पूर्णिया : नहीं हो पायी कांग्रेस अभिशाप मुक्त!


अशोक कुमार
23 नवम्बर 2025
Purnea : अठहत्तर वर्ष के स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास का कांग्रेस (Congress) से जुड़ा यह एक बेहद रोचक अध्याय है कि पूर्णिया विधानसभा क्षेत्र में 2025 तक हुए अठारह चुनावों और दो उपचुनावों यानी कुल बीस चुनावों में उसके सिर्फ एक नेता की जीत हुई है. वह इकलौते सौभाग्यशाली नेता कमलदेव नारायण सिन्हा थे, जिन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर 1952 से 1969 तक के शुरुआती पांच चुनावों में लगातार जीत हासिल की थी. वैसे, उनकी जीत 1972 के चुनाव में भी हुई थी, परन्तु कांग्रेस के नहीं, संगठन कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में. उस चुनाव में ‘गरीबी हटाओ’ पर आधारित तत्कालीन प्रधानमंत्री (Prime Minister) इंदिरा गांधी (Indra Gandhi) की ‘समाजवादी समझ वाली राजनीति’ के आधार पर कांग्रेस बिहार की सत्ता में प्रचंड बहुमत से पुर्नस्थापित हो गयी. लेकिन, पूर्णिया को कांग्रेस का वह ‘समाजवादीकरण’ स्वीकार्य नहीं हुआ. बाजी कमलदेव नारायण सिन्हा के ही हाथ लग गयी. हालांकि, बाद में कांग्रेस में उनकी वापसी हो गयी. 1977 में उम्मीदवारी भी मिली, पर कांग्रेस जीत नहीं पायी.
तरस रही 55 वर्षों से
इन परिणामों के मद्देनजर यह कहा जा सकता है कि पूर्णिया विधानसभा क्षेत्र 1969 के बाद से कांग्रेस के लिए मरुभूमि बना हुआ है. इन वर्षों के दौरान हुए चुनावों और उपचुनावों में कभी उसकी जीत नहीं हुई. 1980 और 1985 में कांग्रेस की ‘लहर’ चली. भारी बहुमत से वह बिहार की सत्ता में आयी, पर पूर्णिया पर उस ‘लहर’ का कोई असर नहीं पड़ा. हालात ऐसे हैं कि तकरीबन 55 वर्षों से वह पूर्णिया में एक अदद जीत के लिए तरस रही है. दिलचस्प तथ्य यह भी है कि कांग्रेस का खूंटा उखड़ा तब 1972 और 1977 के दो चुनावों के बाद पूर्णिया विधानसभा क्षेत्र पर माकपा काबिज हो गयी. 1980 से 1995 तक के चार चुनावों में माकपा उम्मीदवार के तौर पर अजीत सरकार का इकबाल बुलंद रहा.
फिर कभी जीत नहीं पायी माकपा
यह कहने में तनिक भी हिचक नहीं कि उन चुनावों में जीत माकपा (CPIM)) की नहीं, अजीत सरकार (Ajit Sarkar) की हुई थी. इसकी पुष्टि इससे खुद-ब-खुद हो जाती है कि अजीत सरकार के दुर्भाग्यजनक अवसान के बाद चुनावी मुकाबलों में जीत की बात दूर, माकपा कभी मुख्य संघर्ष में भी नहीं रही. बाद के चुनावों में तो उसकी दुर्गति ही होती रही. अजीत सरकार की हत्या के बाद हुए उपचुनाव में उनकी विधवा माधवी सरकार (Madhavi Sarkar) की जीत जरूर हुई, पर 2000 के बाद माकपा ने उम्मीदवारी के मामले में उन्हें पूरी तरह नकार दिया. 2000 में माधवी सरकार को माकपा की उम्मीदवारी मिली भी तो दिवंगत अजीत सरकार के भाई प्रदीप सरकार ने निर्दलीय मैदान में उतर उनकी संभावनाओं को समेट दिया. माधवी सरकार को एक बार भाकपा-माले ने अवसर उपलब्ध कराया, इसके बावजूद जीत उनसे दूर ही रह गयी.
नहीं गल पायी कभी राजद की दाल
पूर्णिया की चुनावी राजनीति की गहन जानकारी रखने वालों के मुताबिक 1998 में अजीत सरकार की हत्या नहीं हुई होती, तो लोकप्रियता उनकी ऐसी थी कि माकपा की जीत का सिलसिला आगे भी बना रहता. कोई कितना भी दम लगाता, जीत का क्रम नहीं टूटता. जब सामाजिक न्याय की राजनीति के चरमकाल में वहां राजद (RJD) की दाल नहीं गल पायी, तो फिर दूसरे दल की बिसात ही क्या थी! अजीत सरकार को असमय काल का ग्रास बना दिया गया तब इस विधानसभा क्षेत्र की राजनीति का चरित्र एकदम से उलट गया. लाल की जगह भगवा लहरा उठा. 1998 में अजीत सरकार की हत्या के बाद हुए उपचुनाव में सहानुभूति की लहर में भाजपा को कामयाबी नहीं मिली. परन्तु, दूसरे स्थान पर रह अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराने में वह सफल अवश्य रही.
बन गया सिलसिला
दो साल बाद 2000 के चुनाव में पूर्णिया में भाजपा की पहली जीत हुई और फिर उसका सिलसिला-सा बन गया. भाजपा प्रत्याशी राजकिशोर केसरी (Rajkishore Keshri) ने 2000 में ही नहीं, फरवरी 2005 और अक्तूबर 2005 के चुनावों के बाद 2010 में भी बड़ी जीत हासिल की. 2011 में राजकिशोर केशरी की हत्या हो गयी. वह राजनीतिक हत्या नहीं थी. मामला कुछ दूसरा था. उनकी हत्या के बाद भी भाजपा की जीत का क्रम बना रहा. उपचुनाव में राजकिशोर केसरी की विधवा किरण केसरी (Kiran Keshri) की जीत हुई. कारण जो रहा हो, किरण केसरी की उम्मीदवारी का आगे दुहराव नहीं हुआ. 2015, 2020 और 2025 में भाजपा की उम्मीदवारी विजय खेमका को मिली. तीनो चुनावों में उनकी जीत भी हुई.
यादव की भी नहीं हुई कभी जीत
पूर्णिया में एक अदद जीत के लिए कांग्रेस तो तरस रही ही है, गौर करने वाली बात यह भी है कि सामाजिक और राजनीतिक समीकरण अनुकूल रहने के बाद भी राजद के अब तक के इतिहास में इस क्षेत्र में उसे कभी जीत हासिल नहीं हुई है. यादव समाज के उम्मीदवार को भी नहीं. मरंगा के सुधीर चौधरी के बाद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव (Rajesh Ranjan alias Pappu Yadav) से लेकर प्रो. रामचरित्र यादव तक ने भाग्य आजमाया. किस्मत रूठी रह गयी. प्रो. रामचरित्र यादव (Prof. Ramcharitra Yadav) कभी समाजवादी पार्टी, कभी कांग्रेस तो कभी राजद के उम्मीदवार के तौर पर पांच चुनावों में मैदान में उतरे. कई बार मुख्य संघर्ष में रहे, परन्तु विधायक बनने का ख्वाब पूरा नहीं हो पाया. पप्पू यादव को पूर्णिया संसदीय क्षेत्र (Purnia parliamentary constituency) में तो जीत मिली, विधायक के रूप में पूर्णिया के लोगों को वह स्वीकार्य नहीं हुए. एक बार उनकी मां शांति प्रिया (Shanti Priya) भी मैदान में उतरी थीं. पुत्र की तरह वह भी जीत से दूर रह गयीं.
नहीं उठा पा रहा लाभ
इस क्षेत्र से पहले कायस्थ समाज से कांग्रेस नेता कमलदेव नारायण सिन्हा (Kamaldeo Narayan Sinha) और फिर बंगाली कायस्थ समाज के माकपा नेता अजीत सरकार की जीत होती थी. बाद में कांग्रेस की उम्मीदवारी कायस्थ समाज की ही इन्दु सिन्हा (Indu Sinha) को मिली. एक बार नहीं, तीन बार. लेकिन, वह चूक गयीं. अजीत सरकार की हत्या के बाद से पूर्णिया विधानसभा क्षेत्र पर वैश्य समाज काबिज है. जबकि जानकारों के अनुसार आबादी अधिक मुसलमानों की है. इस बड़ी आबादी के समर्थन का लाभ राजद नहीं उठा पा रहा है, कांग्रेस भी नहीं. महागठबंधन में यह सीट कांग्रेस के हिस्से में रहती है. पर, उम्मीदवार कमजोर रहने की वजह से मुसलमानों का संपूर्ण साथ मिलने के बाद भी कामयाबी नहीं मिल पाती है.
ऐसे बिगड़ गया कांग्रेस का खेल
बहरहाल, कांग्रेस ने 2025 के चुनाव में इस अभिशाप से मुक्त होने के लिए पुरजोर कोशिश की. पूर्व की तरह इस बार भी यह सीट उसके हिस्से में थी. पूर्व के चुनावों में मुंह की खायीं इन्दु सिन्हा को हाशिये पर डाल उम्मीदवारी पूर्णिया नगर निगम (Purnia Municipal Corporation) की महापौर (Mayor) विभा कुमारी (Vibha Kumari) के पति जितेन्द्र यादव (Jitendra Yadav) को दी गयी. भाजपा (BJP) को पछाड़ने का माद्दा उनमें है, पर हाल फिलहाल तक जदयू में रहने के कारण महागठबंधन (Mahagathbandhan) समर्थकों में बदलाव के लिए जो जोश-खरोश होना चाहिये था, वैसा नहीं दिखा. कारण कि जितेन्द्र यादव एनडीए में जदयू की उम्मीदवारी चाहते थे. बात नहीं बनी. कांग्रेस में शामिल हो गये. कांग्रेस की उम्मीदवारी भी मिल गयी. इससे कांग्रेस के उन दावेदारों और उनके समर्थकों में असंतोष गहरा गया, जो पार्टी के प्रति समर्पित रहे हैं. इसी असंतोष ने महागठबंधन यानी कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया.
वैश्य या मुस्लिम उम्मीदवार होता तब…
भाजपा प्रत्याशी विजय खेमका (Vijay Khemka) ने कांग्रेस उम्मीदवार जितेन्द्र यादव (Jitendra Yadav) के मंसूबों को 33 हजार 222 मतों से धो दिया. विजय खेमका को प्राप्त 01 लाख 27 हजार 614 मतों के मुकाबले जितेन्द्र यादव को 94 हजार 392 मत ही मिल पाये. महागठबंधन के अंदर भी ऐसी चर्चा होती है कि कांग्रेस को इस बार ऐसे लड़ाके को मैदान में उतारना चाहिये था जिसमें 25 वर्षों से पूर्णिया पर काबिज भाजपा के दांत खट्टे कर देने का दमखम दिखता. विश्लेषकों के मुताबिक उम्मीदवार वैश्य या मुस्लिम समाज से होता तो फिर परिणाम कुछ और सामने आ सकता था.
#Tapmanlive

