पूर्णिया : डायन- बिसाही… भेंट चढ़ गया पूरा परिवार

अशोक कुमार
09 जुलाई 2025
Purnia : पूर्णिया के टेटगामा (Tategama) गांव की राजीगंज उरांव (Rajiganj Oraon) बस्ती में उस रात हुई हैवानियत से मानवता कराह उठी. वह अंधविश्वास और अज्ञानता की पराकाष्ठा ही थी कि दानव बन गये गांव- घर के अपनों ने ही डायन होने के संदेह में एक ही परिवार के पांच बेकसूरों को मौत के मुंह में झोंक दिया. पहले बड़ी बेरहमी से पिटाई की और फिर सभी को जिन्दा जला दिया. इनमें तीन महिलाएं और दो पुरुष थे. पत्थर दिल को भी दहला देने वाली यह क्रूरता दूसरे किसी की नहीं, बस्ती के ही लोगों की थी. बजाब्ते पंचायत बैठा हृदय विदारक घटना को अंजाम दिया गया.
तब भी भनक नहीं लगी
आततायियों की अगुवाई कथित रूप से गांव के ‘मर्रर’ नकुल उरांव ने की. आदिवासी (Adivaasi ) बहुल टेटगामा गांव मुफस्सिल थाना क्षेत्र रानीपतरा (Ranipatra) में है. हैरान करने वाली बात यह कि गांव में नृशंसता का वीभत्स खेल पूरी रात चलता रहा. पंचायती के क्रम में पांच लोगों की बेखौफ सामूहिक पिटाई और पेट्रोल (petrol) छिड़क जिन्दा जला देने की जघन्यता…फिर लाशों को ठिकाना लगाने का काम. कहते हैं कि इसमें ट्रैक्टर (Tractor) और जेसीबी (JCB) तक का इस्तेमाल हुआ. तब भी पुलिस को भनक नहीं लगी.
संदेह डायन होने का
पूर्णिया के प्रमंडलीय आयुक्त (Divisional Commissioner) राजेश कुमार (Rajesh Kumar) की चिंता वाजिब है कि गांव में पंचायत सचिव, आंगनबाड़ी सेविका, एएनएम आदि रहती हैं, इसके बाद भी समय पर पुलिस को सूचना नहीं मिल पायी. पुलिस के मुताबिक मुख्य आरोपित रामदेव उरांव के आग्रह पर पंचायत बैठी थी. रामदेव उरांव को संदेह था कि उरांव टोला की 75 वर्षीया मसोमात कातो देवी और उसकी 50 वर्षीया पतोहू सीता देवी डायन थी. जादू- टोना करती थी. रामदेव उरांव के पुत्र की मृत्यु उसी के तंत्र-मंत्र की वजह से हो गयी थी. उसी तंत्र – मंत्र की वजह से भगीना बीमार है. स्वस्थ हो ही नहीं रहा है.

अपनों की उग्र भीड़
रामदेव उरांव के इस अंधविश्वास (Andhavishvas) को गांव में ओझई करने वाले नकुल उरांव का समर्थन मिला और 06 जुलाई 2025 की रात में पंचायत (Panchayat) बुला ली गयी. गांव के ही कुछ लोगों का कहना रहा कि पंचायत में डायन होने के आरोप पर सफाई देने के लिए बाबूलाल उरांव की पत्नी सीता देवी और मां कातो देवी को भी बुलाया गया था. लेकिन, बाबूलाल उरांव ने मना कर दिया. इसके बाद पंचायत ने तालिबानी (Talibani) फैसला किया और रात 11 बजे के आसपास हैवान हो गये अपनों की भीड़ ने नकुल उरांव और रामदेव उरांव की अगुवाई में बाबूलाल उरांव के घर पर चढ़ाई कर दी.
निर्दयता की पराकाष्ठा
मरने- मारने पर उतारू उग्र भीड़ के साथ नकुल उरांव और रामदेव उरांव ने बीमार बच्चे को ठीक कर देने के लिए कातो देवी और सीता देवी पर दबाव बनाया. असर नहीं पड़ा तब निर्दयता की पराकाष्ठा पार कर बाबूलाल उरांव, उनकी पत्नी सीता देवी, मां कातो देवी, बेटा मंजीत उरांव और बहू रानी देवी को अंधविश्वास की आग में झोंक दिया. सभी की लाशें ट्रैक्टर से ले जाकर गांव से तकरीबन डेढ़ किलोमीटर दूर बहियार में जलकुंभी भरे गड्ढे में छिपा दिया.कहते हैं कि इसमें जेसीबी का भी इस्तेमाल हुआ. गांव के लोगों की मानें तो पुलिस की भूमिका मुख्य रूप से कुत्तों के जरिये लाशें खोजने, उठाने-ढ़ोने और खुद की निगरानी में अंतिम संस्कार करा देने तक सिमटी रही.
कठोर कानून है तब भी…
वैसे, इस क्रम में उसने तीन लोगों को गिरफ्तार किया. उनमें गांव का ‘मर्रर’ नकुल उरांव, ट्रैक्टर चालक सनाउल्लाह और संभवतः उसका मालिक शामिल है. यहां गौर करने वाली बात है कि बिहार (Bihar) में डायन प्रताड़ना निवारण अधिनियम 1999 लागू है. इस अधिनियम के तहत किसी महिला को डायन बता प्रताड़ित करना, अपमानित करना या हत्या कर देना गंभीर अपराध है. इसके बाद भी राज्य में सामाजिक अभिशाप के रूप में डायन आधारित अंधविश्वास की जड़ें 21 वीं सदी में भी गहराई तक जमी हुई हैं. पूर्णिया के टेटगामा गांव की सामूहिक हिंसा इसका ज्वलंत उदाहरण है.
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