किछौछा शरीफ दरगाह : रूहानी इलाज का मुख्यालय!

एस एन श्याम
18 जून 2026
Lucknow: उत्तरप्रदेश के अकबरपुर जंक्शन (Akbarpur Junction) से लगभग 25 किलोमीटर दूर अम्बेदकर नगर जनपद में बसखारी के निकट है किछौछा. वहीं है हजरत मखदूम अशरफ जहांगीर सिमनानी रहमतुल्लाह (Hazrat Makhdum Ashraf Jahangir Simnani Rahamtulla) का दरगाह. यह दरगाह किसी सम्प्रदाय विशेष का नहीं, बल्कि सर्वधर्मीय आस्था का मरकज (Center of Universal Faith) है. देश के विभिन्न प्रांतों के अलावा विदेशों से भी लोग दुआओं (Prayers) के लिए वहां आते हैं. अपने देश के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिज्ञों के लिए यह विशिष्ट तीर्थस्थल है. जानकारों की मानें, तो ईरान (Iran) के सिमनान प्रदेश के बादशाह थे मखदूम अशरफ जहांगीर. यह प्राचीन राज्य आज भी कस्बे के शक्ल में ईरान की हुकूमत की सीमा में कैस्पियन समुद्र से लगभग एक सौ मील, असफहाव से दो सौ मील और कासाव से डेढ़ सौ मील दूर है.
फकीरी अख्तियार किये रहे
सुल्तान इब्राहिम (Sultan Ibrahim) सिमनान के राजा थे. सुल्ताना बेगम उनकी पत्नी थी. 1387 ई. में मखदूम अशरफ जहांगीर सुल्ताना बेगम (Jahangir Sultana Begum) के गर्भ से पैदा हुए थे. उनका वास्तविक नाम ओहउद्दीन था. इस्लामी प्रथा (Islamic Practice) के अनुसार शिक्षा की तालीम में मखदूम जहांगीर अशरफ 9 वर्ष की उम्र में ही माहिर हो गये. पिता की मृत्यु हो जाने पर 14 वर्ष की उम्र में उन्होंने सिमनान की बादशाहत संभाल ली. यह गौर करने वाली बात है कि बादशाह होकर भी अशरफ जहांगीर फकीरी अख्तियार किये रहे. प्रजा के हर दुख-दर्द का निवारण वह खुद करते थे. उन्होंने 12 साल तक ताजदारी की ही थी कि 27 रमजाबुल मुबारक शवे कद्र को उन्हें ‘ईश्वरीय’ संदेश प्राप्त हुआ-‘अशरफ वक्त आ गया है. तुम हिन्दुस्तान की ओर चल दो. पीर तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं.’

चल दिये हिन्दुस्तान की ओर
यह सुनते ही सुल्तान अशरफ का राज-पाट एवं धन-दौलत से मोह भंग हो गया और उन्होंने बादशाहत का चोला उतार दिया. छोटे भाई सुल्तान मौलाना सैयद मोहम्मद (Sultan Maulana Syed Mohammad) को तख्त-ताज सौंप खुद को मानवता से जोड़ पैदल हिन्दुस्तान की ओर चल दिये. अपने साथ आये 12 हजार सैनिकों एवं साजो-सामान को रास्ते से लौटा दिये. हाथी-घोड़ा, सोना-चांदी सब कुछ रास्ते में सामान्य लोगों को दे दिये. ऐसा माना जाता है कि 30 वर्षों तक विश्व भ्रमण के बाद वह सुल्तान फिरोजशाह के शासनकाल में हिन्दुस्तान आ गये. दिल्ली (Delhi) पहुंचकर वहां कुछ दिन ठहरे, फिर यात्रा पर निकल गये.
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अचंभित रह गये
इतिहास में जिक्र है कि दिल्ली से चलकर बिहार के बिहारशरीफ (Bihar Sharif) होते हुए जब बनारस पहुंचे तो वहां उन्होंने कुछ पंडितों को मूर्ति पूजा करते देखा. अशरफ जहांगीर ने उन पंडितों से कहा-‘भगवान ने मुझे बनाया है, इसलिए मैं उनकी पूजा करता हूं, उनका नाम जपता हूं. तुम लोगों ने जिस मूर्ति को बनाये हो उसकी खुद पूजा कर रहे हो. इस मूर्ति को चाहिये कि ये तुम लोगों की पूजा करे.’ अशरफ जहांगीर की इस टिप्पणी से वे सब क्रोधित हो उठे. तब उन्होंने उस बेजान मूर्ति में जान डालकर उसे घुमाया-फिराया. यह चमत्कार देख सारे पंडित अचंभित रह गये. (…जारी)


