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असदुद्दीन ओवैसी : कर दी फिर महागठबंधन की ऐसी की तैसी…

राजकिशोर सिंह
27 नवम्बर 2025

Patna : सभाओं में जनसैलाब, उम्मीदों से लबालब युवाओं की मौजूदगी, उम्र से अधिक बुजुर्ग दिखते हताश-बदहवास चेहरे… चुनाव के दौरान बिहार के उत्तर-पूर्व सीमांचल (North-East Border) के किशनगंज से कटिहार (Kishanganj to Katihar) तक करीब-करीब ऐसा ही मंजर. ऑल इंडिया मजलिस -ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) सुप्रीमो सांसद असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) जनसभाओं में अपने चिर-परिचित अंदाज में सीमांचल की बदहाली और गरीबी को नाइंसाफी से जोड़कर बात करते थे, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (PM Narendra Modi) और राजद (RJD) के अघोषित सुप्रीमो तेजस्वी प्रसाद यादव (Tejaswi Prasad Yadav) पर बेलाग प्रहार करते थे तो खूब तालियां बजती थीं. तालियों की गड़गड़ाहट इस बात की तसदीक करती थी कि चुनावों में विशेष कुछ हासिल हो या नहीं, सीमांचल में आज भी 2020 के चुनाव काल की तरह ही असदुद्दीन ओवैसी लोकप्रिय हैं. उनकी इस लोकप्रियता से सवाल स्वतः खड़ा हो जा रहा था कि क्या एआईएमआईएम 2020 की तरह इस बार भी महागठबंधन (Mahagathbandhan) का खेल बिगाड़ तेजस्वी प्रसाद यादव के मुख्यमंत्री बनने के मंसूबों पर पानी फेर देगा? जवाब चुनाव परिणाम से मिल गया.

कारगर रही रणनीति

बिहार विधानसभा के चुनाव (Bihar Assembly Elections) में एआईएमआईएम ने उन्हीं सीटों को चुना, जहां मुसलमानों की आबादी (Muslim Population) निर्णायक संख्या में है. उम्मीदवार भी उसी समुदाय से बनाया, महागठबंधन के लिए वह सिरदर्द बन गया. सीमांचल की कुल 24 विधानसभा क्षेत्रों में से 12 ऐसे हैं जहां मुसलमानों की आबादी 50 प्रतिशत के आसपास है. एक-दो में इससे भी अधिक. बिहार अल्पसंख्यक आयोग (Bihar Minority Commission) के आंकड़ों पर भरोसा करें तो किशनगंज में 67 प्रतिशत, कटिहार में 42, अररिया में 41 और पूर्णिया में 37 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है.

सरकार बनाने से रोक दिया

एआईएमआईएम को 2020 में अप्रत्याशित सफलता मिली थी. 05 सीटों पर जीत हुई थी और 03 पर वह दूसरे स्थान पर रही थी. उस चुनाव में इसने सीमांचल की 14 सीटों सहित कुल 20 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. उनमें 16 मुस्लिम और 04 गैर मुस्लिम थे. अमौर (Amour) में अख्तरूल इमान (Akhtarul Iman), बहादुरगंज (Bahadurganj) में अंजार नईमी (Anjar Naimi), बायसी (Biasi) में सैयद रूकुनुद्दीन अहमद (Syed Rukunuddin Ahmed), कोचाधामन (Kochadhaman) में इजहार असफी (Izhar Asafi) और जोकीहाट (jokihat) में शाहनवाज आलम (Shahnawaz Alam) की जीत हुई थी. और जो हुआ सो हुआ, एआईएमआईएम की इस कामयाबी ने महागठबंधन को सरकार बनाने से रोक दिया.

जीत मिली उन्हीं सीटों पर

पूर्व की तरह एआईएमआईएम इस बार सीमांचल की 14 सीटों समेत विधानसभा की 25 सीटों पर चुनाव लड़ा. उनमें किशनगंज जिले की सभी 04 सीटें-किशनगंज, कोचाधामन, बहादुरगंज और ठाकुरगंज शामिल थे. पूर्णिया जिले की अमौर, बायसी और कसबा (Amour, Baisi and Kasba), अररिया जिले की जोकीहाट और अररिया (Jokihat and Araria), कटिहार जिले की बलरामपुर, प्राणपुर, मनिहारी, बरारी और कदवा (Balrampur, Pranpur, Manihari, Barari and Kadwa) में उसके उम्मीदवार मुकाबले में रहे. जोकीहाट में मुर्शीद आलम, बहादुरगंज में तौसीफ आलम, कोचाधामन में सरवर आलम, अमौर में अख्तरुल इमान और वायसी में गुलाम सरवर की जीत हुई. ये पांच निर्वाचन क्षेत्र वही हैं जहां 2020 में भी एआईएमआईएम की जीत हुई थी.

नाकामयाब रहे तीनों

गौर करनेवाली बात यह भी है कि 2020 में एआईएमआईएम की सफलता सीमांचल तक सीमित (Limited to the Seemaanchal) थी, इस बार उसने अपनी राजनीतिक रणनीति (Political Strategy) बदल दी. सीमांचल केन्द्रित रणनीति (Seemanchal-centric strategy) को व्यापक सामाजिक प्रयोग की ओर विस्तृत कर दिया. उसने जो उम्मीदवार उतारे उसे अनोखा सामाजिक मिश्रण कहा गया. उम्मीदवारों में कट्टर हिन्दू नेता (Staunch Hindu Leader) से लेकर विवादास्पद मुस्लिम चेहरा (Controversial Muslim Face) तक शामिल थे. पार्टी ने पूर्वी चंपारण (East Champaran) जिले के ढाका (Dhaka) में राणा रंजीत सिंह को उम्मीदवार बनाया, जो अपने ‘आई लव महादेव’ के नारे के लिए चर्चित हिंदू नेता (Hindu Leader) हैं. गया (Gaya ) जिले के शेरघाटी (Sherghati) में शान-ए-अली खान पर दांव खेला, जिन पर हत्या का आरोप है. इसी तरह वैशाली (Vaishali) जिले के महुआ (Mahua) में अमित कुमार उर्फ बच्चा राय को अवसर उपलब्ध कराया गया जो 2016 के टॉपर्स घोटाले के मुख्य आरोपित रहे हैं. तीनों नाकामयाब रहे.

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