धर्म-कर्म : क्या होता है सूतक और पातक?
सूतक का संबंध ‘जन्म के’ निमित्त से हुई अशुद्धि से है. जन्म के अवसर पर जो नाल काटा जाता है और जन्म होने की प्रक्रिया में अन्य प्रकार की जो हिंसा होती है, उसमें लगने वाले दोष तथा पाप के प्रायश्चित स्वरुप ‘सूतक’ माना जाता है. पातक का सम्बन्ध ‘मरण के’ निम्मित से हुई अशुद्धि से है. मरण के अवसर पर दाह-संस्कार इत्यादि में जो हिंसा होती है, उसमें लगने वाले दोष तथा पाप के प्रायश्चित स्वरूप ‘पातक’ माना जाता है.
प्रदीप कुमार नायक
28 जून 2026
सनातन धर्म (Sanatan Dharma) के लिए सूतक (Sutak) और पातक (Patak), दोनों विशेष अवधारणाएं हैं जो शुद्धि और अशुद्धि के संदर्भ में माने जाते हैं. विभिन्न धार्मिक (Religious), सामाजिक (Social) और सांस्कृतिक (Cultural) नियमों का पालन करने में ये महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. सूतक: इसका संबंध अशुद्धि की अवधि से है जो किसी विशेष घटना के बाद लगती है. यह मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है: जन्म सूतक: किसी परिवार में बच्चे के जन्म (Childbirth) के बाद लगने वाली अशुद्धि की अवधि को जन्म सूतक (Janm Sutak) कहा जाता है. इसकी अवधि सामान्यतः दस दिनों की होती है. लेकिन, अलग-अलग समुदायों में इसका समय भिन्न हो सकता है. इस अवधि में संबद्ध परिवार के सदस्य कुछ धार्मिक कार्यों से परहेज करते हैं.
बुरे कर्मों के कारण
मृत्यु सूतक : परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु (Death) के बाद लगने वाली अशुद्धि की अवधि को मृत्यु सूतक (Mrityu Sutak) कहा जाता है. यह अवधि सामान्यतः तेरह दिनों की होती है. वैसे, इसके नियम और अवधि भी विभिन्न समुदायों में अलग-अलग हो सकती है. इस अवधि में परिवार के सदस्य धार्मिक और सामाजिक (Religious and Social) कार्यक्रमों में भाग नहीं लेते हैं.
पातक : इसका संबंध पाप या दोष से है, जो किसी अनुचित या अधार्मिक कार्य करने से उत्पन्न होता है. बुरे कर्मों या पाप के कारण होने वाली नैतिक और धार्मिक अशुद्धि, जिससे मुक्त होने के लिए प्रायश्चित करना पड़ता है.
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तब कोई छूता भी नहीं है
सूतक का संबंध ‘जन्म के’ निमित्त से हुई अशुद्धि से है. जन्म के अवसर पर जो नाल काटा जाता है और जन्म होने की प्रक्रिया में अन्य प्रकार की जो हिंसा होती है, उसमें लगने वाले दोष तथा पाप (Faults and Sins) के प्रायश्चित (Atonement) स्वरुप ‘सूतक’ माना जाता है. पातक का सम्बन्ध ‘मरण के’ निम्मित से हुई अशुद्धि से है. मरण के अवसर पर दाह-संस्कार (Cremation) इत्यादि में जो हिंसा होती है, उसमें लगने वाले दोष तथा पाप के प्रायश्चित स्वरूप ‘पातक’ माना जाता है. जिस व्यक्ति या परिवार के घर में सूतक-पातक रहता है, उस व्यक्ति और परिवार के सभी सदस्यों को कोई छूता भी नहीं है. वहां का अन्न-जल भी ग्रहण नहीं करता है. वह परिवार भी मंदिर सहित किसी के घर नहीं जा सकता है और न किसी का भोग, पानी या प्रसाद ग्रहण कर सकता है.
(यह आस्था और विश्वास की बात है. मानना और न मानना आप पर निर्भर है.)
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