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पहले होती थी डकैती?

बांके बिहारी साव
11 नवम्बर 2025

वोट चोर…गद्दी छोड़… और वोट के डकैत…गद्दी पकड़…
अभी वोट चोर का हल्ला मचा हुआ है. जिनका खानदान वोट की डकैती करके जिन्दा है, वह भी वोट चोर का हल्ला कर रहा है.
क्या वोट की डकैती नहीं होती, तो इनका वंशवाद (Dynasty) जिन्दा रहता?
क्या वोट की डकैती नहीं करते, तो उनका वंशवाद जिन्दा रहता?
हमारी पीढ़ी ने तो वोट की डकैती देखी है. उसके बाद की पीढ़ी ने वोट की लूट देखी है. तीसरी पीढ़ी वोट की चोरी का हल्ला कर रही है. ताज्जुब की बात है कि ‘चोर-चोर का हल्ला उन्हीं का वंशधारी कर रहा है जिन्होंने वोट की डकैती और लूट से प्रजातंत्र (Democracy) को दंश मारा है.
ऐसा क्यों?
क्योंकि अब वे वोट की डकैती नहीं कर पा रहे हैं, तो व्यवस्था को ही चोर बता कर स्वयं के लिए चोरी का मौका खोज रहे हैं.
यदि आप साठ के ऊपर के हैं तो आपने अपनी आंखों के सामने वोट की डकैती देखी होगी?
गांव का दबंग आदमी पिस्तौल लेकर बूथ के बाहर खड़ा हो जाता था और दो-तीन आदमी भीतर जाकर सभी वोट अपने पक्ष में डाल लिया करते थे. इसी का दुष्परिणाम था कि एक ही खानदान का उत्तराधिकारी लगातार चुनाव जीतता था.
दलित और पिछड़े तो वोट दे ही नहीं पाते थे. उनकी बहू-बेटियां तो बूथ का दर्शन तक नहीं कर पाती थीं.
ऐसा आजादी के बाद के चार-पांच चुनावों तक चला.
डकैती के बाद आया लूट का समय.
अब दूसरी जातियों और परिवारों में भी दबंग (Dabang) पैदा होने लगे. जो अपराधी (Criminal) या दबंग पहले स्थापित परिवारों के लिए बूथ लूटते थे- वे अब स्वयं के लिए लूटने लगे.
उन्होंने सोचा- जब हमारी ही ताकत पर वे चुनाव जीतते हैं, तो हम ही क्यों नहीं?
फिर अपराधी और दबंग परिवारों ने वोट लूट का धंधा शुरू किया. जहां जिसकी लाठी चली, जीत उसी की हुई.
इसी प्रक्रिया के तहत अपराधियों ने राजनीति में शानदार प्रवेश किया.
कुछ अपराधी तो ऐसे निकले जिन्होंने घर बैठे ही चुनाव जीत लिया. वोटर उनके खौफ के कारण बूथ तक नहीं जाते थे. जाते भी थे तो चुपचाप उहें वोट गिराकर अपना भय-युक्त कर्तव्य पूरा कर लेते थे. इसके कई उदाहरण हैं. खुलकर विरोध करने वालों की हत्या तक की जाने लगी. इसी दौर में लम्पट राजनीति शुरू हुई और जातियों ने अपना राष्ट्रधर्म छोड़ कर अपनी जाति के गुण्डों, लोफरों, चोरों, डकैतों, भ्रष्टाचारियों और यहां तक कि देशद्रोहियों को भी अपना मसीहा मान कर वोट देना शुरू कर दिया. यही काल था जब जनता का चरित्र गिरा और अपराधियों का उदय हुआ. वोटर देशद्रोहियों और भ्रष्टाचारियों को देवताओं की तरह पूजने लगे. यह सिलसिला अभी तक जारी है.

वोटरों को अपने भविष्य की नहीं, अपनी जाति के भ्रष्ट नेताओं के भविष्य की चिंता होने लगी. राष्ट्र या राज्य नहीं, सिर्फ जाति की जीत ही अपनी शान समझने लगे, जो आज तक जारी है.
ईवीएम (EVM) बेचारा क्या करे?
यह तो मूकदर्शक की भांति सिर्फ वोटरों की इज्जत करता है. कौन वोटर देशद्रही नेता को वोट दे रहा है-उसे क्या पता? कौन वोटर अपराधी नेता को वोट दे रहा है- उसे क्या पता? कौन वोटर धर्म के नाम पर अधार्मिक नेता को वोट दे रहा है- उसे क्या पता ?
क्या आजादो इसी दिन के लिए मिली थी?
क्या शहीद भगत सिंह या अशफाक उल्ला ने कुर्बानी इसलिए दी थी?
आदमी हिन्दू हो या मुसलमान- राष्ट्र सर्वाेपरि है. आदमी सिख हो या ईसाई- राष्ट्र सर्वाेपरि है. लेकिन, आज स्वार्थ सर्वाेपरि है और राष्ट्र गौण.
क्या हिन्दू (Hindu) यह जानते हैं कि जब राष्ट्र कमजोर था, तो मुसलमानों ने करोड़ों हिन्दुओं को मुसलमान (Musalman) बना डाला?
उस वक्त कहां थीं जातियां?
क्या मुसलमानों को नहीं मालूम कि जब अंग्रेज आये तो करोड़ों मुसलमानों को ईसाई बना डाला?
आज करोड़ों हिन्दू और मुसलमान ऐसे हैं जो ईसाई (Christian) बन कर घूम रहे हैं?
उस वक्त कहां थे आज के वे नेता जो जाति के नाम पर राष्ट्र को लूट रहे हैं. कल जब राष्ट्र कमजोर होगा तो क्या ये नेता आपको बचा पायेंगे? ऐसा कदापि नहीं होगा उल्टे ये नेता अपनी जाति और धर्म बदल कर सत्ता-सुख के लिए आक्रमणकारियों से मिल कर अपनी ही मां-बहन- बेटियों का सौदा नहीं करेंगे?
ऐसा होता रहा है और होता रहेगा.
जाति और धर्म (Caste and Religion) के बहाने भ्रष्ट और सत्ता-लोभी नेताओं को जिताने वाली जनता का यही हश्र होता है. भ्रष्टाचार (Corruption) और भ्रष्ट नेताओं को मिटाना हमारा धर्म होना चाहिये. क्या कोई धर्म कहता है कि हम भ्रष्ट वंश और देशद्रोही परिवार का समर्थन करें? अगर धर्म ऐसा कहता है, तो वह धर्म, धर्म नहीं हो सकता.
इस बार में व्यंग्य नहीं, तंज लिख रहा हूं. यह तंज उन लोगों पर है जो किसी वंश के अयोग्य उम्मीदवार को भी अपने सर पर बिठा कर पूजते हैं.
अगर यही मानव धर्म है तो हम कैसे मानव हैं जो किसी भ्रष्ट या अपराधी को देवता की तरह पूज रहे हैं.
क्या इसलिए हम पर्व मनाते है?
क्या इसलिए हम धार्मिक अनुष्ठान करते हैं?
क्या ऐसे ही नेताओं को चुनने के लिए हम मंदिर-मस्जिद या गिरिजाघरों में जाकर अपने इष्ट की आराधना करते हैं?
अगर ऐसा है तो फिर धर्म कैसा?
यदि ऐसा ही है तो पर्व और अनुष्ठान कैसा?
यदि ऐसा ही है तो फिर 26 जनवरी और 15 अगस्त कैसा?
क्या हमें राष्ट्र और धर्म को भूलकर असुरों की पूजा करनी चाहिये?
यदि ऐसा ही होना था तो राम ने रावण को क्यों मारा?
यदि ऐसा ही होना था तो कृष्ण ने अपने ही मामा कंस को क्यों मारा?
समय आ गया है कि आप रावण और कंस को पहचान कर उनकी राजनीतिक हत्या करें- यही हमारी आजादी का आगाज है और उसकी आवाज है.