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किछौछा शरीफ दरगाह : नहीं होता कोई झाड़-फूंक


एस एन श्याम
22 जून 2026
Lucknow : उसी हजरत मखदूम अशरफ जहांगीर सिमनानी का यह दरगाह (Dargah) रूहानी इलाज का मरकज है. कहा जाता है कि उन्होंने ही इस जगह से पूरे विश्व में सूफीवाद (sufiwad) फैलाया. ऐसी धारणा है कि कोई भी व्यक्ति, जो रूहानी मरीज हो या शैतानी साया का शिकार हो, इस मरकज पर आने पर पूर्ण स्वस्थ हो जाता है. गौर करने वाली बात यह भी कि इस दरगाह पर औरतों का प्रवेश वर्जित है. मजार (Majar) के पास जा सिर्फ दीदार की इजाजत है. वहां कोई झाड़-फूंक नहीं होता. गंडा-ताबीज आदि नहीं दिये जाते.

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दरगाह के खिदमतगार एवं अम्बेदकर नगर (Ambedkar Nagar)के उर्दू पत्रकार मोहम्मद परवेज (Mohammad Parvez) के अनुसार जब कोई अस्पताल या डाक्टर किसी लाइलाज बीमारी वाले मरीज को जवाब दे देता है या इलाज से इनकार कर देता है तब वैसे लोग भी यहां की दुआ पा स्वस्थ हो जाते हैं. बहुत से मरीज डाक्टर के पास न जा इसी रूहानी अदालत (Ruhani Adalat) में हाजिरी बजा भला-चंगा हो जाते हैं. विज्ञान भले सहमत न हो, मोहम्मद परवेज का दावा है कि वहां कैंसर (Cancer) जैसी प्राणलेवा बीमारी के मरीज भी स्वस्थ हुए हैं. मजार के तीन तरफ तालाब है. इस तालाब को ‘नीर शरीफ’ (Neer Sharif) कहा जाता है. जानकारों की मानें तो इस ‘नीर शरीफ’ में स्नान और दरगाह में मखदूम अशरफ जहांगीर के मजार पर सजदा ही रूहानी इलाज का तरीका है.

दरगाह के नीचे प्रवेश द्वार पर हर वक्त दर्जनों लोग, खासकर महिलाएं बैठी रहती हैं. इसे ही ‘रूहानी अदालत’ कहा जाता है. दरगाह पर जाने की इजाजत नहीं होने की वजह से महिलाएं इस अदालत में ही हाजिरी लगाती हैं. उसी दौरान उनकी बीमारियों एवं शैतानी साया को पकड़कर रूहानी इलाज किया जाता है. इलाज तीन दिन, सात दिन या फिर 41 दिन का होता है. इसका कोई शुल्क नहीं लिया जाता है. दरगाह का अपना ‘ट्रस्ट है, परन्तु उसकी ओर से कोई रसीद नहीं काटी जाती है. खिदमतगार शुल्क अवश्य लेते हैं.

(यह आस्था और विश्वास की बात है. मानना और न मानना आप पर निर्भर है.)

(एस. एन. श्याम बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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