रुपया है तो खरीद लोगे… कलेजा कहां से आयेगा!

विशेष प्रतिनिधि
24 अक्तूबर 2025
एक डायलाग है- रुपया है तो बंदूक खरीद लोगे. उसे चलाने के लिए कलेजा कहां से लाओगे? यह डायलाग एक पूर्व विधायक पर फिट बैठ रहा है. मिथिलांचल से आने वाले पूर्व विधायक को पैसा पर सबसे अधिक भरोसा है. यह शत प्रतिशत उचित भी है. क्योंकि इसी के बल पर उन्होंने राजनीति में अच्छी सफलता हासिल की है. स्वयं विधायक बने. पत्नी को उच्च सदन में भिजवाया. अब बेटी को अपने बदले विधानसभा में भेजना चाहते हैं. इसमें कोई बुराई भी नहीं है. इसलिए कि इनके जैसे और भी ढेर सारे लोग इसी प्रक्रिया से माननीय बने बैठे हैं.
कहानी यह है कि पूर्व विधायक ने पिछले साल के लोकसभा चुनाव में एक पार्टी से अपने लिए टिकट का सौदा किया था. बात तय हो गयी. लेकिन, गठबंधन के सुप्रीमो ने उस छोटे दल के नेता को साफ कह दिया कि चाहे जिसे टिकट दे दो, पूर्व विधायक को मत दो. सुप्रीमो की बात काटना गठबंधन के नेता क्या, उनके पिता तक के लिए संभव नहीं है. इसलिए एडवांस लेने के बाद भी पूर्व विधायक को टिकट देने से इनकार कर दिया. दूसरे उम्मीदवार मैदान में उतरे. उन्होंने समतुल्य राशि का प्रबंध किया. भुगतान के साथ उम्मीदवारी मिल गयी. उसी समय पूर्व विधायक से करार हुआ कि विधानसभा के चुनाव में एक पीस टिकट आपको दे देंगे. लोकसभा चुनाव के टिकट के लिए दी गयी एडवांस की रकम के एक हिस्से को विधानसभा चुनाव के टिकट के एडवांस के रूप में छोड़ दिया गया. राजनीति में बाकी बात जो हो, लेन-देन के बाद करार पक्का हो जाता है. नेता ने वचन का पालन किया. एक टिकट की गारंटी कर दी. लेकिन, मामला वही बंदूक और कलेजा वाला हो गया है.
पूर्व विधायक को जिस क्षेत्र से टिकट दिया जा रहा है, वहां से चुनाव लड़ने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं. उन्होंने जिले की दूसरी सीट की मांग कर दी है. वह जो सीट मांग रहे हैं, सुप्रीमो की वह परम्परागत मानी जाती है. एकबार सुप्रीमो फिर अड़ गये. कह बैठे कि पूर्व विधायक की पसंद वाली सीट हम नहीं छोड़ेंगे. वैसे ही उस सीट पर हमारी हार होती रही है. फिर भी उम्मीदवार हमेशा दूसरे नम्बर पर रहता है. कोई और चुनाव नजदीक रहता तो पूर्व विधायक को उसका आश्वासन देकर मनाया जा सकता था. अगला लोकसभा चुनाव चार साल और विधानसभा चुनाव पांच साल बाद होगा. लेकिन, इस बीच रास्ता निकल गया. पूर्व विधायक की बेटी को एक क्षेत्र से उम्मीदवारी मिल गयी. पर, अड़ंगा वहां भी लग गया. पूर्व विधायक की बेटी को नामांकन वापस लेने को बाध्य कर दिया गया.
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