जनतंत्र की परीक्षा

बांके बिहारी साव
06 नवम्बर 2025
11 नवम्बर 2025
बिहार में जनतंत्र की परीक्षा…
वैसे बिहार में पूरा जनतंत्र है कहां?
कम से कम 75 प्रतिशत सीटों पर
वंशतंत्र काबिज है.
परीक्षा कैसी भी हो…
परीक्षा जब भी हो…
परीक्षा विधानसभा की हो या लोकसभा की, 75 प्रतिशत पर अब भी वंशतंत्र काबिज है. यानि बिहार में अभी पूर्ण लोकतंत्र है ही
नहीं… मेरी उम्मीद है कि और कभी होगा भी नहीं… यही एक परीक्षा है जिसमें कोई भी बैठ सकता है.
मूर्ख से मूर्ख…
नीच से नीच…
अपराधी से भी बड़ा अपराधी…
सिर्फ भ्रष्ट ही नहीं, महाभ्रष्ट…
चेहरे और चरित्र पर कितना भी दाग हो…
कोई भी फर्क नहीं पड़ता…
यहां तक कि बलात्कारी भी…
यह गजब की परीक्षा है…
गंगा फेल और नंगा पास…
इस परीक्षा की एक खूबी और है…
गंगा क्या महागंगा जैसा आदमी भी इस परीक्षा में पास होने के बाद नंगा हो जाता है.
पहले लोग साधारण कपड़े पहनते थे. कपड़ों के ब्रांड भी कम थे, इसलिए चुनावी परीक्षा पास करने के बाद भी नेताजी नंगा नहीं होते थे. लेकिन, अब जमाना बदल गया है. नेताजी को सिर्फ धोती-कुर्ता, पाजामा ही नहीं, अब कीमती टी-शर्ट और पैंट भी चाहिए, शायद कपड़े की च्वाइस में देर हो जाने के कारण इन्हें नंगा हो जाना पड़ता है! वैसे, नंगा होना आज कोई बुरी बात नहीं है. जाति के नंगे थे, तो लोग और भी श्रद्धा से देखते थे. मजाल है कि जाति के नंगे को कोई नंगा कर दे. अगर आप मेरी जाति के नंगे को गाली देंगें तो फट से मैं कहूंगा-
हमारी जाति का नंगा, तो नंगा
तुम्हारी जाति का नंगा, तो गंगा?
कुल नियुक्तियां 243.
उम्मीदवार चार हजार से भी ज्यादा.
इस परीक्षा में कोई प्रश्न-पत्र नहीं होता, होती है सिर्फ जाति और पार्टी.
आप जाति के उम्मीदवार हैं, तो वोट मांगने की जरूरत नहीं.
अगर आप जाति के उम्मीदवार है और पार्टी भी तगड़ी है, तो फिर पूछना ही क्या?
ख्ुादा की मेहरबानी से यदि आपके पास
बिना गिनती के पैसे हैं तो फिर सोने
पर सुहागा…

कहावत है कि भगवान देते हैं तो छप्पड़ फाड़कर और लेते हैं तो …. फाड़कर
बहुत से ऐसे नेता हैं जो जाति के नाम पर 30-30 वर्ष से नेता हैं और यदि उनपर शीर्ष नेता का वरदहस्त है, तो फिर पूछना ही क्या?
कल तक जिन नेताओं को कड़ुआ तेल
नसीब नहीं था, आज गमकौआ तेल
लगाकर घूम रहे हैं.
कल तक जिन नेताओं को सोने के लिए फटा और गंदा गदेला नसीब नहीं था, आज टीकवुड के पलंग पर डनलप बिछाकर सो रहे हैं.
सब जाति और पार्टी की कृपा का फल है.
कोई नेता चिल्लाता है पलायन…
कोई नेता चिल्लता है बेरोजगारी…
कोई चिल्लाता है जंगलराज…
कोई चिल्लाता है मंगलराज…
लेकिन बिहार आज भी बिहार है.
यह पहले असली नंगों का शहर था. अब नकली नंगों का शहर है. देश का सबसे कम आमदनी वाला राज्य पहले भी था और आज भी है.
यह सच है कि सड़कें बन रही हैं और उन सड़कों पर जहां पहले अम्बेसडर और फीएट नहीं था, अब थार और महंगी गाड़ियों का जाम लगा रहता है.
यहां नेताजी का विकास हुआ है.
अपराधियों का विकास हुआ है.
भ्रष्ट लोगों की तो चांदी ही चांदी है, लेकिन मेहनती और इमानदार आदमी आज भी मुंह बाये खड़े हैं. यहां की जनता इतने में ही खुश है कि उसकी जाति का नेता जीत गया.
यहां जाति का छोटा-छोटा नेता भी हिस्सेदारी के लिए बड़ी-बड़ी जनसभाएं करता है और टिकट मिलते ही सारी सभा भूलकर स्वंय और परिवार को स्थापित करने में लग जाता है. नेताजी सवर्ण जाति के हों या विदीर्ण जाति के…
सभी का एक ही लक्ष्य…
बस, परिवार को सेट करने की कोशिश.
कई परिवार तो ऐसे हैं कि उनके घरों में टिकट देने के लिए लोग भी नहीं बचे हैं.
स्वंय एमपी और मिनिस्टर…
बेटा विधायक और मंत्री…
पतोहू विधायक…
सभी भाई मंत्री और विधायक…
दामाद…, बेटा…, बेटी…., सभी नेता…
कोई सांसद, तो कोई विधायक.
उनका सिद्धांत है- ‘परिवार सुखी, तो संसार सुखी.’
जनतंत्र की हत्या तो यहीं हो जाती है. फिर भी, उनके पीछे लोग पागल हैं. फुलवारी और बगीचे की रखवाली करती है जनता और फल खाता है नेताजी का परिवार…
एक नेताजी का भाव इसलिए घट गया कि उन्होंने अपनी जवान और सुंदर बीवी के लिए टिकट मांगा. ताकि, वह भी परीक्षा में बैठ सके. लेकिन, हाय री तकदीर…!
वोट रहते हुए नेताजी की पत्नी बेटिकट रह गयी. आखिर, ऐसा क्यों हुआ?
ऐसा इसलिए हुआ कि नेताजी की तो जाति पर पकड़ है और न ही अपराधी पर. पैसे के मामले में भी वह थोड़ा कंजूस हैं. जबकि नेताजी यह जानते हैं कि पार्टी बिना पैसे के वरदान नहीं देती है.
बहुत से नेता तो यहां इसलिए पार्टियां बनाकर घूमते हैं कि पूछल्ले उम्मीदवार दस-बीस देकर उनकी पार्टी का टिकट खरीद सके. लेकिन भईया…, टिकट उसी की बिकती है जिसकी पार्टी में दम हो, जाति में दम हो. वैसे नेताजी के साथ पारिवारिक संपर्क होने पर भी आजकल टिकट मिल जाता है. वह पारिवारिक संपर्क कैसा है और कितना है यह टिकटार्थी और नेताजी के निकटार्थी पर निर्भर है.
यदि आपके परिवार को नेताजी ने पसंद कर लिया तो आपकी पौ बारह.
हमारे बहुत से नेता हैं जिन्होंने समाजसेवा से अधिक परिवार की सेवा करके टिकट पाया है और लगातार मंत्री भी बने हैं. यदि बीच में आपका परिवार छिटका, तो आप भी गये. जय सियाराम…!
सच कहिये तो, यह परीक्षा नहीं, चिटिंग है. देखियेगा कि बाप-बेटा… बहु-बेटी… सभी एक साथ परीक्षा दे रहे हैं. इस परीक्षा की योग्यता भी यही है कि आपका बाप, ससुर या दादा-दादी इसका कंट्रोलर है.
यदि आप पागल भी हैं, सेंटप नहीं भी किया है, निचली परीक्षा पास भी नहीं की है फिर भी यदि आपका बाप परीक्षा कंट्रोलर है, तो आप इस परीक्षा में बैठ सकते हैं. पास होना भी कंट्रोलर की जातीय शक्ति पर निर्भर है. हो सकता है कि कंट्रोलर खुद ही फेल हो, लेकिन इससे क्या?
जाति शक्ति…, अर्थ शक्ति…., वंश शक्ति… सब मिलकर आपको फर्स्ट डिवीजन पास होने की गारंटी देता है.
आप चिंता मत कीजिये…!
बाप को मजबूत बनाइये या मजबूत मां-बाप के घर पैदा हो जाइये… आपको टेस्ट देने की कोई जरूरत नहीं है… सीधे फाईनल एक्जाम की तैयारी कीजिये…! शेष यहां की जातिवादी जनता के हाथों में… ग्रेस मार्क्स भी यहां की भ्रष्ट जनता आपको दे देगी. यहां विकास नहीं विनाश के नाम पर भी जातिवादी, वंशवादी और भ्रष्ट नेता का ही रिजल्ट अच्छा होता है.
जय वोटिंग… जय चिटिंग… जय लूटिंग!
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