अररिया : गजब मिजाज है चुनावी राजनीति का !

अशोक विशाल
09 अगस्त 2025
Araria : सीमांचल (Seemanchal) की राजनीति का अपना अलग मिजाज है. आज से नहीं, दीर्घकाल से ही इस अंचल में मुख्य धारा से अलग कुछ दूसरे किस्म की टेढ़ी-मेढ़ी राजनीति होती है. राजनीति के इस अंदाज में बहुसंख्यक मुस्लिम मानसिकता की थाह पाना सामान्य दिमाग के लिए मुश्किल होता है. उदाहरण देखिये, भाजपा (BJP) के प्रदेश अध्यक्ष डा. दिलीप जायसवाल (Dr. Dilip Jaiswal) किशनगंज (Kishanganj) से लोकसभा (Lok Sabha) का चुनाव लड़ते हैं तो मुस्लिमों का साथ उन्हें नहीं के बराबर मिलता है. पर, विधान परिषद (Vidhan Parishad) के चुनाव में अधिसंख्य मुस्लिम मतदाताओं की प्राथमिकता वही बन जाते हैं. जीत भी जाते हैं. एक बार नहीं, लगातार तीन बार उनकी जीत हुई है.
कुछ मायने तो ही है
डा. दिलीप जायसवाल बिहार विधान परिषद के पूर्णिया, अररिया, किशनगंज स्थानीय प्राधिकार निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ते हैं. स्थानीय निकाय जन प्रतिनिधि इसके मतदाता होते हैं. उन मतदाताओं में मुसलमानों की स्वाभाविक बहुलता होती है. वैसे, विधान परिषद के इस तरह के चुनाव का स्वरूप और चरित्र भिन्न होता है. इसके बावजूद मुस्लिम बहुल क्षेत्र में डा. दिलीप जायसवाल की जीत कुछ न कुछ मायने तो रखती ही है. कुछ ऐसा ही उदाहरण अररिया के आफताब अजीम उर्फ पप्पू अजीम (Aftab Azim alias Pappu Azim) और उनकी पत्नी शगुफ्ता अजीम उर्फ बेबी शबनम (Shagufta Azim alias Baby Shabnam) का है. पति-पत्नी दोनों का जुड़ाव जदयू से है.
यही दम्पति काबिज हैं
दिलचस्प किस्सा यह कि बिहार में जबसे त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था (Tristareey Panchayati Raj Vyavastha) लागू हुई है तब से अररिया जिला परिषद (district council) के अध्यक्ष पद पर यही दम्पति काबिज है. तीन बार आफताब अजीम उर्फ पप्पू अजीम अध्यक्ष निर्वाचित हुए हैं तो दो बार शगुफ्ता अजीम उर्फ बेबी शबनम. वर्तमान में पप्पू अजीम अध्यक्ष हैं. राज्य में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था 2001 में लागू हुई. तब से पांच चुनाव हुए. अलग-अलग क्षेत्र से पति-पत्नी दोनों लगातार चार बार जिला पार्षद निर्वाचित हुए. पांचवें चुनाव में पति तो जीत गये, पत्नी हार गयीं. निर्वाचित होतीं तो शायद अररिया जिला परिषद के अध्यक्ष पद पर वही काबिज रहतीं.

सिकुड़ जाता है समर्थन
खैर, चुनाव में जीत-हार लगी रहती है. यहां मूल विषय यह है कि जिला परिषद के चुनावों में इन्हें भारी जन समर्थन तो मिल जाता है, पर विधानसभा (Assembly) के चुनावों में वह समर्थन सिकुड़ जाता है. परिणामस्वरूप मुंह की खानी पड़ जाती है. शगुफ्ता अजीम के साथ ऐसा दो बार हुआ. पप्पू अजीम के साथ भी दो बार. शगुफ्ता अजीम 2010 में सिकटी (Sikti) और 2020 में अररिया विधानसभा क्षेत्र में पराजित हुईं. 2020 के चुनाव में शगुफ्ता अजीम उर्फ बेबी शबनम को अररिया से जदयू (JDU) की उम्मीदवारी मिली. 2015 से पहले एनडीए (NDA) में अररिया की सीट आमतौर पर भाजपा (BJP) के हिस्से में रहती थी. 2015 में लोजपा (LJP) के हिस्से में थी.
तब भी हार गयीं चुनाव
2015 में जदयू एनडीए से अलग था. बाद में वापसी हुई तो 2020 में शगुफ्ता अजीम को अवसर उपलब्ध कराने के लिए इसे उसके कोटे में दे दिया गया. शगुफ्ता अजीम को जदयू की उम्मीदवारी मिली. प्रतिष्ठित राजनीतिक पारिवारिक पृष्ठभूमि, स्वच्छ व ईमानदार छवि, हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों में समान लोकप्रियता व विश्वसनीयता रहने के बाद भी हार गयीं. चुनाव मैदान में मोहम्मद राशिद अनवर एम (Mohammed Rashid Anwar M) सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) के उम्मीदवार थे. सीमांचल में असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) की ‘लहर’ थी. इसके बाद भी वह 08 हजार 924 मतों पर ठहर गये.
करना होगा इंतजार
इसी तरह अररिया जिला भाजपा के पूर्व अध्यक्ष चन्द्रशेखर सिंह बब्बन (Chandrashekhar Singh Babban) पार्टी से बगावत कर लोजपा का उम्मीदवार बन गये. जनसमर्थन का उनका गुमान 08 हजार 203 मतों में सिमट गया. कांग्रेस (Congress) प्रत्याशी आबिदुर रहमान (Abidur Rahman) की 47 हजार 936 मतों के बड़े अंतर वाली जीत हुई. आबिदुर रहमान को 01 लाख 03 हजार 054 मत मिले तो शगुफ्ता अजीम को 55 हजार 118 मत. यह तो रही 2020 की बात. 2025 में क्या होगा? मुकाबला कांग्रेस (Congress) प्रत्याशी आबिदुर रहमान और जदयू उम्मीदवार शगुफ्ता अजीम उर्फ बेबी शबनम के बीच ही होगा या स्वरूप बदलेगा? यह जानने- समझने के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा.
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