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बिहार : नयी निजामत…खत्म हो जायेंगे अच्छे दिन!

नीतीश कुमार के कुछ खास विश्वस्तों की मंडली, जिस भूंजा पार्टी नाम मिला हुआ है, उसका क्या होगा? मंडली के सदस्यों की हैसियत वैसी ही बनी रहेगी या नयी निजामत में वे सब महत्वहीन बना दिये जायेंगे? ये ऐसे सवालात हैं जो इन दिनों राजनीतिक चर्चाओं का बेहद रोचक विषय बने हुए हैं.

 

शिवकुमार राय
04 अप्रैल 2026

Patna : नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री (Chief Minister) का पद त्याग राज्यसभा (Rajya Sabha) सदस्य के तौर पर राष्ट्रीय राजनीति (National Politics) में जम जाने के बाद बिहार (Bihar) की सत्ता और सियासत का स्वरूप क्या होगा? मोहरे किस रूप में, कैसे और किसके द्वारा बिछाये जायेंगे? नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के कुछ खास विश्वस्तों की मंडली, जिस भूंजा पार्टी (Bhunja Party) नाम मिला हुआ है, उसका क्या होगा? मंडली के सदस्यों की हैसियत वैसी ही बनी रहेगी या नयी निजामत में वे सब महत्वहीन बना दिये जायेंगे? ये ऐसे सवालात हैं जो इन दिनों राजनीतिक चर्चाओं का बेहद रोचक विषय बने हुए हैं. अधिकतर लोग यह जानना चाहेंगे कि बिहार की बदली सत्ता-व्यवस्था में नीतीश कुमार की ‘नाक का बाल’ माने जाने वाले केन्द्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह (Lalan Singh) को कितना महत्व मिलेगा और उनकी भूमिका क्या होगी.

तब मुश्किल हो जायेगा

वैसे, ललन सिंह के बारे में सामान्य धारणा है कि महत्व बनाये रखने के लिए वह हालात के अनुरूप खुद को ढाल लेने में माहिर हैं. इसके एक नहीं, अनेक दृष्टांत हैं. लालू प्रसाद (Lalu Prasad) को ‘जंगल राज’ (Jungleraj) का प्रतीक बताते-बताते जब वह उन्हें ‘सामाजिक न्याय का मसीहा’ बताने लग गये, तो फिर खुद की राजनीति का रंग और ढंग बदलने में उनकी कलाबाजी की कोई थाह नहीं लगायी जा सकती है. इसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि बिहार की बदली सत्ता व्यवस्था में भी उनके रुतबा-रुआब पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा. किसी कारणवश फर्क पड़ गया, तो फिर नीतीश कुमार के ‘पलटी मार’ का नया अध्याय जुड़ने के खतरे को टालना काफी मुश्किल हो जायेगा.

नहीं पड़ेगा कोई असर

विश्वस्तों की मंडली के दूसरे महत्वपूर्ण सदस्य जदयू (JDU) के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा (Sanjay Jha) की राजनीति कुछ दूसरे किस्म की होती है. उसमें खुले रूप में रुतबा-रुआब झाड़ने जैसी झलक नहीं दिखती है. मन ही मन वह बहुत कुछ सोचते हैं और योजना बनाते हैं, पर ऊपर से बहुत सीधा दिखते हैं. गांव-समाज में ऐसे अंतर्मुखी लोगों को ‘भितरघुन्ना’ कहा जाता है. नीतीश कुमार के ‘गृहस्थाश्रम’ की ओर मुखातिब इकलौते ‘वीतरागी’ पुत्र निशांत कुमार (Nishant Kumar) को सांसारिक, विशेष कर राजनीतिक गुर सिखाने की जिम्मेदारी फिलहाल वही संभाल रहे हैं. इस दृष्टि से बदली सत्ता-व्यवस्था में संजय झा की हैसियत पर कोई ज्यादा असर पड़ेगा, इसकी संभावना नहीं दिखती है. इसलिए भी नहीं कि नीतीश कुमार के तो वह अत्यंत करीब हैं ही, संबंध उनके भाजपा (BJP) के शीर्ष नेतृत्व से भी है. इसके बाद भी उनकी हैसियत पर आंच आयी, तो बिहार में एनडीए (NDA) की राजनीति की दिशा बदल जा सकती है.

जरूरत नये निजाम को भी

विजय कुमार चौधरी (Vijay Kumar Choudhary) मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सबसे अधिक भरोसेमंद करीबी माने जाते हैं. नीतीश कुमार के लिए राजनीतिक दृष्टि से ललन सिंह महत्व रखते हैं, तो प्रशासनिक दृष्टि से विजय कुमार चौधरी. सत्ता व्यवस्था बदलती है तो पुत्र निशांत कुमार के उपमुख्यमंत्री (Deputy Chief Minister) के पद पर रहने के बाद भी नीतीश कुमार मुख्य रूप से विजय कुमार चौधरी के जरिये ही सरकार पर अपनी पकड़ बनाये रख सकते हैं. इस लिहाज से नयी सरकार में विजय कुमार चौधरी को भी उपमुख्यमंत्री बनाया जा सकता है. वैसे, विश्लेषकों का मानना है कि उनकी शालीनता और व्यवहार कुशलता भरी विश्वसनीयता की जरूरत नये निजाम को भी होगी. ऐसे में उनकी हैसियत अप्रभावित रह सकती है.

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तब भी दूर है इत्मीनान

बड़ा सवाल अब यह कि नीतीश कुमार को ‘मानस पिता’ मानने वाले अशोक चौधरी (Ashok Choudhary) की हैसियत का क्या होगा? विश्वस्तों की मंडली के यही एक ऐसे सदस्य दिख रहे हैं जिनके ‘अच्छे दिनों’ के अवसान का खतरा मंडरा रहा है. तभी नीतीश कुमार का सत्ता से अलग होना उन्हें कुछ अधिक कचोट रहा है. कुछ हो या नहीं हो, उनके सिर से सिर टकरा राजनीति में महत्व बढ़ाने वाले मुख्यमंत्री तो नहीं ही मिलेंगे. ‘अच्छे दिन’ बने रहें इसके लिए अशोक चौधरी ने कामख्या मंदिर (Kamakhya Temple) में अनुष्ठान-दर-अनुष्ठान कराया है. इसके बाद भी इत्मीनान दूर है. आगे- आगे देखिये होता है क्या!

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