राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी : अंधेर नगरी में सवालों का उजाला !

राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी का मामला अब सिर्फ एक संस्था का नहीं रहा. यह इस बात का आईना है कि हम सार्वजनिक संपत्ति और सार्वजनिक जिम्मेदारी को कैसे देखते और निभाते हैं. अगर ज्ञान के मंदिर को हम विवाह भवन बनने देंगे, हिसाब मांगने पर चुप रहेंगे, सवाल करने वालों को डरायेंगे, तो फिर ‘विकास’ और ‘जागरूकता’ सिर्फ भाषणों तक सीमित रह जायेंगे.
एक ही कमेटी जमी रही ग्यारह साल तक
चेहरा विकृत हो गया पुस्तकालय परिसर का
न नयी किताबें आती हैं और न पत्र-पत्रिकाएं
‘विवाह भवन’ में बदल गया है ‘ज्ञान का मंदिर’
प्रदीप कुमार नायक
11 जुलाई 2026
Madhubani : ‘अंधेर नगरी, चौपट राजा’ की कहावत तब सच के करीब दिखती है जब सार्वजनिक संस्थाएं अपने उद्देश्य से भटककर कथित रूप से कुछ लोगों की जागीर बन जाती है. मधुबनी जिले के राजनगर (Rajnagar) की पब्लिक लाइब्रेरी (Public Library) आज वैसे ही कुछ हालात में पहुंच गयी है. कभी ज्ञान, अध्ययन और बौद्धिक विकास का केंद्र रही यह संस्था अब विवादों, आरोपों और खामोशियों की दीवारों में कैद -सी हो गयी है. लाइब्रेरी का काम किताबें (Books) देना और सोच को दिशा देना होता है. पर, यहां सदस्यता शुल्क कभी 151 रुपये, कभी 551 रुपये और फिर वापस 151 रुपये कर दिया जाता है. कारण कोई नहीं बताता. ग्यारह साल तक एक ही कमेटी (Committee) कुर्सी पर जमी रही. मार्च 2015 से लेकर 2026 तक का कार्यकाल बताया गया.
गायब रही चुनाव की प्रक्रिया
लोकतंत्र (Democracy) में समय-समय पर बदलाव और नयी भागीदारी से ही संस्था जीवित रहती है. स्थानीय लोगों की मानें, तो इस संस्था में चुनाव (Election) की प्रक्रिया ही गायब रही. ग्यारह साल बाद जब आमसभा हुई तो उसमें भी बड़े बदलाव की जगह सिर्फ अध्यक्ष बदल गया, बाकी अपनी जगह जमे रह गये. इस बदलाव को कुछ लोगों ने ‘ग्यारह साल बेमिसाल’ कहा, तो कुछ ने ‘सत्ता बचाने का खेल’ बताया. इस बीच लाइब्रेरी परिसर का चेहरा जरूर बदल गया. जिस जगह शब्दों की गूंज होनी चाहिये थी, वहां शादी-विवाह के तामझाम होने लगे. देर रात म्यूजिक, स्टेज पर नृत्य और परिसर में ‘प्रतिबंधित मस्ती’ आम बात हो गयी है. बिहार में शराबबंदी कानून लागू है, पर वहां कानून की धज्जियां उड़ती, देखी और सुनी जाती हैं. यही नहीं, आयोजनों के दौरान कम उम्र के बच्चों को बर्तन धोते और झूठन उठाते भी देखा गया. बाल श्रम कानून (Child Labour Laws) साफ कहता है कि 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम लेना अपराध है. पर नियम कागज में और हकीकत मैदान में! दोनों के बीच की दूरी यहां साफ दिखती है.
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कहां जा रहे पैसे?
सबसे बड़ा सवाल पैसों का है. लाइब्रेरी के नाम पर दुकानों का किराया और दूसरे स्रोतों से अच्छी खासी आय आती है. पर, न किताबें नयी आती हैं, न समय पर अखबार-पत्रिका (Newspapers and Magazines) लगते हैं. आमसभा में ग्यारह साल का हिसाब पेश किया गया, पर कई लोगों ने ऑडिट की मांग उठायी. आरोप यहां तक उछले कि किराया वसूला गया पर रजिस्टर में नहीं चढ़ा. सार्वजनिक संस्था में हर आने-जाने वाले पैसे का हिसाब होना चाहिये. हिसाब न हो तो विश्वास टूटता है और शक गहराता है. इस पूरे प्रकरण में सबसे तकलीफ देने वाली बात समाज की खामोशी है. आमसभा के मंच पर लोग चुप रहते हैं और बाहर चर्चा करते हैं. संस्थाओं के पदाधिकारी अपनी सफाई देने के बजाय सवाल पूछने वाले को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं. प्रशासन की ओर से भी अब तक कोई स्पष्ट कदम नहीं उठा है. सोसाइटी एक्ट के तहत पंजीकृत संस्था के नियमों का पालन हो रहा है या नहीं, इसकी भी जांच जरूरी है.
जरूरत पहचान दिलाने की
वैसे, राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी का मामला अब सिर्फ एक संस्था का नहीं रहा. यह इस बात का आईना है कि हम सार्वजनिक संपत्ति और सार्वजनिक जिम्मेदारी को कैसे देखते और निभाते हैं. अगर ज्ञान के मंदिर (Temples of Knowledge) को हम विवाह भवन (Marriage Hall) बनने देंगे, हिसाब मांगने पर चुप रहेंगे, सवाल करने वालों को डरायेंगे, तो फिर ‘विकास’ और ‘जागरूकता’ सिर्फ भाषणों तक सीमित रह जायेंगे. जरूरत है कि इस लाइब्रेरी को फिर से उसकी पहचान दिलायी जाये. इसके लिए जरूरी है कि जल्द से जल्द निष्पक्ष चुनाव हो, ग्यारह सालों के आय-व्यय का स्वतंत्र ऑडिट हो, परिसर का उपयोग सिर्फ शैक्षणिक और सांस्कृतिक कार्यों के लिए तय हो और कानून का पालन सख्ती से हो.
समाज को भी आगे आना होगा
साथ ही समाज को भी आगे आना होगा. चुप्पी तोड़नी होगी. क्योंकि लोकतंत्र (Democracy) तभी जिंदा रहता है जब जनता सवाल पूछती है और जवाब मांगती है. आखिर में एक ही बात बचती है. संस्थाएं व्यक्ति से बड़ी होती हैं. पर जब व्यक्ति संस्थाओं पर हावी हो जाये तो अंधेरा बढ़ता है. इस अंधेरे में उजाला सिर्फ पारदर्शिता, जवाबदेही और साहस से ही आ सकता है. राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी को वर्तमान में उसी उजाले की जरूरत है.

प्रदीप कुमार नायक स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार हैं.
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