नक्सलवाद : टूटती सांसें… ‘संघर्ष विराम’, संगठन में कोहराम

विष्णुकांत मिश्र
28 नवम्बर 2025
New Delhi : केन्द्रीय गृह मंत्री (Union Home Minister) अमित शाह ने देश की आंतरिक सुरक्षा (Internal Security of the Country) के लिए गंभीर समस्या बने नक्सली आतंक (Naxalite Terror) को 31 मार्च 2026 तक जड़ से उखाड़ फेंकने का लक्ष्य घोषित किया था तब माओवाद के पोषक तंत्र ने उसे बहुत हल्के में लिया था. आम अवाम ने भी गंभीरता नहीं दिखायी थी. ऐसा स्वाभाविक था. कारण कि देश के एक बड़े हिस्से के लंबे समय से नक्सली हिंसा की चपेट में रहने की वजह से इसका समूल खात्मा असंभव दिख रहा था. अमित शाह (Amit Shah) का संकल्प मुकम्मल रूप में पूरा हो पाता है या नहीं, यह वक्त बतायेगा. केन्द्रीय गृह मंत्रालय के दृढ़ निश्चय, सुरक्षा बलों की सधी रणनीति और नक्सली उन्मूलन में लगे जवानों के शौर्य ने असंभव वाली धारणा को लगभग बदल दिया है. सिर्फ आठ माह में ही नक्सली आतंक की रीढ़ रहे दर्जन भर शीर्ष नेताओं समेत शताधिक माओवादियों को जमीन सूंघा सुरक्षाबलों ने संगठन में कोहराम मचा दिया है.
मांद में भी पसरा है खौफ
सुरक्षा बलों की दबाव मुक्त मारक कार्रवाइयों (Lethal Operations) से नक्सलियों में ऐसा खौफ समा गया है कि अपने ‘मांद’ में भी वे खुद को असुरक्षित मान पनाह मांग रहे हैं. मुठभेड़ों में मिल रही मौत से भय (Fear of Death) खा हथियार डाल रहे हैं. शीर्ष स्तर पर भी ‘हथियारी संघर्ष’ (Armed Conflict) को अस्थायी तौर पर त्याग आत्मसमर्पण (Surrender) की बात की जाने लगी है. कांपते- थरथराते बूढ़े हाथों में संगठन की कमान, शस्त्र संसाधनों की भारी क्षति (Heavy loss of weapon resources) और घटते जन समर्थन (Declining Public Support) के मद्देनजर घुटना टेक देने को ही अस्तित्व रक्षा का एकमात्र विकल्प माना जा रहा है. हालांकि, नक्सलियों के एक तबके को ‘संघर्ष विराम’ खुदकुशी के समान लग रहा है. उसकी कोशिश हथियार डालने की बजाय ‘जनयुद्ध’ को और धारदार बनाने की हो रही है. इस कोशिश को संगठन में कितना समर्थन मिलता है, यह कहना कठिन है. पर, यह स्पष्ट तौर पर दिख रहा है कि ‘संघर्ष विराम’ के सवाल पर माओवादी दो खेमों में बंट गये हैं.

हथियार उठाना बड़ी भूल!
इसे माओवादियों की रणनीतिक विवशता (Maoists’ strategic compulsion) मानें या वैचारिक भटकाव (Ideological Deviation) या फिर सैद्धांतिक बदलाव (Doctrinal Change), ‘बंदूक को ही मुक्ति का मार्ग’ (The gun is the only way to salvation) मानने वाले अब ‘केवल बंदूक से ही जनता की समस्याएं हल नहीं की जा सकतीं’ जैसी बातें करने लगे हैं. हथियार उठाने को सबसे बड़ी भूल मान जनता से माफी (Apology to the Public) मांग रहे हैं. लोग हैरान हैं कि आग उगलने वाली बंदूकें (Fire-Breathing Guns) अब संघर्ष विराम के लिए संवाद की मनुहार (Appeal for Dialogue for a Ceasefire) करने लगी हैं. सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों से माओवादियों के गिर रहे मनोबल, बिखर रहे सांगठनिक ढांचे और घट रहे जन समर्थन ने संगठन को दबाव में ला दिया है. आंतरिक मतभेद (Internal Differences) भी बड़ी चुनौती बना हुआ है. स्थिति यह है कि संगठन की केन्द्रीय समिति (Central Committee of Formation) में कभी 42 सदस्य हुआ करते थे. अब मात्र 06 हैं. पोलित ब्यूरो (Polit Buro) में छह सदस्य होते थे. वर्तमान में दो-तीन ही रह गये हैं.
छह जिलों में सिमट गये नक्सली
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों ने ‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’ (Operation Black Forest) और ‘ऑपरेशन कागर’ (Operation Kagar) चला रखा है. असर ऐसा हुआ है कि दंतेवाड़ा (Dantewada), बीजापुर (Bijapur), सुकमा (Sukma), कांकेर (Kanker), नारायणपुर (Narayanpur) और कोंडागांव (Kondagaon) जिले लगभग नक्सलमुक्त (Naxal Free) हो चुके हैं. ओडीसा के कंधमाल (Kandhamal), कालाहांडी (Kalahandi) और मलकानगिरी (Malkangiri) जिलों में अभियान जारी है. सरकार को उम्मीद है कि अगले कुछ महीनों में वे सब भी नक्सलमुक्त हो जायेंगे. केन्द्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि सुरक्षा बलों से मुठभेड़ (Encounter With Security Forces) में अब तक 02 हजार 089 नक्सली मारे गये हैं. 2024 में 928 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया था. 2025 में अब तक 1225 नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं. अभियान की सफलता को केन्द्रीय गृह मंत्रालय इस रूप में भी सार्वजनिक कर रहा है कि 2014 में देश के 35 जिले नक्सल प्रभावित थे. वर्तमान में सिर्फ 06 जिलों में नक्सली रह गये हैं.
तहस-नहस कर दिया
2004 से 2014 के बीच नक्सली हिंसा की 14 हजार 463 घटनाएं हुईं. 2014 से 2024 के बीच घटकर यह 07 हजार 744 हो गयी यानी नक्सली हिंसा की घटनाओं में 53 प्रतिशत की कमी आ गयी है. सुरक्षा बलों के हताहत होने की संख्या में भी 73 प्रतिशत की कमी आयी है. अभियान के दरम्यान तेलंगाना (Telangana), महाराष्ट्र (Maharashtra), छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh), झारखंड (Jharkhand), पश्चिम बंगाल (West Bengal) आदि राज्यों में जिन क्षेत्रों की पहचान नक्सलियों के अभेद्य गढ़ (Impenetrable stronghold of Naxalites) की रही है, सुरक्षा बलों ने उसे लगभग तहस-नहस कर दिया है. नक्सल प्रभावित इलाकों में लगातार हो रही मुठभेड़ से नक्सलवाद की रीढ़ करीब-करीब टूट गयी है. नक्सलियों के सुरक्षित ठिकानों से भारी मात्रा में हथियार और गोला बारुद बरामद हुए हैं. बड़ी बात यह कि वह तंत्र भी छितरा गया है, जो नक्सलियों को हथियारों, गोला-बारूदों और खाद्य पदार्थ (Arms, Ammunition and Food) के साथ अन्य आवश्यक सामग्री की आपूर्ति से जुड़ा था. इससे माओवादी इतने अशक्त हो गये हैं कि सुरक्षा बलों पर हमले की बात दूर, उसकी कार्रवाई का जवाब देने लायक भी नहीं रह गये हैं.

