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कामरूप कामाख्या : सनातन का सर्वोच्च कौमारी तीर्थ

राजकिशोर सिंह
22 जून 2025
Guwahati : कामरूप कामाख्या (Kamaroop Kamaakhya) में हर साल जून माह में लगने वाले अम्बूवासी (Amboovasee) या अम्बूवाची मेला (Ambuvachi Fair) को अमेली और तांत्रिक जनन क्षमता के पर्व के रूप में भी जाना जाता है. अम्बुबाची शब्द की उत्पत्ति ’अम्बु’ और ’बाची’ शब्द से हुई है. अम्बु का अर्थ होता है पानी जबकि बाची का अर्थ होता है उत्फुल्लन, यह पर्व स्त्री शक्ति और उसकी जनन क्षमता को गौरवान्वित करता है. सामान्य समझ है कि तंत्र विद्या और काली शक्तियों का समय अब गुजर चुका है. लेकिन, कामाख्या (Kamakhya) में आज भी यह जीवनशैली का हिस्सा है. अम्बुबाची मेला के दौरान इसे आसानी से देखा और समझा जा सकता है.

तंत्र शक्ति का महत्वपूर्ण आधार

इस अवधि को शक्ति तांत्रिक की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. शक्ति तांत्रिक (Shakti Tantrik) ऐसे समय में एकांतवास से बाहर आते हैं और अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हैं. वे लोगों को वरदान अर्पित करने के साथ-साथ जरूरतमंदों की मदद भी करते हैं. कामाख्या मंदिर (Kamakhya Temple) के आसपास कई तांत्रिक मंत्र पाये गये हैं जिससे स्पष्ट है कि वहां इसका महत्वपूर्ण आधार है. ऐसा माना जाता है कि अधिकांश कोल तांत्रिक की उत्पत्ति कामापुरा (kamapura) में हुई है. सामान्य धारणा है कि कोई भी व्यक्ति तब तक पूर्ण तांत्रिक नहीं बन सकता जब तक कि यह कामाख्या देवी (Kamakhya Devi) के सामने माथा न टेके.

मंदिरों का परिसर

ऐसा कहा जाता है कि कामाख्या के तांत्रिक और साधु चमत्कार करने में सक्षम होते हैं. कई लोग विवाह, बच्चे, धन और दूसरी इच्छाओं की पूर्ति के लिए कामाख्या तीर्थ पर आते हैं. यहां के तांत्रिक बुरी शक्तियों को दूर करने में भी समर्थ होते हैं. हालांकि, वह अपनी शक्तियों का इस्तेमाल काफी सोच-विचार कर करते हैं. यहां का मुख्य मंदिर जो मां कामाख्या को समर्पित है, वहीं मंदिरों का एक परिसर भी है जो दस महाविद्याओं को समर्पित है. ये महाविद्या है- मातंगी, कामाला, भैरवी, काली, धूमावति,त्रिपुर सुंदरी,तारा,बगलामुखी, छिन्नमस्ता और भुवनेश्वरी, इससे यह स्थान तंत्र विद्या और काला जादू के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है.

महाभैरव उमानंद

ऐसी मान्यता है कि यह स्थान प्राचीन खासी था जहां वलि दी जाती थी. इस परिसर में पांच मंदिर शिव (shiv) के और तीन भगवान विष्णु (Lord Vishnu) के हैं. कामाख्या मंदिर एक ऐसी जगह है जहां अंधविश्वास और वास्तविकता के बीच की पतली लकीर अपना वजूद खो देती है. यानी यहां जादू, आस्था और अंधविश्वास का अस्तित्व एक साथ देखने को मिलता है. कामाख्या के शोधार्थी एवं प्राच्य विद्या विशेषज्ञ डा. दिवाकर शर्मा (Dr. Diwakar Sharma) के मुताबिक आद्य शक्ति महाभैरवी मां कामाख्या के दर्शन से पूर्व महाभैरव उमानंद, जो कि गुवाहाटी शहर के निकट ब्रह्मपुत्र नदी (Brahmaputra River) के मध्य भाग में टापू के ऊपर स्थित है, का दर्शन करना आवश्यक है. यह एक प्राकृतिक शैलद्वीप है, जो तंत्र का सर्वाेच्च सिद्ध सती का शक्तिपीठ (Shaktipeeth) है.

सदा विराजमान हैं कामाख्या

इस टापू को मध्यांचल पर्वत (Madhyanchal Mountains) के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यहीं पर समाधिस्थ सदाशिव (Sadashiv) को कामदेव ने काम वाले वाण मारकर आहत किया था और समाधि से जाग्रत होने पर सदाशिव ने उसे भस्म कर दिया था. भगवती के महातीर्थ नीलांचल पर्वत (Nilanchal Mountain) पर ही कामदेव (Kamadev) को पुनः जीवनदान मिला था. इसलिए यह क्षेत्र कामरूप के नाम से भी जाना जाता है. सती स्वरूपिणी कामाख्या तीर्थ को विश्व का सर्वाेच्च कौमारी तीर्थ भी माना जाता है. इस कारण यहां कौमारी-पूजा (kaumaree-Pooja) के अनुष्ठान का भी काफी महत्व है. यहां आद्य शक्ति कामाख्या कौमारी रूप में सदा विराजमान हैं. क्षेत्र की सभी जातियों की कौमारियां वंदनीय हैं, पूजनीय हैं. उनमें वर्ण-जाति का भेद करने पर साधक की सिद्धियां नष्ट हो जाती हैं.

(यह आस्था और विश्वास की बात है. मानना और न मानना आप पर निर्भर है.)

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