कामरूप कामख्या : लगता है यहां तांत्रिकों व अघोरियों का मेला

राजकिशोर सिंह
20 जून 2025
Guwahati : अनसुलझे रहस्यों से भरा कामरूप कामाख्या मंदिर (Kamakhya Temple) सर्वाधिक पुराना शक्तिपीठ (Shaktipeeth) है. इसे कामरूप कामाख्या सिद्धपीठ के रूप में भी जाना जाता है. यहां मां कामाख्या (Maa kamaakhya) की रोजाना पूजा के अलावा पोहान बिया (Pohan Biya) की तरह साल में कई बार विशेष पूजा का भी आयोजन होता है. उनमें दुर्गा पूजा, बसंती पूजा, दुर्गादेऊल पूजा, मदानदेऊल पूजा, अम्बूवाची और मनसा पूजा प्रमुख हैं. मंदिर (Temple) में प्रति वर्ष जून माह में तीन दिवसीय अम्बूवाची पूजा (ambuvachi puja) का आयोजन किया जाता है. इसमें देशभर के तांत्रिक (Tantrik) और अघोरी (Aghori) हिस्सा लेते हैं, उनका मेला लगता है. इस वर्ष यह मेला 22 जून से लगेगा.
बहते हुए खून की देवी
ऐसी मान्यता है कि ‘अम्बूवाची पर्व’ के दौरान मां कामाख्या रजस्वला होती हैं और योनि कुंड से जल प्रवाह की जगह रक्त प्रवाह होता है. इस वजह से मां कामाख्या को बहते हुए खून की देवी भी कहा जाता है. कलिकाल में इसे अद्भुत माना जा रहा है. कामाख्या तंत्र में कहा गया है:
योनि मात्र शरीराय कुंजवासिनि कामदा ।
रजोस्वला महातेजा कामाक्षी ध्येताम सदा ।।
रजस्वला यानी मासिक धर्म को अपने देश में अशुद्ध माना जाता है. इस प्रक्रिया से गुजरने वाली लड़कियों को आमतौर पर उस दौरान ‘अछूत’ समझा जाता है. पर, मां कामाख्या के मामले में ऐसा नहीं है.
खुद बंद हो जाते हैं गर्भगृह के कपाट
उक्त अवधि में मंदिर का कपाट बंद रहता है. चौथे दिन खुलता है तो विशेष पूजा-अर्चना एवं साधना की जाती है. अम्बूवाची मेले (Ambuvachi Fair) को कामरूपों का कुंभ भी कहा जाता है. ‘राज राजेश्वरी कामाख्या रहस्य’ एवं ‘दस महाविद्याओं’ नामक ग्रंथ के रचयिता एवं मां कामाख्या के अनन्य भक्त ज्योतिष एवं वास्तु विशेषज्ञ डा. दिवाकर शर्मा (Dr. Diwakar Sharma) के मुताबिक अम्बूबाची योग पर्व के दौरान मां भगवती के गर्भगृह के कपाट स्वतः बंद हो जाते हैं और उनका दर्शन भी निषेध हो जाता है. इसकी महत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस पर्व में तंत्र-मंत्र-यंत्र साधना तथा सभी प्रकार की सिद्धियां एवं मंत्रों के पुरश्चरण हेतु पूरे विश्व के उच्च कोटि के तांत्रिकों-मांत्रिकों, अघोरियों का बड़ा जमघट लगा रहता है.

बड़ा महत्व है अम्बूवाची का
जिस प्रकार उत्तर भारत (North India) में कुंभ (kumbh) महापर्व का महत्व है, ठीक उसी प्रकार या उससे भी कहीं अधिक इस आद्य शक्ति के अम्बूवाची पर्व का महत्व है. समस्त तांत्रिकों (tantrics), मांत्रिकों (Mantrikon) एवं सिद्ध पुरुषों (Siddh Purushon) के लिए यह योग पर्व वरदान के समान है. इसके अन्तर्गत विभिन्न प्रकार की दिव्य अलौकिक शक्तियों का अर्जन तंत्र-मंत्र में सिद्ध साधक अपनी-अपनी मंत्र शक्तियों को पुरश्चरण अनुष्ठान कर स्थिर रखते हैं. इस पर्व में मां भगवती के रजस्वला होने से पूर्व गर्भगृह स्थित महामुद्रा पर सफेद वस्त्र चढ़ाये जाते हैं, जो उक्त अवधि में रक्तवर्ण हो जाते हैं. ऐसा कहा जाता है, यह अनसुलझा रहस्य है.
प्रसाद होते हैं अम्बूवाची वस्त्र के टुकड़े
मंदिर के पुजारियों द्वारा ये वस्त्र, जिसे अम्बूवाची वस्त्र (Ambuvachi Clothing) कहते हैं, इसके टुकड़े प्रसाद के रूप में श्रद्धालु भक्तों में विशेष रूप से वितरित किये जाते हैं. इस अम्बूवाची प्रसाद को अंगोदक और अंगवस्त्र कहा जाता है. कहा जाता है कि जिन्हें यह प्रसाद मिलता है, उनके तमाम कष्ट दूर हो जाते हैं. अंगोदक का इस्तेमाल तांत्रिक साधनाओं और उपायों में किया जाता है. मान्यता यह भी है कि जो कोई तीन बार कामरूप कामख्या मंदिर का दर्शन कर लेता है उसे भववंधन से मुक्ति मिल जाती है. हालांकि, इसका कोई पौराणिक या ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, पर कहा जाता है कि उक्त अवधि में ब्रह्मपुत्र नदी (Brahmaputra River) का पानी लाल हो जाया करता है.
आते हैं विदेशों से भी तंत्र साधक
वैसे, कुछ लोगों का यह भी मानना है कि उस दौरान मंदिर के पुजारी नदी में सिन्दूर डाल देते हैं जिससे पानी लाल दिखने लगता है. जो हो, इस अवसर पर भारत (India) ही नहीं बल्कि बंगलादेश (Bangladesh) , तिब्बत (Tibbat) और अफ्रीका (Africa) जैसे देशों के तंत्र साधक भी यहां आकर अपनी साधना के सर्वाेच्च शिखर को प्राप्त करते हैं. पौराणिक धर्मग्रंथों के अनुसार सतयुग में यह पर्व 16 वर्ष, द्वापर में 12 वर्ष तथा त्रेता युग में 7 वर्ष में एक बार आयोजित हुआ करता था. कलिकाल में हर साल जून माह में तिथि के मुताबिक मनाया जाता है. वाममार्ग साधना का यह सर्वाेच्च पीठ है. मछन्दरनाथ (Machhindranath) , गोरखनाथ (Gorakhnath) , लोना चमारी (Lona Chamari) , ईस्माइल जोगी (Ismail Jogi) इत्यादि तंत्र साधक भी सांवर तंत्र में यहीं स्थान बनाकर अमर हुए हैं.
(यह आस्था और विश्वास की बात है. मानना और न मानना आप पर निर्भर है.)
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