चुनाव बहिष्कार : महागठबंधन का निर्णय हुआ तब?

शिवकुमार राय
28 जुलाई 2025
PATNA : संभावना तनिक भी नहीं है, तब भी राजद (RJD) के अघोषित सुप्रीमो तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejaswi Prasad Yadav) की बात में आकर महागठबंधन (Mahagathbandhan) बहिष्कार का ऐलान कर देता है, तो क्या बिहार विधानसभा का चुनाव (Bihar Assembly Elections) नहीं हो पायेगा? तेजस्वी प्रसाद यादव द्वारा मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision of Voter List) के विरोध में चुनाव के बहिष्कार पर विचार की बात किये जाने के बाद राजनीति के गलियारों से लेकर चौक-चौराहों और चौपालों तक में यह सवाल खासे चर्चा में है. यह कि विशेष गहन पुनरीक्षण में तकरीबन 55 लाख लोगों को मताधिकार से वंचित कर दिये जाने को मुद्दा बना महागठबंधन के घटक दल चुनाव का बहिष्कार कर देते हैं तो उस स्थिति में क्या होगा? पूर्व में कहीं ऐसा हुआ था तो फलाफल क्या निकला था? सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इस संदर्भ में कानून क्या कहता है?

एक-दो राज्यों में ऐसा हुआ है
वैसे, कानून अपनी जगह है. किसी राज्य में सभी मुख्य विपक्षी दल (Main Opposition party) चुनाव का बहिष्कार कर दें, तो लोकतंत्र (Democracy) और संवैधानिक व्यवस्था (Constitutional System) के समक्ष विकट स्थिति पैदा हो जा सकती है. पूर्व में एक-दो राज्यों में ऐसा हुआ भी है. जहां तक उस स्थिति में चुनाव होने या नहीं होने की बात है, तो संविधान ने इस पर निर्णय लेने का संपूर्ण अधिकार निर्वाचन आयोग (Election Commission) को दे रखा है. संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को चुनाव कराने, उसकी प्रक्रिया तय करने और उसे नियंत्रित-संचालित करने का अधिकार देता है. उसके इस अधिकार पर कोई रोक नहीं लगा सकता. निर्वाचन आयोग को ही तय करना होता है कि चुनाव निष्पक्ष हो. समय पर चुनाव कराना उसका दायित्व है. चुनाव में कोई दल हिस्सा ले या नहीं, इससे उसको कोई मतलब नहीं. केवल सत्तारूढ़ दल के ही उम्मीदवार मैदान में हों तब भी उसे चुनाव कराना ही है.

बहिष्कार से चुनाव को मतलब नहीं
प्रक्रिया शुरू हो जाने पर चुनाव रद्द करने या रोकने का संविधान में कोई प्रावधान नहीं है. असाधारण परिस्थितियों जैसे हिंसा या प्राकृतिक आपदा के वक्त ऐसा हो सकता है. इससे स्पष्ट हो जाता है कि बिहार में मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण के मुद्दे को लेकर महागठबंधन यदि बहिष्कार करता है तब भी चुनाव होगा. 1989 में मिजोरम और 1999 में जम्मू-कश्मीर में ऐसा हो चुका है. मिजोरम का मामला सर्वाेच्च अदालत में गया था. बताते हैं कि सर्वाेच्च अदालत ने साफ कह दिया था कि बहिष्कार से चुनाव रद्द नहीं होता, बशर्ते प्रक्रिया वैध हो.
खटखटा सकता है अदालत का दरवाजा
सर्वाेच्च अदालत (Supreme Court) ने पीपुल यूनियिन फॉर सिविल लिबर्टी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले की सुनवाई के दौरान यह अवश्य कहा था कि चुनाव में भागीदारी और प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र का आधार है. लेकिन, इसके साथ यह भी स्पष्ट कर दिया था कि निर्वाचन आयोग को चुनाव कैसे आयोजित हो, यह तय करने का अधिकार है. किसी के बहिष्कार करने से चुनाव की प्रक्रिया रद्द नहीं होती. संवैधानिक मानकों के उल्लंघन पर ही चुनाव रुक सकता है. इसके बावजूद बिहार में चुनाव बहिष्कार (Election boycott in Bihar) का निर्णय होता है तब मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण के मुद्दे को लेकर महागठबंधन पारदर्शिता और प्रतिनिधित्व को आधार बना चुनाव रोकवाने के लिए सर्वाेच्च अदालत की शरण में जा सकता है.
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