सर्वोच्च अदालत : मनुस्मृति को बनाया फैसले का आधार!

तापमान लाइव ब्यूरो
23 फरवरी 2026
New Delhi : देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने हाल के अपने एक फैसले में मनुस्मृति का उल्लेख किया. नकारात्मक नहीं, एक महिला के भरण-पोषण संबंधी मामले में सकारात्मक संदर्भ में. इस उल्लेख को मनुस्मृति (Manusmriti) का विरोध करनेवालों की आंखें खोलने जैसा भी माना जा सकता है. ‘लाइव लॉ’ के अनुसार शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में मनुस्मृति के श्लोक ‘न माता न पिता न स्त्री न पुत्रस्त्यागमर्हति. त्यजन्नपतितानेतान राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट’ का जिक्र किया. बताया कि मनुस्मृति में वर्णित है कि माता, पिता, पत्नी और पुत्र को कभी नहीं छोड़ना चाहिए और जो व्यक्ति ऐसा करता है उसे दंडित किया जाना चाहिए.
मामला गुजारा भत्ते का
मीडिया रिपोर्ट (Media Report) के मुताबिक मामला यह कि किसी विवाहित महिला के पति की मृत्यु उनके ससुर के जीवनकाल में हो जाती है तो उसे भरण-पोषण मिल सकता है. ससुर की मृत्यु के बाद पति की मृत्यु होती है तो क्या उसे यह अधिकार प्राप्त होगा? याचिकाकर्ता का तर्क था कि पति खो चुकी महिला को ससुर की मृत्यु के बाद गुजारा भत्ता पाने का कोई हक नहीं बनता है. सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश (Jjudge) पंकज मित्तल (Pankaj Mittal) और एसवीएन भट्ठी (SVN Bhatti) की दो सदस्यीय खंडपीठ ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया.
भरण-पोषण का पूरा अधिकार
मनुस्मृति में वर्णित सिद्धांत को आधार बनाते हुए हिन्दू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत बहू का ससुर की संपत्ति पर हक बताया और उनके पक्ष में फैसला सुनाया. शीर्ष अदालत ने कहा कि पति की मृत्यु के समय के आधार पर विधवा हुई बहुओं के बीच भेदभाव करना पूरी तरह से तर्कहीन, मनमाना और असंवैधानिक है. दोनों ही परिस्थितियों में-चाहे बहू ने ससुर के जीवनकाल में अपने जीवनसाथी को खोया हो या उनकी मृत्यु के बाद, उसे भरण-पोषण का पूरा अधिकार है.
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उत्तराधिकारियों का दायित्व
अदालत ने हिन्दू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 22 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि यह प्रावधान मृतक हिन्दू के निर्भर व्यक्तियों के भरण-पोषण की व्यवस्था करता है. मृतक की संपत्ति से उसके सभी उत्तराधिकारियों का यह दायित्व बनता है कि वे निर्भर व्यक्तियों, जिनमें विधवा हो चुकी बहू भी शामिल है, का भरण-पोषण करें. पति की मौत ससुर की मृत्यु से पहले या बाद में हुई हो, कानून की संकीर्ण या तकनीकी व्याख्या के आधार पर विधवा हो चुकी बहू को भरण-पोषण से वंचित करना उसे गरीबी और सामाजिक अलगाव की ओर धकेलना होगा.
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