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है. लेकिन, मतदाता भी देखेंगे कि तेजस्वी प्रसाद यादव कितनी ताकत जुटा पाते हैं. कमजोर हुए तो मतदाता भटक जा सकते हैं.
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बढ़ाने होंगे नेताओं के कद
एक चुनाव हारने से फर्क नहीं पड़ता है, लेकिन सिर्फ एनडीए (NDA) में फूट, बिखराव के इंतजार में रहेंगे तो लालू प्रसाद जैसे नायक नहीं बन पायेंगे, पिछलग्गू बन कर रह जायेंगे. उन्हें दल में अलग-अलग जातियों के नेताओं के कद बढ़ाने पड़ेंगे. जिन नेताओं की अपनी पहचान है, उनके नाम से तेजस्वी प्रसाद यादव को खुजली होती है. पप्पू यादव (Pappu Yadav) ने नरेन्द्र मोदी के प्रभाव को बेअसर करते हुए संसदीय चुनाव (Parliamentary Elections) में पूर्णिया (Purnia) में निर्दलीय (Independent) जीत हासिल कर ली. कन्हैया कुमार (Kanhaiya Kumar) भूमिहारों के नेता नहीं हैं. नरेन्द्र मोदी सरकार पर ताबड़तोड़ हमले कर वह मुसलमानों के जख्म पर मरहम लगाते हैं. उनकी विचारधारा की वामपंथी तासीर शोषितों-वंचितों के दिल-दिमाग में गर्मी पैदा करती है.
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खुद को महसूस कर रहे बौना
सिर्फ पप्पू यादव और कन्हैया कुमार तिरस्कृत और उपेक्षित नहीं हो रहे, तेजस्वी प्रसाद यादव के इर्द-गिर्द किसी भी नये चेहरे को पनपने नहीं दिया जा रहा है. नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) और अमित शाह (Amit Shah) ने भाजपा में आधा दर्जन से अधिक जातियों के नेताओं को अगली कतार में खड़ा कर दिया है. तेजस्वी प्रसाद यादव के अगल-बगल में ऐसे चेहरों का सर्वथा अभाव है. राजद के नये-पुराने नेता खुद को संजय यादव (Sanjay Yadav) और शक्ति यादव (Shakti Yadav) के सामने बौना महसूस करते हैं. सांसद सुधाकर सिंह (Sudhakar Singh) और पूर्व मंत्री आलोक कुमार मेहता (Alok Kumar Mehta) जैसे नेताओं को अगली कतार में प्रभावी बनाते हुए दलित, वैश्य, पिछड़ी जातियों, अतिपिछड़ी जातियों के साथ-साथ ब्राह्मण-भूमिहार चेहरे तलाशने-तराशने पड़ेंगे. लेकिन, तेजस्वी प्रसाद यादव ऐसा शायद ही कर पायेंगे.
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