तापमान लाइव | Tapmanlive

न्यूज़ पोर्टल | Hindi News Portal

सवाल विरासत का : जंगलराज का डर… मुश्किल है सत्ता की डगर!

भले ही कुर्मी समाज नीतीश कुमार के लिए जान देता है और कुर्मी जाति के अधिकारियों को महत्व भी मिल रहा है, लेकिन नीतीश कुमार के शासनकाल में कुर्मी राज का परिदृश्य नहीं उभरा है. कभी भूमिहारों के खिलाफ जो गोलबंदी हुई थी, अब वह गोलबंदी यादवों के खिलाफ देखी जा रही है, वैसा विरोध कुर्मी समाज के खिलाफ नहीं है.

विशेष संवाददाता
29 दिसम्बर 2025

Patna : राजद में यादववाद को इस रूप में आसानी से समझा जा सकता है कि लालू-राबड़ी शासनकाल में भूमिहारों का गढ़ खत्म हो गया. औराई (Aurae), कुढ़नी (kudhane), पारू (Paru), साहेबगंज (Sahebganj) समेत सूबे के 50 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में, जहां भूमिहार (Bhumihar) मतदाताओं की संख्या काफी थी, भूमिहार समाज दावेदारी छोड़कर बैकफुट पर आ गया. भूमिहारों की प्राथमिकता आज अपनी जाति का विधायक बढ़ाना नहीं, लालू प्रसाद (Lalu Prasad) के कथित जंगलराज (jangalaraj) से मुक्ति है. भूमिहार नेताओं की दावेदारी खत्म हो गयी. भले ही कुर्मी (Kurmi) समाज नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के लिए जान देता है और कुर्मी जाति के अधिकारियों को महत्व भी मिल रहा है, लेकिन नीतीश कुमार के शासनकाल में कुर्मी राज का परिदृश्य नहीं उभरा है. कभी भूमिहारों के खिलाफ जो गोलबंदी हुई थी, अब वह गोलबंदी यादवों के खिलाफ देखी जा रही है, वैसा विरोध कुर्मी समाज के खिलाफ नहीं है.

नहीं निकला डर

हालात ऐसे हैं कि अब दूसरी जातियों में जैसे ही यादव (Yadav) राज का भय पैदा होता है, तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejaswi Prasad Yadav) धक्का खाकर सत्ता से दूर चले जाते हैं. कह सकते हैं कि राज्य की तमाम जातियों को अब यादवों की दबंगई से चिढ़ है. राजद की रैलियों में बजने वाले अभद्र गानों और एनडीए (NDA) की डिजिटल मीडिया रणनीति ने जनता के बीच से जंगल राज का डर नहीं निकलने दिया. मुसलमान (Musalman) भी कहते हैं कि यादव समाज उनकी हकमारी कर रहा है. इस बार जैसे-जैसे तेजस्वी प्रसाद यादव के पक्ष में माहौल बनता दिखाई दिया, गैरयादव पिछड़ी, अतिपिछड़ी जातियों के लोग डर गये. सवर्ण जातियों के लोग गांवों में पहले की तरह दबंग नहीं रहे.

यह भी पढ़ें :

सवाल विरासत का : राजद और ‘यादववाद’… संभव नहीं बदलाव!

यादव पीछे हटेंगे तब…

बिहार (Bihar) की राजनीति (Politics) की गहरी समझ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार विभेष त्रिवेदी का सीधे तौर पर मानना है कि तेजस्वी प्रसाद यादव को ए-टू-जेड की ईमानदार राजनीति के लिए यादवों पर लगाम कसने पड़ेंगे. उनकी वापसी के लिए यादव समाज को स्वजातीय विधायक की जिद छोड़नी पड़ेगी. मुस्लिम, धानुक, कुशवाहा, अतिपिछड़ी जातियों के विधायकों की संख्या बढ़ानी पड़ेगी. पंचायत में, थाने में, प्रखंड कार्यालय में और जिला मुख्यालयों में अतिपिछड़ी जातियों के सामने दबंगई से परहेज करना पड़ेगा. इसके साथ तेजस्वी प्रसाद यादव को राजनीतिक संस्कृति और अपनी कार्यशैली में आमूलचूल परिवर्तन लाना होगा. सोच-समझकर राजनीतिक दिशा और दृष्टि तय करनी पड़ेगी. वह लालू प्रसाद से खुद की तुलना नहीं कर सकते हैं. लालू प्रसाद ने बहुत संघर्ष किया था. वह सही वक्त पर निर्णय लेना जानते थे. 2015 में उन्होंने नीतीश कुमार से हाथ मिलाकर ताकत बढ़ायी और राजद को पुनर्जीवित कर दिया. अब लालू प्रसाद न तो निर्णय लेने की स्थिति में हैं और न ही तेजस्वी प्रसाद यादव उनके अनुशासन में हैं.

यह भी पढ़ें :

तेजस्वी और संजय : याराना है बहुत पुराना

उतनी परिपक्वता नहीं

लालू प्रसाद जैसी सूझ-बूझ और परिपक्वता तेजस्वी प्रसाद यादव में नहीं दिख रही है. उनके सलाहकार लालू प्रसाद की गैर मौजूदगी की भरपाई नहीं कर पाये. मीडिया से जानकारी मिल रही है कि तेजस्वी प्रसाद यादव ने गलत सर्वे रिपोर्ट के आधार पर मनमाने तरीके से उम्मीदवारी दी. सीतामढ़ी (Sitamarhi) जिले के परिहार (Parihar) में रितू जायसवाल (Ritu Jaiswal) को उम्मीदवारी से वंचित कर पूर्व मंत्री डा. रामचंद्र पूर्वे (Dr. Ramchandra Purvey) की पुत्रवधू स्मिता गुप्ता (Smita Gupta) को प्रत्याशी बना दिया. बागी रितू जायसवाल ने 65 हजार 455 मत लाकर राजद को तीसरे स्थान पर धकेल दिया. मुजफ्फरपुर (Muzaffarpur) के कांटी (Kanti) में पूर्व मंत्री इसराइल मंसूरी (Israel Mansoori) के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी (Anti-Incumbency) को नजरंदाज कर दिया गया. तेजस्वी प्रसाद यादव इस सच्चाई से भी बेखबर रहे कि कांटी में अन्य मुसलमानों की तुलना में इसराइल मंसूरी का वोट बहुत कम है. पूरे राज्य में ऐसी गलतियों की सूची बहुत लंबी है.

***

#Tapmanlive