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बिहार प्रदेश भाजपा : किसकी जेब से निकले संजय सरावगी?

संजय सरावगी के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी, खुद को और प्रदेश भाजपा को खेमेबाजी से ऊपर उठाये रखना. प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रहे नेताओं ने अपने-अपने कार्यकाल में कथित रूप से गुटबाजी इतनी बढ़ा दी कि किसी का गुटनिरपेक्ष बने रहना मुश्किल हो गया. एक से मिलने वाला, दूसरे के निशाने पर चढ़ता रहा. एक धाकड़ पूर्व अध्यक्ष कान फूंकते रहे और बिहार भाजपा में ‘सिरफुटव्वल’ चलता रहा.

अक्षय आकाश
05 जनवरी 2026

PATNA : किसी से पूछिये कि संजय सरावगी (Sanjay Saraogi) को बिहार भाजपा (Bihar BJP) की कमान क्यों सौंपी गयी, तो जवाब मिलेगा-वैश्य समाज से आते हैं. लगातार छह बार दरभंगा (Darbhanga) से विधायक निर्वाचित हुए हैं. बिहार सरकार में मंत्री रहे हैं. इसी तरह लोग कह रहे हैं कि कायस्थ होने की वजह से नितिन नवीन (Nitin Naveen) को भाजपा का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है. रबर स्टाम्प को बनाया गया है. सवाल उठता है कि क्या भाजपा जैसी पार्टी, जो दिल्ली (Delhi) समेत देश के कई राज्यों में सरकार चला रही है, सिर्फ रबर स्टाम्प की बदौलत चल रही है? अगर हां, तो कांग्रेस (Congress) भी ऐसे ही रबर स्टाम्प क्यों नहीं खड़ा कर लेती है? संजय सरावगी हों या नितिन नवीन, उनको गढ़े जाने की लंबी प्रक्रिया पर नजर दौड़ायी जाये, तो पता चलेगा कि भाजपा कैसे चेहरे तराशती है? भले ही कोई रातो-रात सम्राट चौधरी (Samrat Choudhary) बन जाता है, लेकिन यह सब अपवाद ही है. यूं ही कोई नितिन नवीन या संजय सरावगी नहीं बन जाता है.

थोड़ा अतीत में चलिये

अतीत में चलिये. नवम्बर का महीना और वर्ष था 2003. राजधानी दिल्ली में गुलाबी ठंड थी, परन्तु वातावरण में दिल्ली विधानसभा चुनाव की सियासी गर्मी से उबाल था. अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्र में पूर्वांचल (Purvanchal) के मतदाताओं के बीच बिहार से बुलाये गये भाजपाई सघन जन-संपर्क अभियान चला रहे थे. सर्वाधिक सरगर्मी गोल मार्केट (Gol Market) निर्वाचन क्षेत्र में थी, जहां से कांग्रेसी मुख्यमंत्री (Chif Minister) शीला दीक्षित (Shiela Dixit) चुनाव लड़ रही थीं. मशहूर क्रिकेटर और दरभंगा के तत्कालीन भाजपा सांसद कीर्ति झा आजाद (Kirti Jha Azad) की पत्नी पूनम आजाद (Poonam Azad) को भाजपा का उम्मीदवार बनाये जाने से यह हॉट सीट बन गयी थी. दरअसल, कीर्ति झा आजाद भी पहली बार गोल मार्केट से ही विधायक निर्वाचित हुए थे. गोल मार्केट को वह अपनी सीट समझते थे. इसे बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक चुके थे.

उनका भी सीना हुआ चौड़ा

बिहार के कुछ मंझे हुए कार्यकर्त्ताओं की टीम गोल मार्केट में काम कर रही थी. उस टीम में दरभंगा जिला भाजपा के महामंत्री संजय सरावगी और पटना से युवा मोर्चा के निरंजन शर्मा जैसे कुछ उत्साही, ऊर्जावान युवा भी शामिल थे. ये लोग सुबह-सुबह जन-संपर्क में निकल पड़ते थे. दोपहर में राधामोहन सिंह (Radhamohan Singh) इनके लिए किसी पार्क में रोटी-भुजिया भेज देते थे. खाना खाकर ये पानी पीते और फिर प्रचार में जुट जाते. शाम को कीर्ति झा आजाद और वरीय नेताओं को यह टीम दिन भर की रिपोर्ट सौंपती थी. कीर्ति झा आजाद आज भाजपा में नहीं हैं, लेकिन जब संजय सरावगी को प्रदेश भाजपा की कमान सौंपे जाने की खबर मिली होगी तो निश्चित रूप से उनका सीना भी चौड़ा हुआ होगा.

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संगठन को जीवंत बनायेंगे

सीना चौड़ा तो उपमुख्यमंत्री (Deputy Chief Minister) विजय कुमार सिन्हा (Vijay Kumar Sinha) का भी हुआ है. पर, अंदर ही अंदर बिहार भाजपा के उन कुछ दिग्गजों की सांसें फूल रही होंगी, जो चाहते थे कि उनकी जेब के ही किसी रबर स्टाम्प को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाया जाये. जिस सियासी गुरुकुल से संजय सरावगी ने संगठन कौशल के गुर सीखे, वहां के पूर्ववर्ती सहपाठियों का कहना है कि संजय सरावगी किसी सम्राट चौधरी, नित्यानंद राय (Nityanand Rai), डा. संजय जायसवाल (Dr. Sanjay Jaiswal) या डा. दिलीप जायसवाल (Dr. Dleep Jaiswal) से डिक्टेशन नहीं लेंगे. हां, वह शीर्ष नेतृत्व के दिशा-निर्देश का पालन अवश्य करेंगे. भीखूभाई दलसानिया (Bhikhubhai Dalsania), विनोद तावड़े (Vinod Tawde) की आंखों की भाषा पढ़ लेंगे. अपनी ऊर्जा, अनुभव और सक्रियता से संगठन को जीवंत बनायेंगे.

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सबसे बड़ी चुनौती

केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय संभवतः यही चाहते हैं कि भले ही प्रदेश अध्यक्ष उनका पिछलग्गू नहीं बने, परन्तु वह सम्राट चौधरी की हां में हां नहीं मिलाये. केन्द्रीय नेतृत्व भी कामकाजी अध्यक्ष चाहता है. भाजपा सत्ता में रहे या विपक्ष में, संगठन पर सालों भर काम का दबाव रहता है. अध्यक्ष को सांस लेने की फुर्सत नहीं मिलती है. संजय सरावगी के सामने ताजा उदाहरण है, भाजपा में ईमानदारी से मेहनत करने वाला ‘नितिन नवीन’ बना दिया जाता है. संजय सरावगी के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी, खुद को और प्रदेश भाजपा को खेमेबाजी से ऊपर उठाये रखना. प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रहे नेताओं ने अपने-अपने कार्यकाल में कथित रूप से गुटबाजी इतनी बढ़ा दी कि किसी का गुटनिरपेक्ष बने रहना मुश्किल हो गया. एक से मिलने वाला, दूसरे के निशाने पर चढ़ता रहा. एक धाकड़ पूर्व अध्यक्ष कान फूंकते रहे और बिहार भाजपा में ‘सिरफुटव्वल’ चलता रहा.

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(अक्षय आकाश प्रतिभाशाली युवा पत्रकार हैं)
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