सूर्यगढ़ा का है यह किस्सा : जात भी गंवाये भात भी नहीं खाये !

विष्णुकांत मिश्र
08 अगस्त 2025
Suryagarh : लखीसराय (Lakhisarai) जिले का सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्र इन दिनों खासे चर्चा में है. यह कहें कि राजनीति वहां की काफी सरगर्म है तो वह कोई अतिरंजना नहीं होगी. मुद्दा एनडीए में हिस्सेदारी से जुड़ा है. जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष केन्द्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह (Rajiv Ranjan Singh alias Lallan Singh) के दहाड़ से यह मुद्दा सुलग उठा है. सर्वविदित है कि सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्र मुंगेर (Munger) संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है. ललन सिंह मुंगेर से जदयू के सांसद हैं. इस आधार पर पार्टी में हस्तक्षेप का अधिकार रखते हैं. हाल ही में सूर्यगढ़ा में विकास कार्यों से संबंधित सरकारी आयोजन हुआ. कुछ लोगों का कहना है कि उस आयोजन का मकसद जदयू का शक्ति प्रदर्शन था.
आमंत्रित नहीं किया गया
आयोजन में ललन सिंह के साथ ग्रामीण कार्य मंत्री अशोक चौधरी (Ashok Chaudhary) भी थे. कार्यक्रम उन्हीं के विभाग से जुड़ा था. मौजूदगी स्वाभाविक थी, पर सामान्य समझ में इसके पीछे राजनीतिक स्वार्थ भी था. यह सब तो था, पर राजनीति का ध्यान इस पर गया कि सरकारी आयोजन में क्षेत्रीय विधायक प्रहलाद यादव (Prahlad Yadav) नहीं दिखे. उपमुख्यमंत्री (Deputy Chief Minister) विजय कुमार सिन्हा (Vijay Kumar Sinha) के मुताबिक उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया था. इस सवाल को उन्होंने एनडीए (NDA) विधायक दल की बैठक में उठाया. तर्क रखा कि जिस प्रहलाद यादव ने राजद (RJD) में रहते संकट के समय एनडीए सरकार का साथ दिया था, उनके ही क्षेत्र में उनकी इस कदर अनदेखी अनुचित है.
तब भी बुलाया जाना चाहिये था
वैसे भी प्रहलाद यादव एनडीए के साथ नहीं होते तब भी क्षेत्रीय विधायक होने के नाते उन्हें बुलाया जाना चाहिये था. एनडीए की बैठक में अशोक चौधरी भी थे. उन्होंने कड़ा प्रतिकार किया. बात वहीं नहीं रुकी. मुख्यमंत्री (Chief Minister) नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के सामने ही विजय कुमार सिन्हा और अशोक चौधरी में कहासुनी हो गयी. प्रत्यक्षदर्शियों का कहना रहा कि तू-तू, मैं-मैं भी हो गया. विश्लेषकों का मानना है कि बैठक में जो कुछ हुआ वह विवाद का खुरचन था. असली मुद्दा सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्र से जुड़ा हुआ है. ऐसा माना जा रहा है कि एनडीए में सूर्यगढ़ा की सीट को लेकर ललन सिंह और विजय कुमार सिन्हा की सींगें फंस गयी हैं.
जदयू की परम्परागत सीट
ललन सिंह सूर्यगढ़ा को जदयू (JDU) के हिस्से में रख 2020 की तरह लखीसराय जिला जदयू के अध्यक्ष रामानंद मंडल (Ramanand Mandal) को उम्मीदवार बनाने के पक्ष में हैं तो विजय कुमार सिन्हा विधानसभा में शक्ति परीक्षण के वक्त अघोषित रूप से राजद छोड़ भाजपा में आये प्रहलाद यादव के लिए पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं. आधार उनके सीटिंग होने का भी बना रहे हैं. लेकिन, विजय कुमार सिन्हा के मंसूबे पर ललन सिंह के एक दहाड़ से ही पानी फिर गया. ललन सिंह ने गरज के साथ कहा कि सूर्यगढ़ा जदयू की परम्परागत सीट है. इस बार भी यह सीट उसके हिस्से में रहेगी. उम्मीदवार का चयन जदयू नेतृत्व करेगा.
कोई कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा
इतना ही नहीं, ललन सिंह ने यह भी जोड़ दिया कि किसी भी सूरत में लखीसराय के आतंक को सूर्यगढ़ा से एनडीए का उम्मीदवार नहीं बनने दिया जायेगा. हालांकि, आतंक का नाम उन्होंने नहीं लिया, पर संकेत विधायक प्रहलाद यादव की तरफ ही था. बाद में प्रहलाद यादव का भी बयान आया. बयान का लब्बोलुआब यह कि कोई कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा. वह एनडीए में हैं, एनडीए के उम्मीदवार के रूप में सूर्यगढ़ा से चुनाव लड़ेंगे. एनडीए में उम्मीदवारी के मामले में क्या होगा क्या नहीं, यह वक्त बतायेगा. फिलहाल राजनीति के विश्लेषकों का मानना है कि उस दिन सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्र, एनडीए और जदयू के संदर्भ में ललन सिंह ने जो कुछ कहा वह तथ्य से बिल्कुल परे है. अनर्गल भी कह सकते हैं.

भाजपा के हिस्से में रही
ललन सिंह को शायद नहीं मालूम कि एनडीए में 2020 से पहले सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्र कभी जदयू के हिस्से में नहीं रहा. इतिहास बताता है कि 1995 में समता पार्टी (Samata Party) अस्तित्व में थी. भाकपा- माले (CPI-ML) के साथ वह चुनाव मैदान में उतरी थी. पूर्व विधायक सतीश कुमार (Satish Kumar) सूर्यगढ़ा से उसके उम्मीदवार हुए थे. जनता दल के प्रहलाद यादव से हार गये थे. एनडीए के अस्तित्व में आने के बाद विधानसभा के पांच चुनाव हुए. 2000 से 2015 तक के चार चुनावों में सूर्यगढ़ा की सीट भाजपा (BJP) के हिस्से में रही. 2000 में समाजवादी समझ के पूर्व विधायक भागवत प्रसाद मेहता (Bhagwat Prasad Mehta) को उम्मीदवारी मिली. वर्षों बाद चुनाव लड़ने का अवसर मिलने के बाद भी उनकी किस्मत रूठी रह गयी, जीत नहीं पाये. आगे मौका नहीं मिला.
तब प्रयास नहीं किया
2005 के दोनों चुनावों में पूर्व विधायक प्रेमरंजन पटेल (Prem Ranjan Patel) भाजपा के उम्मीदवार थे. फरवरी में हार गये, अक्तूबर में उनकी जीत हुई. 2010 में उनकी जीत का दुहराव हुआ. 2015 में जदयू एनडीए से अलग महागठबंधन (Grand Alliance) का हिस्सा था. सूर्यगढ़ा राजद की सीटिंग सीट नहीं थी. इसके बाद भी जदयू उसे अपने हिस्से में लेने का प्रयास नहीं किया. कारण संभवतः यह कि उस क्षेत्र से राजद निर्वाचित होता रहा है. 2020 में जदयू एनडीए में लौट आया तब सूर्यगढ़ा से भाजपा को बेदखल कर दिया गया. उम्मीदवारी लखीसराय जिला जदयू के अध्यक्ष रामानंद मंडल को मिली. गति उनकी वही हुई जो 2015 में लखीसराय में हुई थी.
राजनीतिक दबंगई !
तब वह महागठबंधन में जदयू के उम्मीदवार थे. राजद समर्थक सामाजिक समूहों का साथ मिलने के बाद भी जीत नसीब नहीं हो पायी. 2020 में सूर्यगढ़ा में भी वह दूसरे स्थान पर अटक गये. यही है सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्र में एनडीए का इतिहास. इसके बाद भी ललन सिंह इसे जदयू की परम्परागत सीट बता रहे हैं तो इसे राजनीतिक दबंगई नहीं तो और क्या कहा जा सकता है?
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