अचंभित मुजफ्फरपुर : पलट गयी बाजी, टूट गये कई मिथक

मुजफ्फरपुर में ही नहीं, कांटी और कुढ़नी समेत जिले की अधिकांश सीटों पर कई मिथक टूट गये. कांटी में एक मिथक था, एक बार हारने के बाद पूर्व विधायक की वापसी नहीं होती. पिछले दो चुनाव हार चुके पूर्व मंत्री अजीत कुमार ने वहां चौथी जीत दर्ज की. इससे पहले पूर्व मंत्री प्रो. नलिनी रंजन सिंह कांटी से तीन बार निर्वाचित हुए थे. कुढ़नी में मिथक था, यहां के विधायक मंत्री बनते हैं, उसके बाद कभी चुनाव नहीं जीत पाते हैं.

अक्षय आकाश
10 जनवरी 2026
Muzaffarpur: मुजफ्फरपुर में यह मिथक टूट गया कि कार्यकर्त्ता ही चुनाव जीताते हैं. यह भी कि प्रधानमंत्री (Prime Minister) नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) के ‘मन की बात’ सुनने वाले कार्यकर्त्ता अनुशासित और दल के प्रति निष्ठावान होते हैं. इस जिले में विधायकों के कुल 11 में से 08 चेहरे बदल गये. 06 नये चेहरे विधानसभा में पहुंचे. संकल्पित मतदाताओं ने भाजपा (BJP) कार्यकर्त्ताओं की मनमानी नहीं चलने दी. अलग-अलग कारणों से पारू, कांटी, मुजफ्फरपुर, बोचहां, सकरा, गायघाट, औराई, मीनापुर के विधायकों के चेहरे बदल गये. मुजफ्फरपुर में कांग्रेस (Congress) के विजेन्द्र चौधरी (Vijendra Chaudhary), कांटी में राजद (RJD) के इसराइल मंसूरी, मीनापुर (Minapur) में जातिवादी आग उगलने वाले राजीव कुमार उर्फ मुन्ना यादव, गायघाट (Gayghat) में निरंजन राय और बोचहां (Bochahan) में अमर पासवान मुंह की खा गये.
बन गये राह का रोड़ा
पारू में निवर्तमान भाजपा विधायक अशोक कुमार सिंह (Ahhok Kumar Singh) को हाशिये की तरफ सरका दिया गया तो बागी बनकर मैदान में कूद पड़े. निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में 40 हजार 661 मत बटोर रालोमो (RLM) उम्मीदवार मदन चौधरी (Madan Choudhary) की राह का रोड़ा बन गये. औराई (Aurae) में निवर्तमान भाजपा विधायक रामसूरत राय (Ramsurat Rai) को भी उम्मीदवारी से वंचित कर दिया गया. उनकी भलमनसाहत रही कि उन्होंने भाजपा प्रत्याशी रमा निषाद (Rama Nishad) का खुलकर साथ दिया. सकरा (Sakra) के जदयू विधायक अशोक कुमार चौधरी विधान पार्षद (MLC) दिनेश प्रसाद सिंह (Dinesh Prasad Singh) से ‘गुरु मंत्र’ लेकर पुत्र आदित्य कुमार (Aditya Kumar) को प्रत्याशी बनवाने और चुनाव जीताने में सफल रहे. हलांकि, बेटा के विधायक बनने के कुछ ही समय बाद अशोक कुमार चौधरी स्वर्ग सिधार गये.
पहली बार बने विधायक
कांटी में पूर्व मंत्री अजीत कुमार (Ajit Kumar) और बोचहां में बेबी कुमारी (Baby Kumari) की बतौर विधायक वापसी हुई. औराई से भाजपा की रमा निषाद, मुजफ्फरपुर से भाजपा के ही रंजन कुमार (Ranjan Kumar), गायघाट से जदयू की कोमल सिंह (Komal Singh), मीनापुर से जदयू के अजय कुशवाहा (Ajay Kushwaha) एवं सकरा से जदयू के ही आदित्य कुमार (Aditya Kumar) और पारू से राजद के शंकर प्रसाद यादव (Shankar Prasad Yadav) पहली बार विधायक निर्वाचित हुए. महागठबंधन को सिर्फ पारू में सफलता मिली. अशोक कुमार सिंह को एनडीए (NDA) की उम्मीदवारी मिली होती तो महागठबंधन (Mahagathbandhan) शून्य में सिमट जाता.
एक नहीं सुनी उनकी
हर महीने आखिरी रविवार को प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ सुनने-सुनाने वाले भाजपा के सैकड़ों नेताओं व कार्यकर्त्ताओं ने मुजफ्फरपुर में पार्टी उम्मीदवार रंजन कुमार को धूल चटाने की ठान रखी थी. परन्तु, मतदाताओं (Voters) ने उनकी एक नहीं सुनी. भाजपा के जिला अध्यक्ष से लेकर प्रदेश भाजपा के संगठन महामंत्री भीखूभाई दलसानिया (Bhikhubhai Dalsania) के बगल में बैठने वाले प्रदेश पदाधिकारी तक, विरोधियों को हवा दे रहे थे. यह सब छिप-छिप कर नहीं, खुल्लम-खुल्ला होता रहा. कांटी में पूर्व मंत्री अजीत कुमार को प्रत्याशी बनाने पर एनडीए में सभी एक मत थे, इधर घटक दलों के जिला अध्यक्ष मीडिया के सामने संभावित उम्मीदवार के खिलाफ आग उगल रहे थे.
बन गया मतदान का रिकार्ड
गायघाट में तो पर्यवेक्षक की मौजूदगी में हुए एनडीए के कार्यकर्ता सम्मेलन में धक्का-मुक्की और नारेबाजी तक हुई. पार्टी नेताओं के भितरघात, विरोध और बयानबाजी से हालात इतने नाजुक थे कि कई क्षेत्रों में एनडीए उम्मीदवारों को समानांतर टीम गठित करनी पड़ी. मतदान (Voting) से पहले ही भाजपा नेता संतोष साहेब (Santosh Saheb) ने पार्टी के धुरंधरों को अंगूठा दिखाते हुए फेसबुक पर लिखा- ‘मुजफ्फरपुर भाजपा पर भारी रहा टीम रंजन! 17 हजार से 21 हजार के बीच में रंजन कुमार की जीत
निश्चित.’ दरअसल एनडीए की सुनामी में मुजफ्फरपुर के मतदाताओं ने 72.14 प्रतिशत मतदान का रिकार्ड बनाया. कई क्षेत्रों में भितरघात के बावजूद मोदी-नीतीश के दीवाने (Modi-Nitish fans) मतदाताओं ने जिले की 11 में से 10 सीटों पर एनडीए को जीताकर रिकार्ड कायम कर दिया.
पर जा सकता है महंगा
मुजफ्फरपुर में ही नहीं, कांटी और कुढ़नी समेत जिले की अधिकांश सीटों पर कई मिथक टूट गये. कांटी में एक मिथक था, एक बार हारने के बाद पूर्व विधायक की वापसी नहीं होती. पिछले दो चुनाव हार चुके पूर्व मंत्री अजीत कुमार ने वहां चौथी जीत दर्ज की. इससे पहले पूर्व मंत्री प्रो. नलिनी रंजन सिंह (Pro. Nalini Ranjan Singh) कांटी से तीन बार निर्वाचित हुए थे. कुढ़नी में मिथक था, यहां के विधायक मंत्री बनते हैं, उसके बाद कभी चुनाव नहीं जीत पाते हैं. पूर्व मंत्री रामपरीक्षण साहू (Ramparikchan Sahu), बसावन भगत (Basawan Bhagat) और मनोज कुशवाहा के उदाहरण दिये जाते रहे हैं. एनडीए की सुनामी में राज्य के तब के पंचायती राज मंत्री केदार प्रसाद गुप्ता (Kedar Prasad Gupta) फिर चुनाव जीत गये. पर, जीत के जश्न में एनडीए और खासकर भाजपा नेतृत्व ने कड़वी जमीनी हकीकत को नजरंदाज किया, तो आने वाले दिनों में वह महंगा पड़ जा सकता है.
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मोदी-नीतीश पर भरोसा
पार्टी नेतृत्व के लिए यह पता करना जरूरी है कि प्रदेश और जिला भाजपा के कौन-कौन प्रत्याशी शहरी क्षेत्र में छोटी-छोटी चुनावी बैठकों को भी विफल कर रहे थे? जीतने वाले विधायक और उनके समर्थक इस मुगालते में न रहें कि उनकी खुद की ताकत व लोकप्रियता की जीत हुई है. सच तो यह है कि प्रत्याशियों की टीम की नहीं, महिला मतदाताओं की जीत हुई है. पेंशन, वजीफे, मुफ्त बिजली-अनाज की वजह से एनडीए के पक्ष में चली सुनामी की जीत हुई है. मतदाताओं ने मोदी-नीतीश के चेहरे पर भरोसा किया. जनता तेजस्वी प्रसाद यादव के हाथ में बिहार सौंपने को तैयार नहीं हुई. फिर से जंगल राज (Jangalraj) नहीं आने देने के संकल्प की जीत हुई है.

(अक्षय आकाश प्रतिभाशाली युवा पत्रकार हैं)
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