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सूर्यगढ़ा : वार-पलटवार… इस बार बेड़ा पार

तापमान लाइव ब्यूरो
02 नवम्बर 2025

Surjgarha : सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्र में तीन सामाजिक समूहों की उन्नीस-बीस जैसी आबादी है. भूमिहार, कुर्मी-धानुक-कोइरी और यादव समाज की. इन सामाजिक समूहों में किसकी संख्या अधिक है, इसका कोई प्रामाणिक आंकड़ा नहीं है. एक जाति की बात करें, तो भूमिहार (Bhumihar) समाज के मत अधिक हैं. वैसे, कुछ लोगों के दावे में सबसे बड़ी संख्या अलग-अलग पहचान रखने वाली कुर्मी (Kurmy), धानुक (Dhanuk) और कोइरी (Kushwaha) जातियों के समूह के सम्मिलित मतों की है. यादव मतदाता अपेक्षाकृत कम हैं. मुस्लिम (Muslim) मतों की कोई बड़ी संख्या नहीं है. इस वजह से ‘माय’ मजबूत नहीं है. इसके बाद भी राजद (RJD) उम्मीदवार के तौर पर प्रहलाद यादव किला फतह करते रहे हैं, तो उसका आधार अत्यंत पिछड़ा वर्ग के एक बड़े समूह का निर्णायक समर्थन मिलना रहा है. उस समूह में सहनी, चांय और बिंद शामिल हैं, जिनकी आबादी मुसलमानों से कहीं अधिक है. पासवान (Paswan) मत भी परिणाम के रुख को मोड़ने जैसी संख्या में हैं. 2020 के चुनाव परिणाम में भी इसकी झलक दिखी.

त्रिकोणीय मुकाबले में 62 हजार 306 मत हासिल करने वाले प्रहलाद यादव (Prahlad Yadav) की जीत 09 हजार 589 मतों के अंतर से हुई. एनडीए (NDA) के जदयू (JDU) उम्मीदवार रामानंद मंडल (Ramanand Mandal) को 52 हजार 717 और लोजपा के रविशंकर प्रसाद सिंह अशोक (Ravishankar Prasad Singh Ashok) को 44 हजार 797 मत प्राप्त हुए. लोजपा (LJP) के आधार मतों का साथ मिलने के बाद भी रविशंकर प्रसाद सिंह अशोक राजद प्रत्याशी प्रहलाद यादव से 17 हजार 509 मतों से पिछड़ गये, तो इसका मतलब है कि स्वजातीयों का मुकम्मल साथ उन्हें नहीं मिला. संशय इस बार भी बना हुआ है. इसके बाद भी उनकी बुलंदी बनी हुई है. आधार यह कि हार से हतोत्साहित न हो उन्होंने चुनाव के बाद से ही खुद को भेदभाव रहित जन कल्याण में समर्पित कर रखा है. परिणाम इस रूप में दिख रहा है कि तमाम जातियों और वर्गों में जनाधार विस्तृत हुआ है, जन स्वीकार्यता बढ़ी है. आम लोगों के भरोसे को मजबूती मिली है.

विश्लेषकों का मानना है कि प्रहलाद यादव खुद चुनाव भले नहीं लड़ रहे हैं, नेपथ्य में जो रणनीति बना रहे हैं, उसका लाभ रविशंकर प्रसाद सिंह अशोक को मिल जाये, तो वह अचरज की कोई बात नहीं होगी. कैसे, इसको इस रूप में समझिये. प्रहलाद यादव कतई नहीं चाहेंगे कि सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्र में राजद उम्मीदवार प्रेमसागर चौधरी (Premsagar Choudhary) की जीत के रूप में यादव समाज में दूसरा कोई शक्ति केन्द्र बन जाये. दूसरी तरफ एनडीए (NDA) में रहने के बाद भी जदयू प्रत्याशी रामानंद मंडल (Ramanand Mandal) का समर्थन वह इस वजह से नहीं करेंगे कि कथित रूप से उन्हें ललन सिंह (Lalan Singh) के ‘अवांछित व्यवहार’ का हिसाब बराबर करना है. इस क्षेत्र का जो सामाजिक समीकरण है उसमें ‘माय’ अकेले जीत दिलाऊ हैसियत नहीं रखता है.

सच यह भी है कि प्रहलाद यादव ‘माय’ में ज्यादा बिखराव पैदा नहीं कर सकते हैं. परन्तु, ‘माय’ से इतर के जो वोट उन्हें जीत दिलाते थे, उसके एक बड़े हिस्से को तो वह संबद्ध उम्मीदवार की ओर मुखातिब करा ही दे सकते हैं. बहरहाल, प्रहलाद यादव क्या करेंगे क्या नहीं, यह वक्त बतायेगा. परिणाम इस बार भी वही मत तय करेंगे. मुख्य मुकाबला फिर त्रिकोणीय है. अंतर सिर्फ इतना कि एक कोण में राजद उम्मीदवार के रूप में प्रहलाद यादव की जगह प्रेमसागर चौधरी हैं. संघर्ष के जिस कोण से वे मत जुड़ेंगे, जीत उसी की होगी. वैसे ‘स्थानीयता’ भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जो एनडीए की राह का रोड़ा जैसा दिख रहा है. वैसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (PM Narendra Modi) और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) के प्रति आकर्षण इस क्षेत्र में भी नजर आ रहा है.

जनसुराज पार्टी (Jansuraj Party) की उम्मीदवारी जिला पार्षद अमित सागर (Amit Sagar) को मिली है. सम्पन्न-संभ्रांत परिवार से आने वाले अमित सागर की विधानसभा का चुनाव लड़ने की लम्बी चाहत थी, वह पूरी हुई. सदन में कदम रखने का सौभाग्य प्राप्त होता है या नहीं, देखना दिलचस्प होगा. वैसे,जनसुराज पार्टी ने बिहार में राजनीतिक बदलाव की जो बयार बांध रखी थी, वह लगभग हवा हो गयी है. ऐसे में जनसुराजी उम्मीदवार खुद के जनाधार और जातीय आधार के बूते जो हासिल कर लें, पार्टी और उसके सूत्रधार प्रशांत किशोर (Prashant Kishore) के नाम पर शायद ही कुछ विशेष मिलने वाला है. कुछेक अपवाद हो सकते हैं, पर विश्लेषकों को राज्य के तमाम निर्वाचन क्षेत्रों में करीब-करीब ऐसा ही परिदृश्य नजर आ रहा है.

बात अमित सागर की, तो जुड़ाव उनका भाजपा से था. एनडीए में दावेदारों की भीड़ में अपनी संभावना नहीं देख जनसुराज पार्टी से जुड़ गये. लखीसराय जिला अध्यक्ष का पद मिला, तो सूर्यगढ़ा से उम्मीदवारी की उम्मीदें लहलहा उठीं. वर्तमान में प्रदेश सचिव हैं. जिला अध्यक्ष का पद रासपति पांडेय (Raspati Panday) संभाल रहे हैं, जो कभी लखीसराय जिला जदयू के अध्यक्ष हुआ करते थे. कहा जाता है कि रासपति पांडेय भी लखीसराय से उम्मीदवारी चाहते थे. मन मसोस कर रह गये. सूर्यगढ़ा में अमित सागर को अवसर मिल गया तो उसमें जनसुराज के रणनीतिकारों में शामिल जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह (RCP Singh) का बड़ा योगदान रहा. ऐसा पार्टी के लोग कहते हैं. कुर्मी जाति से आने वाले अमित सागर अमरपुर गांव के रहने वाले हैं.

फिलहाल उस धानुक-कुर्मी बहुल क्षेत्र से लखीसराय जिला परिषद के सदस्य हैं, जो आमतौर पर सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्र का परिणाम तय करता है. ऐसा माना जाता है कि जनसुराज की उम्मीदवारी मिलने का एक आधार यह भी रहा. जीत और हार अपनी जगह है, मत मिलना और न मिलना भी, लोग मानते हैं कि स्थानीय होने और जनता के सरोकारों के प्रति गंभीर रहने के कारण क्षेत्र में उनकी भी मजबूत मौजूदगी है. ऐसी ही मौजूदगी मतदान के दिन तक बनी रही यानी मुकाबले का स्वरूप चतुष्कोणीय हो गया तब जदयू की सेहत प्रभावित हो जा सकती है.

अमरपुर के समीप है देवधड़ा गांव. उसी गांव के हैं पूर्व विधायक भागवत प्रसाद मेहता. संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर वह 1967 में सूर्यगढ़ा से विधायक निर्वाचित हुए थे. बाद के दो-तीन चुनावों में भी मैदान में उतरे.1969 और 1972 में मुख्य मुकाबले में रहे, पर जीत का कभी दुहराव नहीं हो पाया. 2000 में भाजपा की उम्मीदवारी मिली, किस्मत तब भी नहीं खुल पायी. इधर लम्बे अरसे बाद भागवत प्रसाद मेहता के पुत्र संदीप कुमार उनकी सियासी विरासत संभालने की मंशा लिये क्षेत्र में सक्रिय हुए. उम्मीदवारी राजद की चाहते थे. मंशा फलीभूत नहीं हुई. सिर्फ संदीप कुमार ही नहीं, और भी कई लोग राजद में संभावना तलाश रहे थे. उनमें एक लखीसराय जिला राजद के पूर्व अध्यक्ष इंद्रदेव यादव भी थे.

सूर्यगढ़ा बाजार के समीपवर्ती गांव कटेहर के रहने वाले इंद्रदेव यादव का ‘सामाजिक न्याय’ के दौर से ही राजद से गहरा जुड़ाव रहा है. चुनाव लड़ने की काबिलियत तो वह रखते ही हैं, इस मामले में हर दृष्टि से सक्षम-समर्थ भी हैं. पर, प्रहलाद यादव के अंगद के पांव की तरह जम जाने की वजह से उन्हें राजद में अवसर नहीं मिल रहा था. संयोगवश इस बार अंगद का पांव उखड़ गया, उम्मीदवारी की संभावना जगी. अपने तई उन्होंने खूब जोर भी लगाया. पर, अर्थ आधारित होड़ में वह टिक नहीं पाये. राजद नेतृत्व का भरोसा प्रेमसागर चौधरी पर जमा. वह भी यादव समाज से हैं. गढ़ी विशनपुर के रहने वाले हैं.

यह गांव लखीसराय और सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्रों की सीमा पर राष्ट्रीय उच्च पथ संख्या 80 के किनारे बसा है. वहीं से एक सड़क किऊल जंक्शन (Kiul Junction) के लिए जाती है. क्षेत्र की राजनीति में प्रेमसागर चौधरी दो-तीन वर्षों से सक्रिय अवश्य हैं, परन्तु उनकी कोई बड़ी पहचान नहीं उभर पायी है. लखीसराय जिला राजद के वह उपाध्यक्ष हैं. जिला राजद ने सर्वसम्मति से अनुशंसा की. पार्टी नेतृत्व ने उम्मीदवार घोषित कर दिया. इंद्रदेव यादव एवं अन्य हाथ मलते रह गये. प्रेमसागर चौधरी का अपना कुछ जनाधार है या नहीं, यह कोई खास मतलब नहीं रखता. राजद के उम्मीदवार हैं, तो मुख्य मुकाबले में हैं.