होटल वाले बीडी : समझ गये राजनीति का चरित्र!

विशेष प्रतिनिधि
27 नवम्बर 2025
PATNA : नेताओं की संगत में रहने वाले बहुत जल्दी भ्रम के शिकार हो जाते हैं. राजधानी के बड़े होटल के बड़े अधिकारी बीडी (BD) भी इस भ्रम के शिकार हुए. शिकार तो पांच साल पहले हो जाते, लेकिन उस समय उन्होंने मांग के अनुसार इंतजाम नहीं किया था. इसबार तगड़ा इंतजाम किया. यहां तक कि टिकट के बाजार में अधिकतम बोली लगाने के लिए भी तैयार थे. उनके होटल में सभी दलों के नेताओं (Leaders of all Parties) का आना-जाना होता है. बड़े नेता उनके होटल में ठहरते हैं तो छोटे-छोटे नेता मिलने जाते हैं. उनके सेवा भाव में कभी कमी नहीं आयी. एक-दो घंटे के लिए किसी नेता को खास बातचीत करनी हो तो होटल का कमरा मुफ्त में खुल जाता था. कह लीजिये कि कम्युनिस्ट पार्टियों (Communist Parties) को छोड़ प्रायः हर दल के नेता से उनका जुड़ाव रहा है.
आश्वासन-दर-आश्वासन
वह राजधानी स्थित किसी होटल के पहले अधिकारी हैं, जिन्हें सर्वदलीय (Sarvadaleey) कहा जा सकता है. टिकट मांगते समय उन्होंने भी सर्वदलीय रूख का परिचय दिया. पहले एनडीए (NDA) के दलों से टिकट की इच्छा जाहिर की. पुरजोर आश्वासन मिला. निश्चिंत हो गये. संकट यह आया कि उनकी पसंदीदा सीट के वर्तमान उम्मीदवार घर बैठने को राजी नहीं हुए. कहा कि बहुत चुनाव जीते हैं. यह आखिरी चुनाव है. लड़ लेने दीजिये. पार्टी ने उनका सम्मान किया. यहां से निराश होने के बाद बीडी महागठबंधन की ओर गये. वहां भी पुरजोर आश्वासन मिला. तय यह पाया गया कि महागठबंधन (Mahagathbandhan) में यह सीट छोटे पार्टनर को दे दी जायेगी. फिर वह सुविधा शुल्क देकर उससे टिकट ले लेंगे. बीडी इसके लिए भी राजी हो गये.
दो हजार भी नहीं
इसी बीच झूठी या सही खबर फैल गयी कि बीडी ने बहुत पहले खेती की जमीन ली थी. उस जमीन के बगल से अचानक एनएच गुजर गयी. लाखों की जमीन का भाव (Price of Land) करोड़ों में चला गया. यह जानकारी जब छोटे दल के बड़े नेता के पास पहुंची तो टिकट का भाव आसमान पर पहुंच गया. आखिर में बीडी ने हिसाब किया. जितने पैसे में टिकट खरीदेंगे, उससे कम में निर्दलीय चुनाव लड़ लेंगे. होटल के कारोबार (Hotel Business) से लंबे समय तक जुड़े रहने के कारण उन्हें सौदा के कच्चा या पक्का होने का पता तो है ही. उन्होंने निर्दलीय (Independent) मैदान में जाने का निर्णय लिया. चुनाव प्रचार में किसी से उन्नीस नजर नहीं आये, पर मत दो हजार भी नहीं बटोर पाये. हार-जीत अपनी जगह है, राजनीति के बारे में उनका ज्ञान जरूर समृद्ध हुआ. इस परिणाम के बाद नेताओं की आवभगत की उनकी विशिष्ट शैली कायम रहती है या कटु अनुभव के कारण बदल जाती है, देखना दिलचस्प होगा.

