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औरंगाबाद : गोह का है गड़बड़ गणित…ठन जायेगी फिर एनडीए में रार ?

राजकिशोर सिंह
13 अगस्त 2025
Aurangabad : औरंगाबाद जिले के गोह (Goh) विधानसभा क्षेत्र को लेकर क्या इस बार भी एनडीए (NDA) में रार ठन जायेगी? राजनीति इस सवाल पर माथापच्ची कर रही है. उसके ऐसा करने का वाजिब कारण भी है. 2020 में ऐसे ही हालात थे. कलह ऐसा पसर गया कि बाजी एनडीए के हाथ से तो निकल ही गयी, इस क्षेत्र में चुनाव का एक नया इतिहास भी बन गया. कलह पसरने का कारण यह रहा कि 2015 से पहले एनडीए में गोह की सीट जदयू (JDU) के कोटे में रहती थी. 2010 में एनडीए के जदयू उम्मीदवार के तौर पर डा. रणविजय कुमार सिंह (Ranavijay Kumar Singh) निर्वाचित हुए थे.

भाजपा काबिज हो गयी

2015 में जदयू एनडीए से अलग महागठबंधन (Grand Alliance) का हिस्सा बन गया. सीटिंग होने के नाते गोह की सीट उसके हिस्से में गयी. उम्मीदवारी डा. रणविजय कुमार सिंह को ही मिली . तब जदयू को पछाड़ भाजपा (BJP) इस सीट पर काबिज हो गयी. डी के शर्मा (DK Sharma) के नाम से ज्यादा चर्चित पूर्व विधायक देव कुमार शर्मा के पुत्र मनोज शर्मा (Manoj Sharma) विधायक निर्वाचित हो गये. महागठबंधन के जदयू उम्मीदवार डा. रणविजय कुमार सिंह मुंह की खा गये. उस चुनाव में औरंगाबाद जिले के छह विधानसभा क्षेत्रों में सिर्फ गोह में ही भाजपा की जीत हुई थी. वहां यह उसकी दूसरी जीत थी.

कठिन था भाजपा नेतृत्व के लिए

नये घटनाक्रम में चुनाव के कुछ समय बाद जदयू एनडीए में लौट आया. 2020 में इस सीट को लेकर एनडीए में रार छिड़ गयी. डा. रणविजय कुमार सिंह की मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) से निकटता थी. गोह को अपने हिस्से में रखने के लिए जदयू 2015 से पहले के बंटवारे को आधार बना दावा ठोक रहा था. उधर, सीटिंग होने की वजह से भाजपा की दावेदारी भी मजबूत थी. मनोज शर्मा का भाजपा में जो प्रभाव था उसके मद्देनजर उन्हें दरकिनार करना पार्टी नेतृत्व के लिए कठिन था.

भूपेन्द्र यादव से निकटता

भाजपा के लोग बताते हैं कि मनोज शर्मा की निकटता केन्द्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव (Bhupendra Yadav) और नित्यानंद राय (Nityanand Rai) से है. इन संबंधों का भी असर रहा कि गोह की सीट भाजपा के हिस्से में आ गयी. उम्मीदवारी मनोज शर्मा को ही मिली. पूर्व में गोह से तीन बार विधायक निर्वाचित हुए डा. रणविजय कुमार सिंह को यह बर्दाश्त नहीं हुआ. जदयू से बगावत कर वह उपेन्द्र कुशवाहा (Upendra kushwaha) के साथ हो गये. गोह से रालोसपा (RLSP) की उम्मीदवारी मिल गयी. दुष्परिणाम इस रूप में सामने आया कि भूमिहार समाज के दोनों दिग्गज एक साथ मुंह की खा गये. जीत महागठबंधन के राजद (RJD) उम्मीदवार भीम कुमार सिंह की हो गयी.

गोह में नहीं जीता था कभी राजद

राजद के लिए यह ऐतिहासिक जीत थी. इससे पहले गोह में उसका विजय पताका कभी नहीं लहराया था. सामाजिक न्याय की राजनीति के चरम काल में भी नहीं. 2010 में राजद उम्मीदवार राम अयोध्या प्रसाद यादव (Ram Ayodhya Prasad Yadav) जीत के करीब जाकर भी 694 मतों से पीछे रह गये थे. यादव बिरादरी के भीम कुमार सिंह (Bhim Kumar Singh) बारून (Baron) के रहने वाले हैं. कुर्था (kurta) विधानसभा क्षेत्र निवासी मनोज शर्मा की तरह उन पर भी बाहरी होने का ठप्पा लगा हुआ है. इसके बाद भी जदयू के गढ़ की पहचान रखने वाले गोह में भारी जीत हुई. 35 हजार 708 मतों के बड़े अंतर वाली जीत इतराने का आधार प्रदान करती है.

परिणाम कुछ और निकलता

पर, हकीकत यह भी है कि मनोज शर्मा और डा. रणविजय कुमार सिंह में से कोई एक मैदान में होते, तो परिणाम शायद कुछ और निकलता. इसको इन आंकड़ों से बड़ी आसानी से समझा जा सकता है. विजयी राजद प्रत्याशी भीम कुमार सिंह को 81 हजार 410 मत प्राप्त हुए. दूसरी तरफ भाजपा उम्मीदवार मनोज शर्मा को 45 हजार 792 तथा रालोसपा प्रत्याशी डा. रणविजय कुमार सिंह को 44 हजार 050 मत. दोनों का जोड़ 89 हजार 842 होता है. यह जोड़ भीम कुमार सिंह को 08 हजार 432 मतों के अंतर से हार का स्वाद चखा देता, ऐसी बात नहीं. पर, इतना जरूर होता कि जीत का अंतर इतराने लायक नहीं रह जाता.

एनडीए के लिए चिंता की बात

आधार यह कि डा. रणविजय कुमार सिंह रालोसपा के उम्मीदवार थे. निश्चित रूप से उन्हें उपेन्द्र कुशवाहा समर्थक कुशवाहा मत भी मिले होंगे. वह मैदान में नहीं होते तो जो कोई रालोसपा का उम्मीदवार होता, वे मत उसे मिल जाते. इसी तरह रालोसपा का उम्मीदवार यदि कुशवाहा समाज से होता तो इस समाज के अगड़ा-पिछड़ा मानसिकता वाले जितने भी मत भीम कुमार सिंह को मिले, वे उन्हें नहीं मिलते. उस स्थिति में परिणाम का स्वरूप कुछ भिन्न अवश्य हो जाता. खैर, 2020 में जो हुआ सो हुआ, एनडीए के लिए चिंता की बात है कि 2025 में भी उसे कमोबेश वैसे ही हालात से गुजरना पड़ जा सकता है.

लोजपा-आर भी घुसेड़ रही सींग

भूमिहार समाज के दोनों दिग्गज मनोज शर्मा और डा. रणविजय कुमार सिंह उम्मीदवारी के लिए अपनी-अपनी जगह डटे हुए हैं. क्षेत्र में दोनों अलग -अलग चुनाव पूर्व अभियान भी चला रहे हैं. यहां यह जानने वाली बात है कि गोह को लेकर 2020 में सींगें भाजपा और जदयू की फंसी थीं, इस बार भाजपा और रालोमो की फंस गयी सी दिखती हैं. दिलचस्प बात यह भी कि इन दोनों की फंसी सींगों में लोजपा-आर भी अपनी सींग घुसेड़ रही है. उसकी मंशा गोह से सुनील यादव (Sunil Yadav) को उम्मीदवार बनाने की है. सुनील यादव बालू के कारोबारी हैं. छवि कैसी होगी, बताने की शायद जरूरत नहीं.

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