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चौंकिये नहीं! संस्कृत में बात करते हैं इन गांवों के लोग

संस्कृत भारती ने 1996 में इन गांवों में संस्कृत सिखाने के लिए शिविर लगाये. भूपेंद्र सिंह के मुताबिक इन गांवों को इसलिए चुना गया था कि वहां पहले से संस्कृत विद्यालय चल रहे थे. वहां पहले शिक्षकों, फिर छात्रों और अंत में आम ग्रामीणों को संस्कृत बोलना सिखाया गया. संस्कृत को हिन्दी माध्यम से नहीं, संस्कृत के माध्यम से पढ़ाया जाने लगा. संस्कृत भारती का प्रयास सफल हुआ. संस्कृत वहां की बोलचाल की भाषा बन गयी.

  • बतियाते हैं बिल्कुल बेहिचक व बेधड़क अंदाज में
  • संस्कृत भाषा बन गयी है दैनिक जीवन का हिस्सा
  • संस्कृत सिखाने के लिए गांवों में लगते हैं शिविर
  • सामान्य लोगों की बोलचाल के भी भाषा है संस्कृत

तापमान लाइव ब्यूरो
28 जून 2026

New Delhi: चौंकिये नहीं, यह हकीकत है. भारतीय संस्कृति (Indian Culture) का मान बढ़ाने वाली हकीकत. भारतीयों के लिए वाकई यह गौरव की बात है कि राजस्थान (Rajasthan) के अजमेर (Ajmer), बूंदी (Bundi) और बांसवाड़ा (Banswara) में अनेक ऐसे गांव हैं जहां लोग किसी अन्य भाषा में नहीं, हमेशा संस्कृत (Sanskrit) में बात करते हैं. बिल्कुल बेहिचक और बेधड़क अंदाज में. उदाहरण के तौर पर क्रेता और विक्रेता के बीच हो रही बातचीत को देखिये: क्रेता-सेबफलस्य मूल्यं किम? फल विक्रेता- एकस्य सेबफलस्य मूल्यं पञ्च रुप्यकाणि. क्रेता- किं स्वल्पं न्यूनं कर्तुं शक्नोति? फल विक्रेता- आम, भवतकृते चत्वारि रुप्यकाणि भविष्यन्ति. यह उदाहरण अजमेर जिले के सावर गांव का है. आठ हजार की आबादी वाले इस गांव के तकरीबन चार हजार आठ सौ ग्रामीण ऐसे ही संस्कृत में बातचीत (Conversation in Sanskrit) करते हैं.

दैनिक जीवन का हिस्सा

हाल फिलहाल मीडिया में जो बातें आयी हैं उसके मुताबिक बूंदी जिले के कापरेन गांव के चौदह हजार और बांसवाड़ा जिले के गनोड़ा गांव के सभी सात हजार लोग आपस में संस्कृत में ही बातचीत करते हैं. एक तरह से कहें तो इन तीनो गांवों में संस्कृत भाषा धीरे-धीरे दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुकी है. वहां बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सब संस्कृत बोलते हैं. लेकिन, यह सब एक दिन में नहीं हुआ है. संस्कृत भारती (Sanskrit Bharti) नाम की संस्था 1996 से वहां के लोगों संस्कृत सीखा और पढ़ा रही है. महत्वपूर्ण बात यह कि गांव के लोग भी इयमें रुचि ले रहे हैं.

ऐसे सिखाया बोलना

संस्कृत भारती के चित्तौड़ प्रांत के कार्यालय प्रमुख भूपेंद्र सिंह ने वहां के मीडिया को जो जानकारी दी उसके अनुसार गनोड़ा के शत प्रतिशत ग्रामीण संस्कृत बोलते हैं. कापरेन में करीब 70 प्रतिशत और सावर में 60 प्रतिशत लोग संस्कृत बोलते हैं. संस्कृत भारती ने 1996 में इन गांवों में संस्कृत सिखाने के लिए शिविर (Camp) लगाये. भूपेंद्र सिंह के मुताबिक इन गांवों को इसलिए चुना गया था कि वहां पहले से संस्कृत विद्यालय (Sanskrit School) चल रहे थे. वहां पहले शिक्षकों, फिर छात्रों और अंत में आम ग्रामीणों को संस्कृत बोलना सिखाया गया. संस्कृत को हिन्दी (Hindi) माध्यम से नहीं, संस्कृत के माध्यम से पढ़ाया जाने लगा. संस्कृत भारती का प्रयास सफल हुआ. संस्कृत वहां की बोलचाल की भाषा बन गयी.

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कर्नाटक व मध्यप्रदेश में भी

संस्कृत भारती के शिक्षण प्रमुख हिम्मत सिंह चौहान (Himmat Singh Chauhan) की मानें तो राजस्थान के इन तीनो गांवों से पहले से कर्नाटक (Karnataka) के शिवमोगा जिले के मत्तूर और मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के राजगढ़ जिले के झीरी गांव के लोग आपस में संस्कृत में ही बातचीत करते हैं. गौर करने वाली बात यह भी है कि इन गांवों में संस्कृत केवल शिक्षित वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि सामान्य कामकाज करने वाले ग्रामीण भी संस्कृत में बातचीत करते हैं. यहां तक कि सफाईकर्मी भी संस्कृत में ही बात करते हैं. मतलब कि गांव की गलियों और मोहल्लों में संस्कृत बोलना आम है.

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