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किछौछा शरीफ दरगाह : रम गये सूफीवाद में

एस एन श्याम
20 जून 2026
Lucknow : मखदूम अशरफ जहांगीर (Makhdum Ashraf Jahangir) जब बनारस (Banaras) से आगे बढ़े तो विंध्याचल (विंध्याचल) से पहले एक विधवा वृद्धा सड़क किनारे विलाप करती दिखी. पास में ही उसके युवा पुत्र का शव पड़ा था. वृद्धा विलाप ने अशरफ जहांगीर को द्रवित कर दिया. उनके पैर वहीं ठिठक गये. वृद्धा ने सामने एक सूफी संत (Sufi saint) को देखा तो यह कहते हुए उनके चरणों से लिपट गयी कि मृतक उसकी इकलौता संतान थी. युवा अवस्था में कदम रखा ही था कि दुर्घटना में उसकी मौत हो गयी. इसकी जिंदगी लौटा दो, बड़ी कृपा होगी.

डेरा डाल दिया

जहांगीर अशरफ (Jahangir Ashraf) ने आसमान की ओर देखा और कहा-‘माई, यह नियती का खेल है. इसकी जितनी उम्र थी उतनी इसने जी ली. इसकी मौत हुई, विधि लिखा था. मालिक का खेल निराला है. मैं कुछ नहीं कर सकता.’ पर, वृद्धा कुछ नहीं मान उनके पांव से लिपटी रहीं. तब अशरफ जहांगीर ने उसी जगह डेरा डाल दिया. ऐसा कहा जाता है कि अशरफ जहांगीर की उम्र 130 वर्ष की थी. उन्होंने अल्लाह का ध्यान लगाया और उनसे कहा-‘मेरी बची हुई उम्र में से 10 वर्ष इसे दे दो.’

उसी समय आकाशवाणी हुई-‘अशरफ, तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी, परन्तु तुम्हारी उम्र नहीं ली जायेगी.’ इस पर जहांगीर अशरफ ने कहा-‘परवरदिगार, फकीर के मुंह से जो निकल गया वह वापस नहीं आ सकता.’ इसके बाद वृद्धा का पुत्र जीवित हो मां के सीने से लिपट गया. दरगाह के इतिहास में ऐसी चर्चा है कि सूफी मत के पैदल प्रचार के क्रम में मखदूम अशरफ जहांगीर पश्चिम बंगाल (West Bengal) के मालदा (Malda) जिला स्थित पांडवा (Pandavas) पहुंचे तो वहां अलाउल हक पंडवी को अपना पीर बना लोगों की खिदमत करने लग गये.

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बताया जाता है कि पैदल भ्रमण के क्रम में अशरफ जहांगीर जब अकबरपुर (Akbarpur) के जंगलों से गुजर रहे थे तो वहां की हरियाली एवं शांत-एकांत वन ने उनके मन को मोह लिया. इसके साथ एक और प्रसंग जुड़ा है कि उस वक्त किछौछा के जंगली इलाके में एक ढोंगी योगी ने डेरा जमा रखा था. वह तंत्र-मंत्र का तो ज्ञाता था, पर इसके दुरुपयोग से औरतों को वश में कर उन्हें हवश का शिकार बनाया करता था. इसकी जानकारी अशरफ जहांगीर को मिली तो उन्होंने उस ढोंगी के तथाकथित आश्रम के आगे अपना तम्बू गाड़ दिया. वहीं से वह सूफीवाद (मानव एवं मानवता की सेवा) में रम गये. इससे उक्त ढोंगी योगी को परेशानी होने लगी.

कहा जाता है कि अशरफ जहांगीर को वहां से भगाने के लिए ढोंगी योगी ने तंत्र-मंत्र का सहारा लिया. पर, उनकी ईश्वरीय भक्ति और सूफीवाद को मिल रहे व्यापक समर्थन के समक्ष उसका तंत्र-मंत्र बेअसर रहा. फिर तो वह अशरफ जहांगीर के शरणागत हो गया. मानवीयता दिखाते हुए उन्होंने उसे प्राणदान दे दिया. हजरत मखदूम अशरफ जहांगीर की मृत्यु 1487 ई. में इस्लामिक महीना मुर्हरम (Muharram) की 28 तारीख को हो गयी. उन्हें किछौछा शरीफ स्थित उनके आस्ताने रसूलपुर दरगाह (Astana-e-Rasulpur Dargah) में दफन कर दिया गया.

कहते हैं कि कमाल पंडित (Kamaal Pandit) उनके सबसे करीबी मित्र थे. उनकी मृत्यु के कुछ ही दिन बाद वह भी उसी गति को प्राप्त हो गये. उनकी समाधि मखदूम अशरफ जहांगीर के आस्ताने के बगल में बनायी गयी, जिसका वजूद अब भी कायम है. यही मित्रता ने इस दरगाह को हिन्दू-मुस्लिम एकता और भाईचारे के तौर पर प्रसिद्धि दे रखी है. मखदूम अशरफ जहांगीर के इंतकाल के बाद आस्ताने की देखभाल का जिम्मा उनके भांजा अब्दुल रज्जाक नुरुल एन (Abdul Razzaq Nurul N) ने संभाल लिया.

(यह आस्था और विश्वास की बात है. मानना और न मानना आप पर निर्भर है.)

(एस. एन. श्याम बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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