सीतामढ़ी : बाजपट्टी… जदयू तलाश रहा सक्षम-समर्थ युवा खेवनहार!

कोमल शाही
16 सितम्बर 2025
Sitamarhi : बाजपट्टी पर इस बार कई ‘राजनीतिक बाज’ नजर जमाये हुए हैं. उम्मीदवारी झपट लेने की ताक में हैं. झपटा-झपटी जैसी स्थिति एनडीए (NDA) में कुछ अधिक दिख रही है. महागठबंधन में कोई खास किचकिच नहीं है. इसका वर्तमान स्वरूप बना रहा, तो यह सीट राजद (RJD) के ही हिस्से में रहेगी. उम्मीदवारी दूसरे किसी को नहीं, सीटिंग विधायक मुकेश कुमार यादव (Mukesh Kumar Yadav) को मिलेगी. विशेष परिस्थिति में उलटफेर हो जाये तो वह अलग बात होगी. बात एनडीए की तो पूर्व मंत्री डा. रंजू गीता (Dr. Ranju Geeta) को जदयू (JDU) की उम्मीदवारी मिलेगी ही, ऐसा दावे के साथ कोई नहीं कह सकता.
झूल रही हैं अनिश्चितताओं में
वैसे, डा. रंजू गीता बाजपट्टी (Bajpatti) क्षेत्र की प्रथम विधायक रही हैं, लगातार दो बार निर्वाचित हुईं. नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की सरकार में मंत्री भी रही हैं. 2020 में हार 02 हजार 704 मतों के मामूली अंतर से हुई. उम्मीदवारी के तिहराव के लिए ये मजबूत आधार तो हैं, पर इसके बाद भी वह कथित तौर पर अनिश्चितताओं में झूल रही हैं. वजह 2020 की हार नहीं, जिन परिस्थितियों में हार हुई उसका करीब-करीब उसी रूप में बना रहना है. कैसे, उसको इस रूप में समझिये. सर्वविदित है कि सीतामढ़ी जिले का बाजपट्टी विधानसभा क्षेत्र 2008 के परिसीमन में अस्तित्व में आया. 2010 में पहला चुनाव हुआ.
नहीं मिला जीत दिलाऊ समर्थन
एनडीए में यादव समाज की डा. रंजू गीता को जदयू की उम्मीदवारी मिली. जिला पार्षद के तौर पर जनता से जुड़े मुद्दे को लेकर उनकी मुखरता ने उन्हें आसान जीत दिला दी. वैसे, बड़ी भूमिका स्वजातीय यादव मतों का लगभग संपूर्ण साथ मिलने की रही. उस चुनाव में पूर्व मंत्री अनवारूल हक (Anwarul Haq) राजद के उम्मीदवार थे. ‘माय’ में बिखराव के चलते मुंह की खा गये. इसको थोड़ा और स्पष्ट करें तो यादव मतों का जीत दिलाऊ समर्थन उन्हें नहीं मिला. कहा जाता है कि सीधे तौर पर इसका लाभ डा. रंजू गीता को मिल गया. 2015 में डा. रंजू गीता की जीत का दुहराव इस वजह से हो गयी कि जदयू के महागठबंधन में रहने से राजद समर्थक सामाजिक समूहों, विशेष कर यादव मतों का मुकम्मल समर्थन उन्हें मिल गया. मुस्लिम मतों का भी.
सेंध नहीं लगा पायीं
उधर, जदयू रहित एनडीए (NDA) में यह सीट रालोसपा (RLSP) (वर्तमान में रालोमो) के हिस्से में थी. उम्मीदवारी वैश्य समाज की रेखा गुप्ता (Rekha Gupta) को मिली थी. महागठबंधन के मजबूत सामाजिक समीकरण में वह सेंध नहीं लगा पायीं, मात खा गयीं. 2020 में हालात पूरी तरह बदल गये. राजद ने अप्रत्याशित निर्णय के तहत नानपुर के प्रखण्ड प्रमुख मुकेश कुमार यादव को मैदान में उतार डा. रंजू गीता की राह रोक दी. डा. रंजू गीता की खटिया इस कारण खड़ी हो गयी कि पूर्व में जिन स्वजातीय मतों के सहारे वह चुनावी नैया पार लगाती थीं, वे प्रायः सबके सब राजद प्रत्याशी मुकेश कुमार यादव के साथ हो गये. विश्लेषकों का मानना है कि सिर्फ यही नहीं, डा. रंजू गीता की कथित अव्यावहारिकता से एनडीए समर्थक गैर यादव मतों में पनपा गुस्सा भी उनकी हार का एक महत्वपूर्ण कारक बन गया.

और भी हैं कई दावेदार
ऐसे में 2025 के चुनाव में उम्मीदवार चयन में जदयू नेतृत्व से चूक हुई तो 2020 जैसे परिणाम का खतरा बराबर का बना रह जा सकता है. ऐसा इसलिए भी कि राजद विधायक मुकेश कुमार यादव ने अपनी शिष्टता और व्यवहार कुशलता से गैर यादव मतों में भी समर्थन विस्तृत कर रखा है. इसके मद्देनजर विश्लेषकों का मानना है कि बाजपट्टी में विजय हासिल करने के लिए जदयू को रणनीति बदलनी पड़ सकती है. बहरहाल, जदयू में डा. रंजू गीता की दावेदारी तो अपनी जगह है ही, उनके अलावा और भी कई दावेदार हैं. उनमें सीतामढ़ी के पूर्व सांसद रामकुमार शर्मा (Ramkumar Sharma) भी हैं. लोग बताते हैं कि 2024 के संसदीय चुनाव में सवालों में घिरी अपनी भूमिका को भूल वह जदयू सांसद देवेश चन्द्र ठाकुर (Devesh Chandra Thakur) के दरबार में जमे रहते हैं. इसके बाद भी संभावना बनती नहीं दिख रही है.
इस बार भी हैं दावेदार
रेखा गुप्ता 2020 में एनडीए से अलग रालोसपा की उम्मीदवार थीं. 11 हजार 267 मतों में सिमट गयी थीं. इस बार रालोमो से दावेदार बनी हुई हैं. इन सबकी दावेदारी में दम है या नहीं, यह एक अलग विषय है. जानकारों के मुताबिक जदयू नेतृत्व जो आंतरिक सर्वे करा रहा है, उम्मीदवार चयन का वही मुख्य आधार बन सकता है. कहते हैं कि जदयू नेतृत्व वैसा युवा चेहरा तलाश रहा है जो आकर्षक व्यक्तित्व का हो और सभी दृष्टिकोण से सामर्थ्यवान हो. क्षेत्र के राजनीतिक और सामाजिक समीकरण में भी फिट बैठता हो. ऐसे चेहरे कई हैं,पर फिलहाल जदयू के रणनीतिकारों की नजर बोखड़ा (Bokhra) के प्रखंड प्रमुख सुधीर कुमार साह (Sudhir Kumar Shah) पर जमी हुई है. ऐसा पार्टी के लोग बताते हैं.
लोकप्रियता साबित हुई
आधार यह कि सुधीर कुमार साह ने 2021 में बोखड़ा के प्रखंड प्रमुख के पद पर वर्षों से जमे हुकुमदेव यादव (Hukumdev Yadav) के अंगदी पांव को उखाड़ उस पर खुद काबिज हो गये. इससे उनकी लोकप्रियता साबित हुई. सबसे बड़ी बात यह कि पार्टी के प्रति उनके समर्पण और नेतृत्व के प्रति निष्ठा पर कभी कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगा. 2024 के संसदीय चुनाव में जदयू उम्मीदवार देवेश चन्द्र ठाकुर और विधान परिषद के चुनाव में अभिषेक झा (Abhishek Jha) के समर्थन में उन्होंने समर्पित भूमिका निभायी. सुधीर कुमार साह वैश्य समाज की तेली जाति से आते हैं. बाजपट्टी विधानसभा क्षेत्र में तेली जाति के मतों की काफी अच्छी संख्या है. एक लाख के आसपास रहने की बात कही जाती है.
पकड़ मजबूत हो गयी
बाजपट्टी क्षेत्र की जातीय राजनीति की गहन जानकारी रखने वालों के अनुसार चुनाव में आमतौर पर तेली जाति के मत ही निर्णायक होते हैं. इलाकाई लोग बताते हैं कि पूर्व सांसद सुनील कुमार पिंटू (Sunil Kumar Pintu) के जदयू से दूर हो जाने के बाद स्वजातीय तेली समाज में सुधीर कुमार साह की पकड़ मजबूत हो गयी है. इससे एनडीए में उनका महत्व बढ़ गया है. इन सबको देखते हुए बोखड़ा के पूर्व जिला पार्षद संजय झा (Sanjay Jha) एवं सरपंच मोहम्मद जावेद का मानना है कि विधानसभा चुनाव में सुधीर कुमार साह को अवसर मिला तो एनडीए को सिर्फ बाजपट्टी में ही नहीं, जिले के अन्य सात विधानसभा क्षेत्रों में भी तेली जाति के समर्थन के रूप में लाभ मिल सकता है. जो हो, चुनाव में अभी वक्त है. आगे क्या होता है, यह देखना काफी दिलचस्प होगा.
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