विधानसभा चुनाव : दिखेगा दम इन दलों का भी

शिवकुमार राय
01 अगस्त 2025
PATNA : नयी-पुरानी कई पार्टियों के ताल ठोकने से चुनावी परिदृश्य (Election scenario) इस बार भी दिलचस्प नजर आयेगा. पर, मुकाबले का स्वरूप उससे कुछ भिन्न होगा. नये-नये अस्तित्व में आये राजनीतिक दलों की सक्रियता से दोनों मुख्य गठबंधनों-एनडीए (NDA) और महागठबंधन (Mahagathbandhan) के आधार मतों में सेंध लगती महसूस होगी, पर परिणाम प्रायः अप्रभावित ही रहेगा. प्रशांत किशोर (Prashant Kishore) की जनसुराज पार्टी (Jansuraj Party) का असर कुछ दिख जाये तो वह अलग बात होगी. ई. आई पी गुप्ता (Er. I. P. Gupta) की भारतीय इंकलाब पार्टी (Indian Inquilab Party), पूर्व आईपीएस अधिकारी शिवदीप लांडे (Shivdeep landay) की हिन्द सेना (Hind Sena), पुष्पम प्रिया चौधरी (Pushpam Priya Choudhary) की द प्लुरल्स पार्टी (The Plurals Party) आदि वजूद तलाशती ही दिखेंगी. ऐसा क्यों?
वह भी होगी बड़ी बात
बिहार की राजनीति (Politics Of Bihar) की गहरी समझ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार महेश कुमार सिन्हा का मानना है कि इन और इसी तरह की अन्य पार्टियों का मुख्य मुद्दा भावनात्मक होता है. ऐसे में कोई कितनी भी ताकत लगा ले, गांधी मैदान (Gandhi Maidan) में बड़ी भीड़ जुटा हालात बदलने का ख्वाब दिखा दे, 2025 के चुनाव में बड़ी कामयाबी की बात दूर, परिणाम का रूख बदलने जैसा हल्का-फुल्का प्रभाव भी दिख जाये तो वह बड़ी बात होगी. वैसे, इन दलों की अपनी विचारधारा, रणनीति और लक्ष्य है. मतदाताओं को प्रभावित करने का तर्क भी है. तदनुरूप सभी प्रयास भी कर रहे हैं.

बैठा रहे जुगाड़
वरिष्ठ पत्रकार रत्नेश्वर झा की समझ में ऐसे दलों की नीतियां, रणनीतियां और दावे जो हों, बिहार में जाति आधारित जो स्थापित राजनीतिक समीकरण हैं, 2025 के चुनाव में भी उसी के अनुरूप मुख्य मुकाबला एनडीए और महागठबंधन के बीच ही होना है. गठबंधनों से बाहर के दलों का जोर उम्मीदवारों के खुद के जनाधार के बूते एक-दो निर्वाचन क्षेत्रों में चल जाये तो वह अलग बात होगी. इसी समझ के तहत कई छोटे-मोटे दल किसी न किसी गठबंधन का हिस्सा बनने का जुगाड़ बैठा रहे हैं. गठबंधन में रहने पर एक-दो सीटों पर जीत मिल जा सकती है. अलग लड़ने पर ठनठन गोपाल !
महत्व बढ़ा लिया
पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरसीपी सिंह (RCP Singh) ने समय रहते इस हकीकत को आत्मसात कर लिया. अपनी पार्टी ‘आसा’ का जनसुराज में विलय कर राजनीति में अपना महत्व बढ़ा लिया. राजनीति के टीकाकारों की मानें तो छोटे दलों में अधिकतर कायदे से वोटकटवा भी साबित हो पायेंगे, इसमें भी संदेह है. मुख्य गठबंधनों में औकात से बड़ी दावेदारी जता रहे घटक दलों की हैसियत भी करीब-करीब इतनी ही है, इससे अधिक तनिक भी नहीं. 2020 में लोजपा और रालोमो अकेले मैदान में उतरे थे. औकात की थाह लग गयी थी. एनडीए में ‘हम’ (HUM) और महागठबंधन में वीआईपी (VIP) की दावेदारी देख-सुन राजनीति हैरान है. बेहिसाब दावेदारी है. दोनों कभी खुद के बूते चुनाव में नहीं उतरे हैं. एक बार उतर जायें, तो शायद फिर कभी ऐसी आकाश सरीखी दावेदारी नहीं करेंगे.
जमानत जब्त हो गयी
भारतीय इंकलाब पार्टी बनाने वाले इंजीनियर आईपी गुप्ता का जुड़ाव कांग्रेस से था. उनका मुद्दा राजनीतिक नहीं, सामाजिक है. वह सत्ता में बदलाव के लिए नहीं, अपनी जाति और समाज के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं. इस दृष्टि से उनका समर्थन पहले से ही जाति में सिमटा हुआ है. उस जाति में जिसकी आबादी एक प्रतिशत के आसपास है. पुष्पम प्रिया चौधरी की द प्लुरल्स पार्टी बिहार में बदलाव का लक्ष्य लिये 2020 में राजनीति में उतरी थीं. उस चुनाव में उसके अनेक उम्मीदवार थे. पुष्पम प्रिया चौधरी सहित सभी की जमानत जब्त हो गयी थी.
कोई संभावना नहीं
पुष्पम प्रिया चौधरी मधुबनी जिले के बिस्फी और पटना के बांकीपुर (Bankipur) विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार थीं. बिस्फी (Bisfi) में उन्हें 01 हजार 523 मत मिले थे तो बांकीपुर में 05 हजार 189 मत. इस बार वह एक सीट से लड़ेंगी, परन्तु उनकी पार्टी के उम्मीदवार सभी 243 निर्वाचन क्षेत्रों में होंगे. परिणाम 2020 से बेहतर निकलेगा, इसकी दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं दिखती है.
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