कामरूप कामख्या : यहीं फूटी थी सती और शिव में प्यार की कोंपले

राजकिशोर सिंह
18 जून 202
Guwahati : कामरूप कामाख्या… को नहीं जानत है जग में… महिमा संपूर्ण भारत वर्ष (Bharat Varsh) में फैली हुई है. इस पवित्र स्थल को सनातन धर्म (Sanatan Dharma) के सभी 51 शक्तिपीठों (Shaktipeeths) में महापीठ (Mahapeetha) की मान्यता मिली हुई है. कामरूप कामख्या असम (Assam) की राजधानी दिसपुर (Dispur) यानी गुवाहाटी से तकरीबन दस किलोमीटर दूर कामागिरी (kamagiri) , जिसे नीलाचल (Neelachal) और नीलशैल (Neelashail) पर्वतमाला भी कहते हैं, पर स्थित है. इसे अलौकिक शक्तियों और तंत्र सिद्धि का प्रमुख स्थल माना गया है. यहीं कामख्या मंदिर (Kamakhya Temple) में भगवती की महामुद्रा यानी योनि कुण्ड स्थित है. ऐसा कहा जाता है कि यहां देवी सती (Devi Sati) का गर्भ और योनि भाग गिरा था.
शुरुआत सती की कथा से
कामरूप कामख्या से संबंधित कई अनसुलझे रहस्य हैं. उन रहस्यों पर चर्चा की शुरुआत सती की कथा से करते हैं. सती के पिता दक्ष प्रजापति (Daksh Prajapati) ने सती और उनके पति भगवान शंकर (Lord Shankar) को अपने महायज्ञ (Mahayagya) में शामिल न कर अपमानित किया और उन्हें अपशब्द कहे. पिता के व्यवहार से दुखी सती ने उसी महायज्ञ के हवन कुंड (Havan kund) में कूद अपने प्राण त्याग दिये. इससे क्रोधित भगवान शिव ने उनकी मृत देह को कंधे पर उठा संहारक नृत्य अर्थात तांडव शुरू कर दिया. साथ ही पूरी धरा को नष्ट कर देने की चेतावनी दे डाली. तब भगवान विष्णु (Lord Vishnu) ने देवी सती के प्रति शिव का मोह तोड़ने के लिए मृत शरीर को सुदर्शन चक्र (Sudarshan Chakra) से 51 टुकड़े कर दिये. शरीर का अलग-अलग हिस्सा पृथ्वी पर अलग- अलग जगह गिरा.
यहीं हुई थी प्रेम की शुरुआत
कामागिरी में सती का गर्भ व योनि भाग गिरा. उसी स्थल पर चिला राय (chilla rai) ने कामाख्या मंदिर का निर्माण किया. तांत्रिकों की देवी कामाख्या की पूजा भगवान शिव की नववधू के रूप में की जाती है, जो मुक्ति को स्वीकार करती है और सभी इच्छाएं पूर्ण करती हैं. धर्मग्रंथों में उल्लेख है कि देवी सती और भगवान शिव के बीच प्रेम की शुरूआत यहीं हुई थी. इसलिए इसका नाम कामाख्या रखा गया. काली और त्रिपुर सुंदरी देवी के बाद कामाख्या माता तांत्रिकों की सबसे महत्वपूर्ण देवी हैं. कामाख्या मंदिर के गर्भगृह में कोई प्रतिमा अथवा तस्वीर नहीं है. एक समतल चट्टान के बीच बना विभाजन देवी की योनि को दर्शाता है. इसी को विग्रह की मान्यता मिली हुई है.
गजब का उत्सवी माहौल
महिला योनि को जीवन का प्रवेश द्वार माना जाता है. यही कारण है कि मां कामाख्या (Maa kaamaakhya) को समस्त निर्माण का केन्द्र माना गया है. प्राकृतिक झरने के कारण यह जगह हमेशा गीला रहता है. सतयुगीन तीर्थ मां भगवती कामाख्या के सिद्ध शक्तिपीठ में तीन दिनों के दौरान गजब का उत्सवी माहौल रहा करता है. अवसर मां कामेश्वरी यानी सती और भगवान कामेश्वर महाराज यानी शिव के भव्य विवाह का होता है. असमिया रीति- रिवाज से इस प्रतीकात्मक विवाह का आयोजन हर साल हुआ करता है. पूस कृष्ण पक्ष की द्वितीया और तृतीया तिथि को.

सब कुछ होते हैं शादी में
इस प्रतीकात्मक शादी में वह सब कुछ भी होता है जो आम शादियों में हुआ करता है. रस्मों की शुरुआत अधिवास से होती है. कामाख्या मंदिर से अष्टधातु से बने शलंग रूप में भगवान कामेश्वर को सजी-सजायी पालकी में बैठा कामेश्वर मंदिर ले जाया जाता है, दूसरे दिन बारात निकलती है. बारात के साथ दूल्हा की पालकी को मां कामाख्या देवी के मुख्य मंदिर तक ले जाया जाता है. फिर, पूरे रीति-रिवाज से मनसा देवी (Mansa Devi) के सामने शादी की रस्म निभायी जाती है. नाश्ता-पानी, भोज-भात, हंसी- ठिटोली, हल्दी लगाने के साथ-साथ नये कपड़ों एवं उपहारों के आदान-प्रदान के अलावा गीत-नाद आदि सब कुछ होते हैं.
शादी के दिन वलि नहीं
दुल्हन के पिता की भूमिका हर साल अलग-अलग पंडित निभाया करते हैं. वर पक्ष से पिता की जिम्मेवारी कामेश्वर मंदिर के बड़पुजारी जिसे बड़देवरी भी कहते हैं, निभाया करते हैं. दुल्हन की मां की भूमिका मां कामाख्या के भोग के लिए रोज बकरे की बलि देने वाला व्यक्ति ही साड़ी पहन स्त्री का रूप धारण कर निभाता है. शादी समारोह के दिन बलि नहीं चढ़ायी जाती है. उस दिन भगवती को शाकाहारी भोग लगाया जाता है. शेष दिन मछली और बकरे के मांस का भोग चढ़ता है.
पोहान कहा जाता है इस आयोजन को
बलि भैंसे की भी चढ़ायी जाती है, पर भोग का वह हिस्सा नहीं बनता है. उसे आस-पड़ोस में प्रसाद स्वरूप वितरित कर दिया जाता है. यहां मादा पशु की बलि हरगिज नहीं चढ़ायी जाती है. प्रतीकात्मक शादी के इस तीन दिवसीय पौराणिक वार्षिक धार्मिक आयोजन को स्थानीय स्तर पर पोहान बिया कहते हैं. इस आयोजन में मुख्य सहभागिता मंदिर के पंडित-पुजारी और उनके परिजनों की ही हुआ करती है, पर बाहरी सहयोग स्थानीय लोगों का भी रहा करता है.
(यह आस्था और विश्वास की बात है. मानना और न मानना आप पर निर्भर है.)
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