तापमान लाइव | Tapmanlive

न्यूज़ पोर्टल | Hindi News Portal

रजौली : सप्तऋषि पर्वत… सिर्फ बातों में है पर्यटन स्थल

राजकिशोर सिंह
13 अक्तूबर 2025

Rajgir (Nawada) : फोरलेन सड़क के रूप में इठलाते बख्तियारपुर-रजौली राष्ट्रीय उच्च पथ संख्या-20 पर रजौली (Rajauli) प्रखंड कार्यालय से तकरीबन डेढ़-दो किलोमीटर पहले बसा है सिमरकोल (Simarcol) गांव. उसी सिमरकोल से होते हुए दक्षिण की तरफ सड़क निकलती है जो सप्तऋषि पर्वत (Saptarishi Mountains) की ओर जाती है. सिमरकोल से करीब तीन किलोमीटर दूर स्थित इस पहाड़ का पुराणों में त्रेतायुगीन यानी रामायण कालीन (Ramayana Period) सप्तऋषियों की साधना स्थली के रूप में वर्णन है. सप्तऋषि पर्वत के इस हिस्से को लोमष ऋषि पहाड़ (Lomash Rishi Mountain) के नाम से भी जाना जाता है. ऐसा बताया जाता है कि मृत्यु पर विजय पाने के लिए लोमष ऋषि ने इसी पर्वत पर हजारों साल तपस्या की थी. पहाड़ पर मौजूद ‘डगडगवा चट्टान’ पर एक शिलालेख है, जो इसके सप्तऋषियों की तपोभूमि होने के तथ्यों की पुष्टि करता है. सप्तऋषि यानी लोमष ऋषि, याज्ञवल्क्य ऋषि, श्रृंगि ऋषि, दुर्वासा ऋषि, गौतम ऋषि आदि. सप्तऋषियों के बारे में ऐसी मान्यता है कि उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा (Brahma) के मस्तिष्क से हुई थी. वे सभी वेदों के ज्ञाता और धर्म के संरक्षक थे. इसी सप्तऋषि पर्वत पर माता सीता की निर्वासन स्थली भी है, जो सीतामढ़ी के नाम से प्रसिद्ध है.

सप्तऋषि पर्वत से सनातनियों (Sanatanis) की श्रद्धा जुड़ी हुई है. इसी को दृष्टिगत रख इसे पर्यटन स्थल (Tourist Destination) के रूप में विकसित करने की बात कही जाती है. रामायण सर्किट से जोड़ने की भी चर्चा होती रहती है. पर, ये सब फिलहाल बातों और चर्चाओं में ही हैं, धरातल पर वैसा कुछ होता दिख नहीं रहा है. हालात अभी ऐसे हैं कि फोरलेन से सप्तऋषि पर्वत की ओर जाने वाली सड़क से गुजरते वक्त बीस साल पहले का बिहार स्मृति पटल पर छा जाता है. हालांकि, उस दिन पहाड़ के इर्द-गिर्द सड़क की सूरत और सेहत सुधारने की कोशिश होती दिखी. लेकिन, खानापूर्ति सरीखी उस कोशिश में गुणवत्ता नजर नहीं आयी. रजौली प्रखंड की रजौली पूर्वी पंचायत के सरमसपुर गांव के समीप सप्तऋषि पहाड़ पर है लोमस ऋषि और याज्ञवल्क्य ऋषि की तपोस्थली. गुफा रूप में दोनों का तपस्या स्थल पहाड़ की अलग-अलग चोटी पर है. उन्हीं चोटियों को लोमस ऋषि पर्वत और याज्ञवल्क्य ऋषि पर्वत की पहचान मिली हुई है.

लोमस ऋषि पर्वत पर पहुंच आसान है. दर्शन-पूजन के लिए जाने हेतु सीढ़ियां बनी हुई हैं.125 से अधिक सीढ़ियां चढ़ लोग चोटी पर पहुंचते हैं. पहड़तली में छोटा सा मैदान है. उस मैदान में संभवतः एक साथ लगाये गये पीपल के दो बड़े छायादार वृक्ष हैं. छोटा सा एक आश्रय स्थल भी है. पहले से बना कुआं अब किसी काम का नहीं रह गया है. पानी की जरूरत जलापूर्ति पाइप से पूरी हो जाती है. पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की पहल हुई है, तो वह इतने भर में ही सिमटी हुई है. आम दिनों में इक्के-दुक्के श्रद्धालु ही नजर आते हैं. लेकिन, गांव वालों की आवाजाही बनी रहती है. वैसे, गांव बड़ा नहीं है. पहाड़ के पास ही मध्य विद्यालय है. ऐतिहासिक धरोहर के रूप में विख्यात सप्तऋषि साधना स्थली का आध्यात्मिक व पुरातात्विक महत्व तो है ही, इसकी सांस्कृतिक पहचान भी काफी विस्तृत है. सनातनी परम्परा (Sanatani Tradition) में पवित्र श्रावण मास की पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन (Rakshabandhan) के दिन वहां बहुत बड़ा मेला लगता है. पहाड़ की तलहटी में लगने वाले इस मेले में सिर्फ रजौली प्रखंड क्षेत्र से ही नहीं, बिहार (Bihar) और झारखंड (Jharkhand) के दूर-दराज से भी लोग आते हैं. लोमस ऋषि पर्वत के शिखर पर स्थित शिव मंदिर (Shiv Mandir) में जल और उसी जगह गुफा में स्थापित ऋषि द्वय की प्रतिमाओं पर पुष्प अर्पित कर मन्नतें मांगते हैं. आस्था के इस केन्द्र पर पूजा-अर्चना के बाद एकदिनी मेले का आनंद उठाते हैं.

सप्तऋषि पर्वत से जुड़ा एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि तकरीबन दस साल पहले रजौली में पदस्थापित अंचलाधिकारी की कथित अज्ञानता और अदूरदर्शिता की वजह से इसके अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो गया. हुआ ऐसा कि इस पर्वत के सप्तऋषियों की तपोस्थली रहने के तथ्यों को छिपा कर 2015 में तीन बड़ी कम्पनियों को लोमष ऋषि पर्वत पर पत्थर उत्खनन का पट्टा (Stone Quarry Lease) दे दिया गया. पत्थर उत्खनन का काम चलने भी लगा. पर, छपरा गांव निवासी पूर्व मुखिया विनय कुमार सिंह को यह बर्दाश्त नहीं हुआ. पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) में उन्होंने लोकहित याचिका दायर कर दी. सुनवाई के दौरान ही पटना उच्च न्यायालय ने तत्काल प्रभाव से पत्थर उत्खनन पर रोक लगा दी. 27 जुलाई 2021 से उत्खनन पूरी तरह से बंद है. इस बीच रजौली के तत्कालीन अनुमंडल पदाधिकारी चन्द्रशेखर आजाद ने इन पहाड़ों को सप्तऋषियों की साधना स्थली बताते हुए इन्हें पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की सरकार से अनुशंसा कर दी. पटना उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की दो सदस्यीय खंडपीठ नेे 19 सितंबर 2023 को इसके पौराणिक, धार्मिक और पुरातात्विक (Mythological, Religious and Archaeological) महत्व को दृष्टिगत रख इसेे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का आदेश पारित कर दिया. पर, मामले में राज्य सरकार में पटना उच्च न्यायालय जैसी गंभीरता नहीं दिख रही है.

श्रृंगि ऋषि पर्वत लोमष ऋषि पर्वत से सात-आठ किलोमीटर दूर है. फोरलेन सड़क पर स्थित बजरंगवली चौक से उत्तर हरदिया पंचायत में फुलवरिया जलाशय के ठीक सामने है यह. तकरीबन चार हजार फीट से अधिक की ऊंचाई पर श्रृंगी ऋषि की तपोभूमि है. ऐसी मान्यता है कि राजा दशरथ ने यहीं उनसे संतान की मन्नत मांगी थी. उसी जगह पर छोटा सा मंदिर है. सामान्य दिनों में सामान्य जन के लिए वहां पहुंच पाना कठिन है. इसके बावजूद श्रद्धालु संतान की मन्नत मांगने (Praying for a Child) और मन्नत पूरी (Wish Fulfilled) होने पर मंदिर में धाजा फहराने के लिए वहां जाते हैं. ऐसा आमतौर पर बसंत पंचमी (Basant Panchmi) के दिन होता है. उस दिन श्रृंगि ऋषि पर्वत की तलहटी में बहुत बड़ा मेला लगता है. दायरा उसका बजरंगवली चौक से फुलवरिया जलाशय तक फैला रहता है. इसी तलहटी में खिलखिलाती-इठलाती हरी-भरी पहाड़ियों के बीच फुलवरिया जलाशय है, जहां जंगल, पहाड़ और झरने का बेहद मनोरम दृश्य (Panoramic View) दिखता है. स्थानीय लोगों के मुताबिक यह जलाशय खनिज सम्पदाओं से परिपूर्ण है. रजौली प्रखंड की हरदिया पंचायत में फुलवरिया गांव के समीप तिलैया नदी पर यह बना हुआ है इसलिए इसे फुलवरिया जलाशय नाम दिया गया है. बहरहाल, सप्तऋषियों की तपोस्थली से तो रजौली की प्रसिद्धि जुड़ी है ही, उसमें बालुशाही की मिठास भी भरी हुई है. यह मिठास रामायण कालीन नहीं, बीत रहे काल की ही है जिसकी ख्याति अब दूर-दूर तक फैल रही है.