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सवाल विरासत का : राजद और ‘यादववाद’… संभव नहीं बदलाव!

राजद का एक सूत्री उद्देश्य है, तेजस्वी प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री बनाना. जैसे तमिलनाडु में स्टालिन के बाद उदयनिधि को आना है, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के बाद उनके बेटे आदित्य ठाकरे को आना है. पश्चिम बंगाल में पहले ममता बनर्जी का उद्देश्य कम्युनिस्ट पार्टी को उखाड़ना था. अब उन्हें अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को उत्तराधिकारी बनाना है. वैसे ही बिहार में लालू प्रसाद के बाद तेजस्वी प्रसाद यादव ही राजद में अंतिम सत्य हैं.

विशेष संवाददाता
28 दिसम्बर 2025

Patna : राजद का भविष्य माने जाने वाले तेजस्वी प्रसाद यादव विदेश भ्रमण में गम गीला कर रहे हैं. साथ में उनका परिवार भी है. वैसे, कहा जाता है कि हार की हताशा-निराशा में राजद को डूबते-उपलाते छोड़ क्रिसमस (Christmas) मनाने यूरोप गये हैं. चुनाव परिणाम के एक सप्ताह बाद तक घर में बंद रहने के बाद तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejaswi Prasad Yadav) पैंट-शर्ट पहन कर निकले भी थे तो सीधे पटना हवाई अड्डा पहुंच पत्नी-बच्चों के पास दिल्ली (Delhi) चले गये. फिर लौट भी आये. राजद (RJD) ने विधानसभा चुनाव (Assembly Election) की प्रमंडल स्तरीय समीक्षा की. खामियां ही खामियां निकलकर सामने आयी. संजय यादव (Sanjay Yadav) रहेंगे और दबी जुबान से नेताओं-कार्यकर्ताओं के बड़े वर्ग में बड़बड़ाहट होती रहेगी. लेकिन, पारिवारिक पार्टी के मालिक तेजस्वी प्रसाद यादव को किसी भी रूप में कोई चुनौती नहीं दी जा सकती है. उनके खिलाफ मुंह खोलना महंगा पड़ जा सकता है. संजय यादव राज्यसभा में छह साल का कार्यकाल पूरा करेंगे. उन्हें हटाने से कोई फायदा नहीं. तेजस्वी प्रसाद यादव को जब कोई सियासी गुत्थी सुलझानी होगी, संजय यादव को पकड़ना ही पड़ेगा.

यही अंतिम सत्य है

बिहार की राजनीति (Bihar Politics) की गहरी समझ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार विभेष त्रिवेदी का स्पष्ट मानना है कि इस शर्मनाक हार के बाद भी राजद में कोई दिशा या दशा परिवर्तन नहीं होने जा रहा है. राजद का एक सूत्री उद्देश्य है, तेजस्वी प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री बनाना. जैसे तमिलनाडु (Tamilnadu) में स्टालिन (Stalin) के बाद उदयनिधि (Udaynidhi) को आना है, महाराष्ट्र (Maharashtra) में उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) के बाद उनके बेटे आदित्य ठाकरे (Aditya Thackeray) को आना है. पश्चिम बंगाल (West Bengal) में पहले ममता बनर्जी (Mamta Banargi) का उद्देश्य कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party) को उखाड़ना था. अब उन्हें अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) को उत्तराधिकारी बनाना है. वैसे ही बिहार में लालू प्रसाद (Lalu Prasad) के बाद तेजस्वी प्रसाद यादव ही राजद में अंतिम सत्य हैं. लालू प्रसाद के बड़े पुत्र तेजप्रताप यादव (Tejpratap Yadav) को भाजपा (BJP) मोहरा बना सकती है, लेकिन तेजस्वी प्रसाद यादव को उससे कोई खतरा नहीं है. खतरा तब पैदा होगा जब वह अपना ‘पुरुषार्थ’ पैदा नहीं कर पायेंगे.

यादववाद के पर्याय

विभेष त्रिवेदी के मुताबिक तेजस्वी प्रसाद यादव को खतरा खुद की छवि से है. वह यादववाद के पर्याय दिखने लगे हैं, जबकि समाज की बहुसंख्य जातियां यादवों की दबंगई और बड़बोलेपन को फूटी आंख भी पसंद नहीं करती हैं. आमतौर पर हो यह रहा है कि जब-जब यादव समाज के लोग जोश में आते हैं, अगड़ी-पिछड़ी जातियों के कान खड़े हो जाते हैं. पहले यादवों की सक्रियता, दबंगई से काम आसान हो जाता था. डर इस बात का होता था कि लालू प्रसाद पराजित हो गये तो सवर्ण राज आ जायेगा. अब अगड़ों का राज आने का कोई खतरा नहीं रहा. डा. श्रीकृष्ण सिंह (Dr. Srikrishna Singh) के लंबे शासनकाल के दौरान ही बिहार की सियासत में भूमिहारों के वर्चस्व का विरोध शुरू हो गया था. इसमें डा. राजेंद्र प्रसाद (Rajendra Prasad), जयप्रकाश नारायण (Jayprakash Narayan) और कुछ ऐसे नेताओं की बड़ी भूमिका थी, जो डा. श्रीकृष्ण सिंह के रहते हुए और उनके बाद भी मुख्यमंत्री बनना चाहते थे. डा. श्रीकृष्ण सिंह के बाद कई जातियों के मुख्यमंत्री बने, परन्तु सबसे लंबा शासनकाल ब्राह्मण नेताओं का रहा.

चुकानी पड़ गयी कीमत

कर्पूरी ठाकुर (Karpuri Thakur) 1977 में मुख्यमंत्री बने, उन्होंने आरक्षण लागू किया. उनका व्यापक विरोध हुआ. कुर्सी से हटा दिये गये. पिछड़ी, अतिपिछड़ी जातियों में संदेश गया कि कर्पूरी ठाकुर को आरक्षण की कीमत चुकानी पड़ी. अगड़ी जातियों के राजनीतिक वर्चस्व के खिलाफ पिछड़ी-अतिपिछड़ी जातियों के दिल में सुलगती आग को लालू प्रसाद ने कथित रूप से ‘भूरा बाल साफ करो’ के नारे से हवा दे दी. लालू प्रसाद मजबूत होते गये और उन्हें शक्तिशाली बनाने वाली गैर यादव पिछड़ी, अतिपिछड़ी जातियों के नेता हाशिये पर धकेल दिये गये. लालू-राबड़ी शासनकाल में लालू प्रसाद के परिवार और यादवों का बोलबाला हो गया. उसी ‘बोलबाला’ का भय तेजस्वी प्रसाद यादव के सत्ता की राह रोक दे रहा है.

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हिस्सेदारी खोज रहे पिछड़े

विधानसभा के चुनावों में यादव समाज सौ से अधिक सीटों पर दावा ठोकता है और पीछे हटने को तैयार नहीं होता है. जबकि जमीनी हकीकत यह है कि यादव मतदाता मुसलमान या किसी अन्य जाति के प्रत्याशी को वोट देने से मुंह सिकोड़ने लगे हैं. जातीय जनगणना के बाद अलग-अलग जातियों में राजनीतिक महत्वाकांक्षा सिर चढ़कर बोल रही है. जनगणना (janaganana) में गड़बड़ी और आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी नहीं देने के आरोप लग रहे हैं. 1990 से 2025 के बीच 35 वर्षों में सियासत में हिस्सेदारी बांटने की हैसियत मुख्य रूप से लालू प्रसाद (Lalu Prasad), नीतीश कुमार (Nitish Kumar), सुशील कुमार मोदी (Sushil Kumar Modi), रामविलास पासवान (Ramvilesh Paswan) के हाथों में रही है. अगड़ी जातियों का वर्चस्व लगभग समाप्त हो गया है.

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