किस्सा चुनाव का : समस्तीपुर और राजद… इस कारण उखड़ गया शाहीन का खूंटा!
चुनावी राजनीति के दृष्टिकोण से अनुकूल सामाजिक समीकरण, नये-पुराने तमाम कार्यकर्ताओं का अटूट समर्पण और क्षेत्र के प्रभावशाली परिवारों का अखंड समर्थन, चुनावों में राजद की जीत – दर-जीत का मूलाधार था. इस मूलाधार में कोई ज्यादा उलटफेर नहीं हुआ है, सब कुछ लगभग यथावत है. इसके बाद भी जीत राजद से छिटक गयी है.
मोहिउद्दीननगर में 2020 में ही बुझ गया था ‘लालटेन’
2025 में समस्तीपुर और हसनपुर भी निगल गया हाथ से
उम्मीदवार चयन में खामियां हार का सबसे बड़ा कारण
कभी स्वीकार नहीं करेगा इस हकीकत को राजद नेतृत्व
शिवकुमार राय
03 जुलाई 2026
Samastipur: समस्तीपुर जिले के तीन प्रमुख विधानसभा क्षेत्रों – हसनपुर (Hasanpur), मोहिउद्दीननगर (Mohiuddinnagar) और समस्तीपुर की पहचान ‘माय’ की मजबूती की वजह से राजद के गढ़ की बनी हुई है. आज से नहीं, राजद (RJD) के अस्तित्व में आने से पहले से वहां लालू प्रसाद (Lalu Prasad) के ‘सामाजिक न्याय’ का झंडा बुलंद था. चुनावी राजनीति के दृष्टिकोण से अनुकूल सामाजिक समीकरण, नये-पुराने तमाम कार्यकर्ताओं का अटूट समर्पण और क्षेत्र के प्रभावशाली परिवारों का अखंड समर्थन, चुनावों में राजद की जीत – दर-जीत का मूलाधार था. इस मूलाधार में कोई ज्यादा उलटफेर नहीं हुआ है, सब कुछ लगभग यथावत है. इसके बाद भी जीत राजद से छिटक गयी है.
वहां भी हाथ धोना पड़ गया
मोहिउद्दीननगर विधानसभा क्षेत्र में 2020 में ही ‘लालटेन’ बुझ गया था. इस बार यानी 2025 के विधानसभा चुनाव (2025 Assembly Elections) में मोहिउद्दीननगर के साथ-साथ समस्तीपुर और हसनपुर से भी राजद को हाथ धोना पड़ गया. चुनाव हुए सात- आठ माह हो गये. इन क्षेत्रों में हुई राजद की हार (RJD’s Defeat) पूरे बिहार में चर्चा का विषय बन गयी. ऐसा क्यों हुआ, इस पर दलीय संगठन में कभी कोई गंभीर मंथन नहीं हुआ. न मूल कारणों को खंगाला गया और न पार्टी के अंदर इसे विवेचना का विषय बनाया गया. ‘वोट चोरी’ का शोर मचा बड़ी चालाकी से रणनीतिक विफलता को ढंक दिया गया. राजद के रणनीतिकारों (RJD strategists) का मानना जो रहा हो, सामान्य कार्यकर्ताओं की समझ में उम्मीदवार चयन में खामियां, परिवारवाद को प्रश्रय, निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, अतिआत्मविश्वास और सांगठनिक सूचना – तंत्र की चरमराहट ने राजद की लुटिया डुबो दी.
अति आत्मविश्वास में डूब गयी लुटिया
विश्लेषकों का मानना है कि राजद की चुनावी संभावनाओं को पंचायत के स्तर तक खोखला बना रहीं इन तमाम सांगठनिक विकृतियों की जानकारी या तो सही समय पर राजद अध्यक्ष (RJD President) लालू प्रसाद और राजद के कार्यकारी अध्यक्ष (RJD Working President) तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejashwi Prasad Yadav) तक नहीं पहुंच पायी थी या फिर पहुंची भी तो जीत के अतिआत्मविश्वास (Overconfidence) में उसे नजरंदाज कर दिया गया. दूसरी तरफ एनडीए (NDA) ने क्षेत्रीय समीकरणों को बारीकी से समझा, विकास के कार्यों को मुद्दा बनाया, बूथ-स्तरीय प्रबंधन एवं अनुशासन बनाये रखा और साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपना विजय पताका लहरा दिया. राजनीति के विश्लेषक हैरान हैं कि उस चुनावी दुर्गति के बाद भी राजद में सांगठनिक दुर्बलता (Organizational weakness) को दुरुस्त करने की कोई सार्थक पहल होती नहीं दिख रही है.
तब भी हार गये शाहीन!
उक्त तीनो क्षेत्रों के 2025 के चुनाव परिणाम के गहन विश्लेषण के क्रम में बात पहले समस्तीपुर विधानसभा क्षेत्र (Samastipur Assembly Constituency) की. इस विधानसभा क्षेत्र में राजद समर्थक (RJD Supporter) सामाजिक समूहों के मतदाताओं की संख्या इतनी अधिक है कि उनकी एकजुटता से जीत (Victory through Unity) आसानी से निकल आती है. यादव (Yadav) समाज की बड़ी आबादी है. मुस्लिम (Muslim) मत भी अच्छी संख्या में हैं. दूसरी जातियों के राजद समर्थक पारंपरिक मतदाता भी हैं. इन्हीं सब के समर्थन से अख्तरूल इस्लाम शाहीन (Akhtarul Islam Shaheen) राजद उम्मीदवार के तौर पर निर्वाचित होते थे. 2010, 2015 और 2020 यानी लगातार तीन चुनावों में उनकी शानदार जीत हुई थी. लेकिन, 2025 में वह जदयू प्रत्याशी (JDU Candidate) अश्वमेध देवी (Ashvamedha Devi) से मात खा गये. उनकी हार 13 हजार 875 मतों के अंतर से हुई. अश्वमेध देवी को मिले 95 हजार 728 मतों के मुकाबले अख्तरूल इस्लाम शाहीन को 81 हजार 853 मत ही मिल पाये.
तब भी पिछड़ क्यों गये
यहां गौर करने वाली बात है कि 2020 में भी मुख्य मुकाबला इन्हीं दोनों के बीच हुआ था. बाजी अख्तरूल इस्लाम शाहीन के हाथ लगी थी. इस बार क्या हुआ कि पिछले चुनाव की तुलना में महागठबंधन का राजनीतिक -सामाजिक समीकरण ज्यादा मजबूत रहने के बाद भी वह पिछड़ गये? राजद नेतृत्व इस जमीनी हकीकत को कतई स्वीकार नहीं करेगा कि पार्टी के पुराने समर्पित और अनुभवी कार्यकर्ताओं को नजरंदाज कर अनुभवहीन नये सलाहकारों पर ज्यादा भरोसा करना आत्मघाती साबित हुआ. नये कार्यकर्ताओं को तरजीह मिलने से निराश पुराने कार्यकर्ता निष्क्रिय हो गये. वे न तो प्रचार अभियान में उतरे और न बूथ पर सक्रिय दिखे. इससे बेखबर अख्तरूल इस्लाम शाहीन अति आत्मविश्वास में डूबे रहे. उन्होंने उन मतदान केन्द्रों पर ध्यान देने की जरूरत ही नहीं समझी जहां राजद हमेशा से मजबूत रहा है.
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एनडीए एकजुट रहा
दिलचस्प बात यह कि मतदान के दिन राजद के अधिकतर बूथ एजेंट और पोलिंग एजेंट गायब रहे या निष्क्रिय रहे. दूसरी ओर जदयू के कार्यकर्ता हर बूथ पर मजबूती से तैनात नजर आये. जदयू की उम्मीदवार अश्वमेध देवी ने पूरे क्षेत्र में ‘साम, दाम, दंड और भेद’ की नीति पर पूरी कुशलता से अमल किया. राजद के पारंपरिक बूथों पर उन्होंने विशेष कैंप लगवाये. स्थानीय छोटे-छोटे नेताओं को भी सम्मान दिया. विकास पर भरोसे लायक बातें की. इस तरह उन्होंने महिलाओं, युवाओं और पिछड़े वर्गों को विशेष रूप से प्रभावित किया. जरूरत के हिसाब से दबाव भी बनाया. इसका असर हुआ कि राजद के पारंपरिक मत बिखर गये. सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि एनडीए एकजुट दिखा. उधर, राजद में स्थानीय स्तर पर कोई प्रभावी समीक्षा या फीडबैक तंत्र नहीं था. अख्तरूल इस्लाम शाहीन के पन्द्रह वर्षीय विधायक (MLA) कार्यकाल का क्षोभ -विक्षोभ भी हार का बहुत बड़ा कारण रहा.
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